राजस्थान के दुर्ग | Rajasthan forts

राजस्थान के दुर्ग

मांडलगढ़ दुर्ग

Rajasthan forts

आमेर दुर्ग

दुर्ग के अन्य नाम :- आम्बेर, अम्बिकापुर, अम्बर, अम्बावती

  • प्रवेश द्वार :- जयपोल, सिंहपोल, गणेश पोल, सूरज पोल, चाँदपोल।
  • सौभाग्य (सुहाग) मंदिर :- आयताकार महल, जो रानियों के मनोविनोद तथा हृास-परिहृास का स्थान था। इसके किवाड़ चंदन के बने हुए हैं।
  • बिशप हेबर ने आमेर के महलों को क्रेमलिन के महलों से भी ज्यादा सुन्दर एवं अलंकृत बताया।

आमेर दुर्ग के निकट नीचे मावठा तालाब एवं दिलाराम का बाग उसके सौन्दर्य को द्विगुणित करते हैं। सुखमंदिर :- दुर्ग में स्थित यह महल राजाओं का ग्रीष्मकालीन निवास था।

  • 1707 ई. में मुगल बादशाह मुअज्जम (बहादुरशाह) ने आमेर दुर्ग पर अधिकार कर उसका नाम मोमिनाबाद रखा।
  • दीवान-ए-आम एवं दीवान-ए-खास का निर्माण मिर्जा राजा जयसिंह ने करवाया था।
  • दुर्ग में गणेश पोल के निर्माता सवाई जयसिंह थे।
  • बालाबाई ( महाराजा पृथ्वीराज की रानी ) की साल इसी दुर्ग में है।

आमेर के जगत शिरोमणि मंदिर में प्रतिष्ठापित भगवान कृष्ण की काले पत्थर की मूर्ति लगी हुई है। यह मूर्ति आमेर के राजा मानसिंह द्वारा चित्तौड़ से लाई गयी थी। इस मंदिर का निर्माण महाराजा मानसिंह की पत्नी कनकावती द्वारा अपने दिवंगत पुत्र जगतसिंह की याद में करवाया गया था।

जयगढ़ दुर्ग

  • गिरि दुर्ग
  • निर्माण :- मिर्जा राजा जयसिंह द्वारा।
  • परिवर्द्धनकर्ता :- सवाई जयसिंह द्वितीय।
  • स्थान :- चिल्ह का टीला (जयपुर) में।
  • प्रवेश द्वार :- डूंगर दरवाजा, अवनि दरवाजा एवं भैरु दरवाजा।
  • उपनाम :- रहस्यमयी दुर्ग, संकटमोचक दुर्ग, चिल्ह का टोला दुर्ग। यहाँ कच्छवाहा राजाओं का राजकोष रखा हुआ था, श्रीमती इंदिरा गाँधी के प्रधानमंत्रित्व काल में गुप्त खजाने के लिए खुदाई की गई।

इसका निर्माण प्राचीन भारतीय वास्तुशास्त्र के निर्धारित मानकों के अनुसार किया गया है। इस दुर्ग के प्रमुख भवनों में जलेब चौक, सुभट निवास, खिलबत निवास, लक्ष्मी निवास, ललित मंदिर, आराम मंदिर आदि हैं।

