सिरोही के मंदिर | Sirohi Mandir GK

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सारणेश्वर महादेव

सिरोही से लगभग 3 किमी. दूर देवड़ा राजकुल का 15वीं सदी का भव्य सारणेश्वर मंदिर स्थापित है। यह मंदिर दुर्ग के रूप में निर्मित है। महाराव लाबाजी की पटरानी अपूर्वादेवी ने 1526 में इस मंदिर में हनुमानजी की मूर्ति की प्रतिष्ठा करवायी।

यहाँ रेबारी जाति को सबसे बड़ा मेला भाद्रपद शुक्ला द्वादशी को आयोजित होता है। इसके पास एक दुधिया तालाब स्थित है जिसके निकट सिरोही राजघराने की छतरियाँ हैं।

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मीरपुर का जैन मंदिर

सिरोही से लगभग 12 किमी. दूरी पर तीनों ओर से पहाड़ियों की गोद में स्थित इस मंदिर का निर्माण अशोक के पौत्र सम्प्रति ने करवाया। यह प्राकृतिक सौन्दर्य एवं शिल्प भव्यता के लिए प्रसिद्ध है।

बामणवाडजी

सिरोही से 17 किमी. दूर स्थित इस मंदिर का निर्माण महावीर स्वामी काल में पूरणपाल नामक राजा ने करवाया। इसकी प्रतिष्ठा केशी नामक गणधर ने की।

सायला

जैन मंदिरों के लिए प्रसिद्ध स्थल।

देरीसेरी

सिरोही के राजमहल के निकट स्थित 15 जैन मंदिरों का कतारबद्ध समूह।

दिलवाड़ा जैन मंदिर

दिलवाड़ा (आबू) में पाँच जैन मंदिरों का समूह हैं जिनमें विमलवसही (आदिनाथ) एवं लूणवसही (नेमीनाथ) मंदिर स्थापत्य प्रमुख हैं। यह 11वीं से 13वीं सदी में नागर शैली में निर्मित सोलंकी कला के उत्कृष्ट मंदिर हैं। आबू पर्वत पर दिलवाड़ा मंदिर परिसर में पाँच श्वेताम्बर मंदिर एवं एक दिगम्बर जैन मंदिर है।

  1. विमलवसही मंदिर (आदिनाथ)
  2. लूणवसही मंदिर (नेमीनाथ)
  3. पितलहर (भीमशाह) मंदिर
  4. पार्श्वनाथ जैन मंदिर
  5. महावीर स्वामी जैन मंदिर

विमलवसही मंदिर (आदिनाथ मंदिर)

भगवान ऋषभदेव का मंदिर जिसे 1031 में चालुक्य राजा भीम के मंत्री विमलशाह ने निर्मित करवाया। आदिनाथ की पीतल की मूर्ति 48 स्तम्भों के मंडप में प्रतिष्ठित है। इस मंदिर का शिल्पी किर्तिधर था।

मंदिर के केन्द्रीय कक्ष में आठ स्तम्भों पर टिकी गोलाकार छत की भव्य नक्काशी स्थापत्य का एक उत्कृष्ट नमूना हे। कर्नल टॉड ने कहा है कि- “भारतवर्ष के भवनों में ताजमहल के बाद यदि कोई भवन है तो वह विमलशाह का मंदिर।’’ ऋषभदेव काे समर्पित इस मंदिर के निर्माण के समय आबू पर परमार शासक राजा धंधुक का शासन था।

लूणवसही (नेमीनाथ) मंदिर

चालुक्य राजा वीर धवल के महामंत्री तेजपालवास्तुपाल के शिल्पी शोभनदेव द्वारा (1230-31 ई. में) निर्मित दो मंदिर। मुख्य मंदिर के द्वार के दोनों ओर दो ताक हैं, जिन्हें देवरानी-जेठानी के गवाक्ष कहते हैं।

इस मंदिर का निर्माण वास्तुपाल एवं तेजपाल ने अपने स्वर्गीय भाई लूंबा की याद में बनवाया था। यहाँ नेमीनाथ जी की काले पत्थर की प्रतिमा स्थापित की गयी है। इस मंदिर को देवरानी-जेठानी का मंदिर भी कहा जाता है। यह मंदिर 22वें जैन तीर्थंकर नेमीनाथ का है।

पार्श्वनाथ जैन मंदिर

15वीं सदी में मंडलीक द्वारा निर्मित तीन मंजिला मंदिर। इस मंदिर को चौमुखा पार्श्वनाथ मंदिर सिलावटों का मंदिर भी कहा जाता है।

