बाल विकास के सिद्धांत

 बाल विकास के सिद्धांत क्या है?

  • मनोविश्लेषणात्मक सिद्धांत
  • मनोलैंगिकविकास सिद्धांत

मनोविश्लेषणात्मक विकास

सि. फ्रायर्ड-1900 वियना (ऑस्ट्रीया) – सिग्मण्ड फ्रायर्ड को मनोविश्लेषण सिद्धांत का जनक माना जाता है।

सि. फ्रायर्ड एक मनोविश्लेषणवादी मनोवैज्ञानिक थे, जिन्होंने व्यक्ति के मन का विश्लेषणात्मक अध्ययन किया।

सि. फ्रायर्ड ने मन के तीन भेद बताये और उनका विश्लेषणात्मक अध्ययन किया।

सि. फ्रायर्ड के अनुसार व्यक्ति का प्रत्येक कार्य अचेतन मन के कारण प्रारंभ होता है तथा व्यक्ति अपनी दमित इच्छाओं एवं आवश्यकताओं की पूर्ति करने हेतु कार्य प्रारंभ करता है तथा व्यक्ति कार्य करते समय चेतन मन में होता है एवं व्यक्ति को जीवन में मिलने वाली असफलताएँ अर्द्ध चेतन मन के कारण प्राप्त होती है।

सि. फ्रायर्ड ने मन के तीन भागों का विश्लेषणात्मक अध्ययन किया। इस कारण इसे मनोविश्लेषण सिद्धांत कहा गया।

सि. फ्रायर्ड ने मन के तीन प्रकार/भेद बताये

चेतन मन

  • मस्तिष्क की जागृत अवस्था को “चेतन मन’ कहते हैं।
  • मन का वग भाग, जो अपना ध्यान विषय वस्तु पर केंद्रित करता है “चेतन’ कहलाता है।
  • सि. फ्रायर्ड के अनुसार व्यक्ति कार्य करते समय चेतन मन में होता है।
  • सि. फ्रायर्ड ने चेतन का कुल भाग 1/10वां भाग या 12.5% भाग बताया।

अचेतन मन

  • दमित इच्छाओं, आवश्यकताओं एवं कुण्ठाओं का भण्डारगृह “अचेतन मन’ कहलाता है।
  • मन का वह भाग, जो अपना ध्यान विषय वस्तु पर केंद्रित न कर बाह्य जगत में विचरण करता हो “अचेतन मन’ कहलाता है।
  • सोचना, समझना, तर्क, विचार, चिंतन, अवधान, निर्णय “अचेतन मन’ के तत्त्व कहलाते हैं।
  • सि. फ्रायर्ड के अनुसार व्यक्ति की बुद्धि का संबंध अचेतन मन से होता है।
  • सि. फ्रायर्ड ने अचेतन मन का कुल भाग 87.5% या 9/10वां भाग बताया।

अर्द्धचेतन मन

  • इसका संबंध चेतन व अचेतन मन से होता है।
  • पूर्व में अधिगम की गई विषय वस्तु का समय पर ध्यान में न आकर कुछ बाधाओं के बाद ध्यान में आना अर्द्धचेतन मन कहलाता है। जैसे – याद की गई बातों को अचानक भूल जाना, अटक जाना, हकलाना आदि अर्द्धचेतन मन हो प्रदर्शित करती है।
  • नोट – सि. फ्रायर्ड ने व्यक्तित्त्व संरचना के आधार पर चेतन मन के तीन भेद बताये –
  1. इदम (ID)
  2. अहम (Ego)
  3. पर अहम (Super-Ego)

इदम (Id)

  • इस अवस्था को सुखवादी सिद्धाँत के नाम से भी जाना जाता है।
  • यह अवस्था इच्छाओं एवं आवश्यकताओं का भण्डारगृह है।
  • Id का संबंध अचेतन मन से होता है।
  • व्यक्ति का प्रत्येक कार्य इसी भाग में प्रारंभ होता है।