  • विजयगढ़ी :- किले में स्थित लघु दुर्ग।
  • दिया बुर्ज :- सबसे ऊँचा बुर्ज (7 मंजिला)।
  • जयबाण :- 1720 ई. में निर्मित एशिया की सबसे बड़ी तोप।
  • जयबाण तोप की मारक क्षमता :- 32 किलोमीटर
  • जयगढ़ दुर्ग भारत का एकमात्र दुर्ग है, जहाँ तोप ढालने का संयंत्र लगा हुआ है।
  • बादली, बजरंगबण मचवान :- इस दुर्ग में निर्मित तोपें।
  • इस किले में कठपुतलीघर स्थित है।
  • शांतिकाल में यह दुर्ग विशिष्ट राजनीतिक बंदियों के लिए कैदखाने के रूप में काम आता है।
  • दौसा किला :- दौसा जिले में दैवगिरि पहाड़ी पर गुर्जर-प्रतिहारों (बड़गुर्जरों) द्वारा निर्मित गिरि दुर्ग।
  • आकार :- छाजले के समान।
  • 11वीं सदी में कच्छवाहों ने यह दुर्ग बड़गुजरों से छीन लिया।
  • दुर्ग प्रवेश द्वार :- हाथीपोल एवं मोरी दरवाजा।
  • दुर्ग का निचला भाग दोहरे परकोटे से आबद्ध है।
  • दुर्ग में प्रसिद्ध ‘राजाजी का कुआं’ तथा बैजनाथ महादेव मंदिर है।
  • इस दुर्ग में ’14 राजाओं की साल’ है।
  • दादूपंथी सन्त सुन्दरदास जी का जन्म स्थान माना जाता है।

अचलगढ़ दुर्ग

  • परमार शासकों द्वारा 9वीं सदी में आबू (सिरोही) में निर्मित गिरि दुर्ग।
  • कर्नल टॉड ने माउण्ट आबू को ‘हिन्दू ओलम्पस’ (देव पर्वत) कहा है।
  • परमारों की राजधानी :- चन्द्रावती
  • 1452 ई. में महाराणा कुम्भा द्वारा पुनर्निर्माण।
  • प्रवेश द्वार :- हनुमान पोल, गणेश पोल, चम्पा पोल, भैरव पोल।

दुर्ग में दर्शनीय स्थल :- अचलेश्वर महादेव मंदिर, मन्दाकिनी कुण्ड, सावन-भादो झील, ओखा रानी का महल आदि।

‘भवराॅथल’ नामक स्थान का सम्बन्ध इसी दुर्ग से है जहाँ आक्रमणकारी महमूद बेगड़ा एवं उसके सैनिकों पर मधुमक्खियों ने आक्रमण कर दिया। इस दुर्ग के पास ही भरथरी की गुफाएँ हैं।

स्वर्णगिरी दुर्ग

जालौर दुर्ग के तोपखाने में परमार शासक वीसल का शिलालेख प्राप्त हुआ, जिसमें उसकी रानी मेलरदेवी द्वारा सन् 1118 ई. में सिंधु राजेश्वर मंदिर में स्वर्ण कलश चढ़ाये जाने का वर्णन भी है।

प्रतिहार नरेश वत्सराज के शासनकाल में 778 ई. में जैन आचार्य उद्योतन सूरि ने अपने प्रसिद्ध ग्रंथ कुवलयमाला की रचना की।

  • चौहानों की जालौर शाखा का संस्थापक :- कीर्तिपाल।
  • सुंधा पर्वत अभिलेख में कीर्तिपाल के लिए ‘राजेश्वर’ शब्द का प्रयोग हुआ।
  • अलाउद्दीन खिलजी ने कान्हड़देव के समय 1311-12 ई. में जालौर पर आक्रमण कर इस दुर्ग का नाम ‘जलालाबाद’ रख दिया।
  • 1311 ई. में इस दुर्ग का पतन बीका नामक दहिया राजपूत की गद्दारी से हुआ था।

इस दुर्ग में संत मलिक शाह की दरगाह, परमार कालीन कार्ति स्तम्भ, ‘स्वर्णगिरि’ मंदिर (जैन मंदिर), तोपखाना मस्जिद, आशापुरा माता का मंदिर एवं वीरमदेव की चौकी प्रमुख है।

स्वतंत्रता आन्दोलन के समय मथुरादास माथुर, गणेशीलाल व्यास, फतहराज जोशी जैसे नेताओं को किले में नजरबंद रखा गया। किले में बनी तोपखाना मस्जिद पूर्व में परमार शासक भोज द्वारा निर्मित संस्कृत पाठशाला थी।

