नैतिक विकास सिद्धांत

लॉरेन्स कॉहलबर्ग का मानना है कि बालक के नैतिक विकास को समझने के लिए उसके तर्क व चिंतन का विश्लेषण करना आवश्यक है और इस आधार पर उन्होंने नैतिक विकास सिद्धांत की 6 अवस्थाएँ बनायी है तथा उन्हें (3) स्तरों में विभक्त किया।

प्री कन्वेशन स्तर/पूर्व परम्परागत स्तर

4-10 वर्ष इस स्तर में बालक के तर्क व चिंतन का आधार बाहरी घटना को माना जाता है। वह बाह्य घटना के आधार पर किसी को सही व गलत तथा उचित अनुचित बताता है। इस स्तर की दो अवस्थाऐं बताई गई है।

  1. आज्ञा व दण्ड की अवस्था
  2. अहंकार की अवस्था

कन्वेशनल स्तर / परंपरागत स्तर- 10 – 13 वर्ष

 इस स्तर में बालक के तर्क व चिंतन का आधार सामाजिक होता है। इसकी दो अवस्थाऐं बताई।

  • प्रशंसा प्राप्ति की अवस्था
  • उत्तम लड़का-लड़की की अवस्था

पोस्ट-कन्वेशनल स्तर – 13 वर्ष के बाद

इस स्तर में तर्क व चिंतन का आधार विवेक होता है। इस स्तर की दो अवस्थाऐं होती है।

  • सामाजिक समझौते की अवस्था
  • विवेक की अवस्था।

कॉहलबर्ग ने अपने सिद्धांत को आगे बढ़ाते हुए 5 अवस्थाएँ और बताई –

नैतिक विकास सिद्धांत

  • पूर्व नैतिक विकास की अवस्था (0-2 वर्ष)
  • स्वकेन्द्रित अवस्था (2-7 वर्ष)
  • परंपराओं को धारण करने की अवस्था (7-12 वर्ष)
  • आधारहीन आत्म चेतना की अवस्था (13-18 वर्ष)
  • आधारयुक्त आत्म चेतना की अवस्था (18 वर्ष के बाद)
  • बालक सर्वप्रथम संज्ञा शब्द का प्रयोग करता है।
  • संज्ञा के बाद बालक क्रिया शब्द सीखता है।
  • 18 माह में बच्चे विशेष शब्दों का प्रयोग करने लगता है। ठण्डा, ब्रूश, गर्म ।
  • 5 वर्ष में रंगों की पहचान करने लगता है।
  • 6 वर्ष की आयु में बालक तीन, पाँच, दस, सात अंकों का अर्थ समझने लगता है।
  • 5 वर्ष में बालक रुपये पैसे समझने लगता है।
  • 4 वर्ष के बाद बालक गंदे शब्दों का प्रयोग करने लगता है।
  • 6 वर्ष में लड़कियाँ गुप्त शब्दों का प्रयोग करने लगती है।
Spread the love

Leave a Comment

Your email address will not be published.

error: Content is protected !!