महावीर स्वामी का मंदिर

हस्तीशाला के पास स्थित लघु मंदिर जिसकी दीवारों व गुम्बद में प्राचीन चित्रकारी विद्यमान है।

भामाशाह मंदिर

भामाशाह द्वारा निर्मित मंदिर। जैन तीर्थंकर आदिनाथ की 108 मण की पीतल प्रतिमा के कारण इस मंदिर को पितलहर भी कहते हैं।

भगवान कुंथुनाथ का दिगम्बर जैन मंदिर (सिरोही)

यह मंदिर लूणवसही मंदिर के बाहर दायीं ओर स्थित है। सन् 1449 में महाराणा कुंभा ने इसको बनवाया था। यही दायीं ओर वृक्षों के झुरमुट में युगप्रधान दादा जिनदत्त सूरि की छतरी बनी हुई है। यह मंदिर दिगम्बर जैन मंदिर है जबकि दिलवाड़ा के अन्य जैन मंदिर श्वेताम्बर सम्प्रदाय के हैं।

वशिष्ठ का मंदिर

सिरोही में बसंतगढ़ दुर्ग में स्थित मंदिर। यहाँ प्रसिद्ध अग्निकुण्ड स्थित है जिससे वशिष्ठ मुनि द्वारा चार राजपूत जातियों की उत्पत्ति करने का उल्लेख मिलता है।

अर्बुदा/अधर/अम्बिका देवी का मंदिर

दुर्गा माता का 4250 फीट ऊँचा यह मंदिर विशाल शिला के नीचे गुफा में स्थित है, जिसमें प्रवेश के लिए नीचे बैठकर जाना पड़ता है। इसकी तलहटी में दूध बावड़ी नामक ऐतिहासिक स्थल स्थित है।

अचलेश्वर महादेव का मंदिर

इसमें शिवलिंग के स्थान पर एक खड्ढ़ा बना हुआ है जो ब्रह्म खण्ड कहलाता है। इस मंदिर में शिवजी के पैर का अंगुठा है। मंदिर में राणा लाखा द्वारा अर्पित एक त्रिशुल भी स्थापित है।

यहाँ शिव को समर्पित अचलेश्वर महादेव मंदिर में पीतल की बनी नंदी की सुंदर प्रतिमा है। इसके पास ही मन्दाकिनी कुण्ड है जिसका जल गंगा की तरह पवित्र है। कहा जाता है कि इसका जल कभी नहीं सूखता। इसके ऊपर जाने पर भृर्तहरि की गुफा मिलती है।

जीरावला

 रेवदर से 10 किमी. दूर स्थित गाँव जहाँ लगभग 2 हजार वर्ष पुराने जैन मंदिर है।

बाजना गणेश का मंदिर

यहाँ 10-12 फुट की ऊंचाई से एक झरने का जल एक कुण्ड में गिरता है। इस झरने की आवाज के कारण यहाँ विराजमान गणेशजी बाजना गणेश कहलाते हैं।

ऋषिकेश मंदिर

आबू के उमरणी गाँव में लगभग 7000 वर्ष पुराना भगवान विष्णु का मंदिर। इस मंदिर का प्रथम उल्लेख स्कन्द पुराण में मिलता है। राजा अमरीश द्वारा निर्मित इस मंदिर में भाद्रपद शुक्ल एकादशी को भव्य मेला भरता है।

भूरिया बाबा का मंदिर

चौटीला ग्राम के पास सूकड़ी नदी के किनारे स्थित मंदिर। भूरिया बाबा मीणा समाज के आराध्य देव माने जाते हैं। इस मंदिर को गौतम ऋषि महादेव का मंदिर भी कहा जाता है।

कुंवारी कन्या का मंदिर / रसिया बालम मंदिर

देलवाड़ा के दक्षिण में पर्वत की तलहटी में स्थित है। इस मंदिर में देव मूर्ति के स्थान पर दो पाषाण मूर्तियाँ स्थापित है। इन दोनों में से एक मूर्ति युवक क है जिसके हाथ में विष का प्याला है तथा दूसरी मूर्ति युवती की है। इस मंदिर को प्रेम प्रासंगिक मंदिर भी कहा जाता है।

सिरोही के अन्य मंदिरों में क्षेमकरी मात का मंदिर (बसंतगढ़), मार्कण्डेश्वर मंदिर (अंजारी), भुवनेश्वर (डाडुआ), सूर्य मंदिर (वरमान), शिव मंदिर (कुसुमा) एवं भद्रकाली माता मंदिर प्रमुख हैं।

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