अनुचित व अपराध कार्य इसी भाग में होते हैं।

इसे निरंकुशवादी सिद्धांत भी कहते हैं।

  • यह व्यक्ति को अच्छे कार्यों से बूरे कार्यों की ओर अग्रसर करता है।
  • इसमें भोग-विलास/काम वासना की प्रवृत्ति पाई जाती है।
  • इसमें परद प्रवृत्ति पाई जाती है।

अहम (Ego)

  • इस अवस्था को वास्तविक सिद्धांत के नाम से भी जाना जाता है।
  • इसका संबंध चेतन मन से होता है। यह अवस्था Id व Super Ego के बीच संतुलन स्थापित करती है।
  • इस अवस्था को व्यक्ति का कार्यपालक माना जाता है।
  • यह समायोजन की अवस्था कहलाती है।
  • इसे मन का वकील कहते हैं।

परम अहम (Super Ego)

  • इस अवस्था को आदर्शवादी सिद्धांत के नाम से भी जाना जाता है।
  • इसमें व्यक्ति का रुझान आध्यात्मिकता की ओर रुझान हो जाता है।
  • इसमें व्यक्ति नैतिक व आदर्शवादी बातें करता है।
  • आदर्शों की अधिकता व्यक्ति को कुसमायोजित कर सकती है।
सि. फ्रायर्ड ने दो मूल प्रवृत्तियाँ बताई।
  • जीवन मूल प्रवृत्ति – अच्छी व आदर्श की बातें / सकारात्मक
  • मृत्यु मूलक मूल प्रवृत्तियाँ – नकारात्मक
  • स्वमोह (नार्सिसिज्म) – स्वमोह/आत्मप्रेम/अपने आप में मस्त रहने व अपने आपसे प्रेम करने की क्रिया को नार्सिसिज्म कहते हैं।
  • ऑडी प्रसव इलेक्ट्रा ग्रंथि –सिग्मण्ड फ्रायर्ड के अनुसार लड़कों में ऑडी प्रसव बालिकाओं में इलेक्ट्रा ग्रंथिका विकास होता है। इस कारण बालक अपनी माँ के प्रति व बालिका अपने पिता के प्रति श्रद्धा भाव प्रकट करती है।
  • लिबिडो – सिग्मण्ड फ्रायर्ड ने काम प्रवृत्ति को लिबिडो नाम दिया। यह एक स्वाभावित प्रवृत्ति होती है और यदि इस प्रवृत्ति का दमन करने की कोशिश की जाती हैतो व्यक्ति कुसमायोजित हो जाता है।

मनोलैंगिक विकास सिद्धांत

सिग्मण्ड फ्रायर्ड के अनुसार काम प्रवृत्ति बालक में जन्म से पायी जाती है तथा भिन्न-भिन्न अवस्थाओं को इसका स्वरूप भिन्न होता है। इस आधार पर उन्होंने मनोलैंगिक विकास सिद्धाँत को 5 अवस्थाओं के आधार पर समझाया –

  1. मुखीयवस्था (0-1 वर्ष) – इस अवस्था में काम प्रवृत्ति मुख के क्षेत्र में केंद्रित होती है।
  2. गुदीय अवस्था (1-3 वर्ष) – इस अवस्था में काम प्रवृत्ति गृदा क्षेत्र में केंद्रित होती है। इस अवस्था में बालक जिद्दी, आक्रामक व धारणात्मक हो जाता है।
  3. लैंगिक अवस्था (3-6 वर्ष) – इस अवस्था में बालक का ध्यान जननांगों की तरफ जाता है।
  4. अदृश्यावस्था/सुप्तावस्था – इस अवस्था में काम प्रवृत्ति अदृश्य हो जाती है। यह शरीर के किसी भी भाग में विद्यमान नहीं होती है।
  5. जननेन्द्रियावस्था ( 12 वर्ष के बाद ) – इस अंतिम अवस्था में काम प्रवृत्ति का उपयोग संतानोत्पत्ति की ओर अग्रसर होता है।

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