जूनागढ़ दुर्ग

  • धान्वन दुर्ग, भूमि दुर्ग एवं पारिख दुर्ग।
  • 1589 ई. में महाराजा रायसिंह ने इस दुर्ग की नींव रखी, जो 1594 में बनकर पूर्ण हुआ।
  • आकृति :- चतुष्कोण या चतुर्भुजाकृति।
  • लाल पत्थरों से निर्मित होने के कारण ‘लालगढ़’ भी कहा जाता है।
  • प्रवेश द्वार :- बाहरी :- कर्णपोल एवं चाँदपोल।
  • भीतरी :- दौलतपोल, फतेहपोल, रतनपोल, सूरजपोल एवं ध्रुवपोल।
  • सूरजपोल पर राजा रायसिंह की प्रशस्ति उत्कीर्ण है। (प्रशस्ति रचयिता जैता)
  • सूरजपोल दरवाजे के दोनों तरफ 1567 ई. के चित्तौड़ साके में वीरगति पाने वाले जयमल मेड़तिया व उसके बहनोई आमेर के राव फत्ता (पता) सिसोदिया की गजारुढ़ मूर्तियां स्थापित हैं।
  • दुर्ग की प्राचीर बहुत सुदृढ़ है तथा उनमें 37 बुर्जे बनी हुई हैं।
  • राजपूत एवं मुगल स्थापत्य शैली का समन्वय है।
  • उपनाम :- ‘जमीन का जेवर’ लालगढ़ दुर्ग, रातीघाटी का किला।
  • दुर्ग के अनूपमहल में शासकों का राजतिलक होता था।
  • दुर्ग के दर्शनीय स्थल :- अनूप संग्रहालय, फूलमहल, चन्द्रमहल, लाल निवास, छत्र महल, गंगा निवास, दलेल निवास, रतन निवास आदि।
  • दुर्ग में दो कुएँ :- रामसर एवं रानीसर। दुर्ग के भीतर 33 करोड़ देवी-देवताओं का मंदिर हैं जिसमें सिंह पर सवार गणपति (हेरंब गणपति) की दुर्लभ प्रतिमा है।
  • राजस्थान में पहली बार लिफ्ट इसी दुर्ग में लगाई थी।
  • जूनागढ़ दुर्ग के सम्बन्ध में दीनानाथ दुबे की उक्ति  ‘दीवारों के भी कान होते है पर जूनागढ़ के महलों की दीवारें तो बोलती हैं।’
  • यह दुर्ग वास्तव में आगरा के दुर्ग से मिलता-जुलता है।

भटनेर का किला

  • घग्घर नदी के मुहाने पर हनुमानगढ़ में स्थित धान्वन दुर्ग
  • निर्माता :- भूपत द्वारा तीसरी शताब्दी में। (295 ई.)
  • दिल्ली-मुल्तान मार्ग पर स्थित।
  • उपनाम :- उत्तरी सीमा का प्रहरी
  • 1001 में महमूद गजनवी ने इस पर अधिकार कर लिया।

1398 में तैमूर लंग ने राव दूलचन्द भाटी को परास्त कर इस दुर्ग पर अधिकार कर लिया। इस दुर्ग में 52 विशाल बुर्ज हैं। किले का निर्माण पकी हुई ईटों और चूने से हुआ था।

सर्वाधिक विदेशी आक्रमण सहने वाला दुर्ग। तैमूर के आक्रमण के समय यहाँ हिन्दू स्त्रियों के साथ-साथ मुस्लिम महिलाओं द्वारा भी जौहर किया गया था।

तैमूर ने अपनी आत्मकथा तुजुक-ए-तैमूरी में इस दुर्ग की प्रशंसा में लिखा है कि उसने इतना सुरक्षित व मजबूत दुर्ग पूरे हिन्दुस्तान में कहीं नहीं देखा। पुनर्निर्माण :- राजा अभयराव भाटी द्वारा।

बीकानेर के राजा सूरतसिंह द्वारा सन् 1805 में मंगलवार के दिन इस किले को फतह करने के कारण भटनेर का नाम हनुमानगढ़ रख दिया। इस दुर्ग में बलबन के किलेदार शेर खाँ की कब्र है। भटनेर दुर्ग में एक प्रवेश द्वार पर एक राजा के साथ 6 नारी आकृतियाँ बनी हैं।

