सौरमण्डल

सौरमण्डल – ब्रह्माण्ड की उत्पत्ति

  • 140 ईसा पूर्व सर्वप्रथम ‘क्लाउडियस टॉलेमी’ ने बताया कि पृथ्वी केन्द्र में हैं तथा सूर्य इसके चारों ओर चक्कर लगाता है, इसे ‘जियोसेंट्रिक अवधारणा’ कहा गया।
  • 1543 ई. में ‘कॉपरनिकस’ ने यह बताया कि सूर्य केन्द्र में हैं तथा पृथ्वी व अन्य ग्रह इसके चारों ओर चक्कर लगाते हैं, इसे ‘हेलियोसेंट्रिक अवधारणा’ कहा गया।
  • 1805 ई. में ‘हरशेल’ ने दूरबीन की सहायता से अंतरिक्ष का अध्ययन कर यह बताया कि अंतरिक्ष में हमारी आकाशगंगा (Galaxy) के समान कई और आकाशगंगाएँ है।
  • ‘हब्बल’ नामक वैज्ञानिक ने बताया कि हमारा सौरमण्डल लगभग 250 करोड़ प्रकाश वर्ष चौड़ा है।

ब्रह्माण्ड की उत्पत्ति

इसके बारे में सबसे ज्यादा मान्यता प्राप्त सिद्धान्त ‘बिग-बैंग सिद्धान्त’(Big-Bang Theory) है, इसे ‘जॉर्ज लेमेण्टर’ ने प्रस्तुत किया था, इस सिद्धान्त के अनुसार 15 अरब वर्ष पूर्व हमारा ब्रह्माण्ड भारी पदार्थों से मिलकर बना बड़े आकार का गोला था, जिसमें लगातार विस्फोट एवं विखंडन होते गए तथा तारों, ग्रहों एवं उपग्रहों का निर्माण होता गया।

इस सिद्धान्त के अनुसार ब्रह्माण्ड वर्तमान में भी लगातार प्रसारित हो रहा है।

बिग-बैंग सिद्धान्त की प्रायोगिक पुष्टि करने के लिए सर्न (CERN) ‘यूरोपीयन सेंटर फॉर न्यूक्लियर रिसर्च’ ने स्विट्ज़रलैण्ड व फ्रांस की बॉर्डर के निकट जमीन में 100 फीट नीचे 27 किमी. की सुरंग में महाप्रयोग ‘लार्ज हैड्रॉन कोलाइडर’ के अंदर किया, इसमें परमाण्वीय कणों का तेज गति से आपस में टकराव करवाया जिससे ‘हिग्स-बोसोन कण’ प्राप्त हुआ इसे ‘गॉड पार्टिकल’ भी कहते हैं, इस हिग्स-बोसोन कण से ही पूरे ब्रह्माण्ड की उत्पत्ति मानी जाती है।

आकाशगंगा एवं तारामण्डल

हमारे ब्रह्माण्ड में लगभग 100 अरब आकाशगंगा (Galxies) मानी गई है।

यह आकाशगंगा अनेक तारों के समूहों (तारामण्डल) से मिलकर बनी होती है, इसका केंद्रीय भाग बल्ज की 3 भुजाएँ घूर्णन (Rotation) करती है। केंद्रीय भाग पर तारों का केंद्रण सर्वाधिक होता है। प्रत्येक आकाशगंगा में लगभग 100 अरब तारे माने गए हैं।

‘लिमन अल्फा ब्लॉब’ सबसे बड़ी आकाशगंगा है।

हमारी आकाशगंगा ‘मंदाकिनी’ है, जिसका व्यास लगभग 1 लाख प्रकाश वर्ष है। हमारी सबसे पास में दूसरी आकाशगंगा ‘एंड्रोमेडा’ है।

हमारी आकाशगंगा सर्पिलाकार है, इस आकाशगंगा में अत्यधिक संख्या में पास-पास स्थित तारों का समूह ‘मिल्की-वे’ कहलाता है।

हमारा सौरमण्डल इसी आकाशगंगा का एक भाग है।

तारे (Stars)

  • ब्रह्माण्ड में हाइड्रोजन के बादल अथवा समूह गति करते हुए पास-पास आने लगते हैं।
  • नाभिकीय संलयन द्वारा हीलियम का निर्माण होता है।
  • यह चमकते हुए तारे सा प्रतीत होता है।
  • सर्वप्रथम केन्द्रीय भाग की हाइड्रोजन पूरी तरह से हीलियम में रूपांतरित होती है बाद में परिधि की तरफ स्थित हाइड्रोजन का रूपांतरण हीलियम में होता है। 
  • सम्पर्ण हाड्रोजन के हीलियम में रूपांतरण के बाद अब हीलियम का रूपांतरण कार्बन में तथा कार्बन भारी तत्त्वों में बदलने लगता है, जिससे तारे का आकार बड़ा होने लगता है तथा लाल रंग का दिखाई देने लगता है जिसे ‘लाल दानव’ भी कहते हैं। इस अवस्था में तारा मृत्यु की ओर अग्रसर होता है (प्रत्येक तारे की एक आयु होती है) और इस दौरान होने वाला विस्फोट ‘सुपरनोवा विस्फोट’ कहलाता हैं।

सुपरनोवा विस्फोट

यदि तारे का द्रव्यमान चंद्रशेखर सीमा (1.4 Ms) से कम हो तो तारा पहले श्वेत वामन तारा (White Dwarf Star) या फिर जीवाश्म तारा (Fossil Star) में रूपांतरित होता है, अंत में यह काला वामन तारा (Black Dwarf Star) में रूपांतरित हो जाता है एवं वह एक छोटे पिण्ड के रूप में परिवर्तित हो जाता है।

यदि तारे का द्रव्यमान चंद्रशेखर सीमा (1.4 Ms) से अधिक हो तो यह पहले न्यूट्रॉन (Pulsar) तारे में रूपांतरित होते हैं अब इसमें लगातार संकुचन होने से इसका घनत्व बहुत ज्यादा बढ़ जाता है, अंत में यह ब्लैक हॉल (Black Hole) में रूपांतरित हो जाता है।

  • ब्लैक हॉल (Black Hole) ऐसी संरचना है, जिसका घनत्व लगभग अनंत होता है एवं इस पर सामान्य भौतिकी एवं प्रकाश के नियम लागू नहीं होते हैं।
  • ब्लैक हॉल के बारे में सर्वप्रथम ‘जॉन व्हीलर’ ने बताया था।
  • अप्रैल, 2019 में पहली बार महिला वैज्ञानिक ‘कैटी बौमेन’ के नेतृत्व में ब्लैक हॉल की तस्वीरें जारी की गई।
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