भैसरोड़गढ़ दुर्ग

  • जल दुर्ग
  • चित्तौड़गढ़ में चम्बल और बामनी नदियों के संगम पर स्थित।
  • निर्माता :- भैंसाशाह नामक व्यापार तथा रोड़ा चारण द्वारा।
  • उपनाम :- राजस्थान का वैल्लोर
  • कर्नल टॉड ने इसे अभेध दुर्ग कहा है।

नागौर दुर्ग

  • धान्वन दुर्ग व स्थल दुर्ग।
  • निर्माण :- वि. स. 1211 में कैमास (चौहान शासक सोमेश्वर का सामन्त) द्वारा
  • उपनाम :- अहिच्छत्रपुर दुर्ग, नागदुर्ग।
  • दुर्ग में सिराई पोल, बिचली पोल, कचहरी पोल, सूरज पोल, धूपी पोल व राज पोल नामक 6 दरवाजे हैं।

नागाैर का दुर्ग वीर शिरोमणि अमरसिंह राठौड़ के शौर्य एवं स्वाभिमान के लिए प्रसिद्ध है। अकबर ने इस दुर्ग को बीकानेर शासक रायसिंह को सौंपा। नागौर दुर्ग दुहरे परकोटे से आबद्ध हैं जिसमें 28 विशाल बुर्जे हैं।

सुदृढ़ प्राचीर एवं जल परिखा इस दुर्ग की महत्वपूर्ण सामरिक विशेषता थी। 1570 ई. में अकबर अजमेर में ख्वाजा साहब की जियारत करने के बाद नागौर आया तथा यहाँ पर लगभग दो महीने रहा। उसने यहाँ एक तालाब खुदवाया जिसका नाम शुक्र तालाब था।

इस दुर्ग में वीर अमरसिंह राठौड़ की छतरी, तारकीन की दरगाह, ज्ञानी तालाब, वंशीवाला का मंदिर, वरमाया का मंदिर, अन्न गोदाम आदि ऐतिहासिक दृष्टि से प्रमुख हैं।

दुर्ग के भीतर बादल महल एवं शीश महल में सुन्दर भित्ति चिद्ध बने हैं। नागौर के दुर्ग की मुख्य विशेषता यह है कि इसके बाहर से चलाये गये तोपों के गोले किले के महलों को क्षति पहुँचाये बिना ही ऊपर से निकल जाते हैं।

लौहागढ़ दुर्ग

  • भरतपुर में स्थित पारिख व भूमि दुर्ग।
  • निर्माण :- 1733 ई. में जाट राजा सूरजमल द्वारा।
  • पत्थर की पक्की प्राचीर से घिरा दुर्ग।
  • इस दुर्ग के चारों और गहरी खाई है जिसमें मोती झील से सुजान गंगा नहर द्वारा पानी लाया गया है।
  • इस दुर्ग के प्रवेश द्वार पर लगा हुआ अष्ट धातु दरवाजा है, जिसे महाराजा जवाहरसिंह 1765 ई. में दिल्ली में मुगलों से जीतने के बाद लाल किले से लाए थे।

दुर्ग में महलखास, कोठीखास, किशोरी महल, सिलह खाना, दरबार खास आदि प्रमुख महल हैं। 18 मार्च 1948 को मत्स्य संघ का उद्‌घाटन इसी दुर्ग में हुआ था। किले में 8 बुर्ज हैं जिसमें जवाहर बुर्ज एवं फतेह बुर्ज प्रमुख हैं। मैदानी दुर्गों की श्रेणी में विश्व का सर्वश्रेष्ठ दुर्ग।

मिट्‌टी से बना दुर्ग अपनी अजेयता के लिए प्रसिद्ध है। इस किले को अंग्रेज व मुगल नहीं जीत पाये। लॉर्ड लेक ने इस दुर्ग को जीतने का पाँच बार असफल प्रयास किया।

चूरू का किला

  • निर्माता :- 1739 ई. में ठाकुर कुशालसिंह
  • दुर्ग में गोपीनाथ मंदिर है।
  • अपनी आजादी व अस्मिता के लिए इस दुर्ग में ठाकुरों ने गोले-बारुद खत्म होने पर दुश्मनों पर चाँदी के गोले दागे। (ठाकुर :- शिवसिंह)

शेरगढ़ दुर्ग (धौलपुर)

यह सम्प्रदायिक सद्‌भाव का जीता जागता नमूना है जिसमें एक तरफ सद्दीक खाँ का मकबरा तथा दूसरी तरफ हनुमानजी का मन्दिर है। सैय्यद की मंजार इसी दुर्ग में है। (शेरशाह सूरी द्वारा निर्मित)

यह दुर्ग 1804 ई. से 1811 ई. की अवधि में धौलपुर के प्रथम राजा शासक कीरतसिंह की राजधानी रहा था। अष्टधातु की विशाल हुनहुंकार तोप इसी दुर्ग में है।

शेरगढ़ दुर्ग

  • बारां। (परवन नदी के किनारे)
  • यह गिरि व जल दुर्ग है।
  • उपनाम :- कोशवर्द्धन दुर्ग, दक्षिण का द्वार।
  • कोशवर्द्धन पर्वत शिखर पर अवस्थित।

देवदत्त द्वारा दुर्ग के प्रवेश द्वार (बरखेड़ी दरवाजा) के पास उत्कीर्ण शिलालेख (वि. स. 847) से ज्ञात होता है कि यहाँ बिन्दुनाग, पद्‌मनाग, सर्वनाग तथा देवदत्त आदि नागवंशीय शासकों ने शासन किया।

देवदत्त ने दुर्ग के पास ही एक बौद्ध मठ एवं बौद्ध विहार बनवाया था। इस दुर्ग में झाला जालिमसिंह ने शेरगढ़ का जीर्णोद्धार करवाया तथा ‘झालाओं की हवेली’ भवन का निर्माण किया।

इस दुर्ग में सोमनाथ मंदिर, चारभुजा मंदिर, झालाओं की हवेली, अमीर खाँ महल आदि दर्शनीय स्थल हैं।

मैगजीन किला

अजमेर में मुगल शासक अकबर द्वारा 1571-72 में निर्माण। अन्य नाम :- अकबर का दौलतखाना, मुगल किला।

यह मुगलों द्वारा मुस्लिम-हिन्दू दुर्ग निर्माण पद्धति से बनाया गया राजस्थान का एकमात्र दुर्ग है। 1576 ई. के हल्दीघाटी युद्ध की अन्तिम योजना इसी दुर्ग में बनी थी। 10 जनवरी, 1616 को इंग्लैण्ड सम्राट जेम्स प्रथम के दूत टॉमस रो ने इसी दुर्ग में बादशाह जहाँगीर से मुलाकात की थी।

1801 में अंग्रेजों ने इस किले पर अधिकार कर इसे अपना शस्त्रागार (मैगजीन) बना लिया। अकबर का किला वर्गाकार व पश्चिमोन्मुखी है। अकबर के पुत्र दनियाल तथा शाहजहाँ के पुत्र शाहजदा शुजा का जन्म इसी किले में हुआ। इस किले में राजकीय पुरातात्विक संग्रहालय (राजपुताना म्यूजियम) है।

बयाना दुर्ग

  • गिरि व वन दुर्ग।
  • यादव वंशी राजा विजयपाल ने यह दुर्ग भरतपुर में दमदमा पहाड़ी पर 1040 ई. के लगभग बनाया था।
  • दुर्ग का अन्य नाम :- विजयमंदिरगढ़
  • भीम लाट (उषा लाट) :- दुर्ग के भीतर लाल पत्थरों से निर्मित 8 मंजिला ऊँची लाट। इसे राजस्थान की कुतुबमीनार कहा जाता है। इसे महाराजा विष्णुवर्द्धन द्वारा बनवाया गया था।

उषा मंदिर :- वि. स. 1012 ई. में रानी चित्रलेखा द्वारा निर्मित। इस दुर्ग में समुद्रगुप्त द्वारा बनाया गया विजय स्तम्भ भी है। खानवा के युद्ध के बाद बाबर इसी दुर्ग में आया था।

यहाँ लोदी मीनार, अकबर की छतरी, जहाँगीरी दरवाजा, सराय सादुल्ला (1565 में निर्मित), दाउद खाँ की मीनार दर्शनीय है। इस मंदिर का मुख्य द्वार लाल पत्थरों का बना है।

राजस्थान का एकमात्र दुर्ग जिसमें सर्वाधिक कब्रे हैं। यह दुर्ग दिल्ली के सुल्तानों के युद्ध के संचालन व सैनिक विश्राम गृह का कार्य करता था। हुमायूँ के शासनकाल में उसके चचेरे भाई मुहम्मद जमान मिर्जा को इसी दुर्ग में कैद रखा गया।

खण्डार का किला

  • सवाईमाधोपुर से लगभग 40 किमी. पूर्व में स्थित गिरि दुर्ग
  • आकृति :- त्रिभुजाकार।
  • यहाँ अष्टधातु निर्मित ‘शारदा तोप’ अपनी मारक क्षमता हेतु प्रसिद्ध है। यह रणथम्भौर के चाैहान वंशीय शासकों द्वारा 8वीं – 9वीं सदी में निर्मित दुर्ग है।

इस दुर्ग का उपयोग मूलत: सैन्य साज-सज्जा, युद्ध अभियानों की तैयारी, सैनिक प्रशिक्षण तथा अन्य सैनिक गतिविधियों के लिए किया जाता है।

 दुर्ग में प्रमुख जलाशय :- सता कुण्ड, लक्ष्मण कुण्ड, बाण कुण्ड, झिरी कुण्ड आदि।

तिमनगढ़ (त्रिभुवनगढ़)

  • करौली में निर्मित गिरि दुर्ग।
  • निर्माता :- तहणपाल अथवा त्रिभुवनपाल द्वारा 11वीं सदी में।
  • मुस्लिम आधिपत्य के बाद इसका नाम इस्लामाबाद कर दिया गया था।
  • त्रिभुवनगिरि पहाड़ी पर निर्मित।

मुख्य प्रवेश द्वार :- जगनपोल एवं सूर्यपोल।

हसन निजामी द्वारा लिखित ‘ताज-उल-मिसिर’ तथा मिनहाज सिराज कृत ‘तबकाते नासिरी’ में तिमनगढ़ के ऊपर गौरी के अधिकार का उल्लेख हुआ है।

दुर्ग में खास महल, ननद-भोजाई का कुआँ, राजगिरी, दुर्गाध्यक्ष के महल आदि हैं।

भोपालगढ़ दुर्ग

  • खेतड़ी में तत्कालीन ठाकुर भोपालसिंह द्वारा 1770 ई. में निर्मित।
  • उपनाम :- खेतड़ी का हवा महल।
  • यह दुर्ग संकीर्ण गलियारों के लिए प्रसिद्ध है।

बसन्तगढ़ दुर्ग

सिरोही जिले में बसन्तगढ़ दुर्ग का निर्माण मेवाड़ महाराणा कुम्भा ने करवाया था। दुर्ग में सूर्य मन्दिर एवं दत्तात्रेय का मंदिर स्थित है।

दुर्ग के प्राचीरों में सीमेन्ट या चूने का प्रयोग नहीं किया गया है। दुर्ग की पहाड़ी पर खींवल माता का मंदिर बना हुआ है।

भानगढ़ दुर्ग

  • अजबगढ़ (अलवर) में स्थित।
  • निर्माता :- माधोसिंह द्वारा 1631 ई. में।
  • वर्तमान में ‘भूतहा किले’ के रूप में प्रसिद्ध है।
  • यह दुर्ग सरिस्का अभयारण्य की सीमा के पास पहाड़ी पर स्थित है।

इस दुर्ग में मंगला माता मंदिर, नटणी की हवेली, भैरव गोपीनाथ, हनुमान मंदिर, सेवडे की छतरी सुरंग, गोमुख कुण्ड, बालकनाथ की धूनी आदि वर्तमान में खण्डहरों के रूप में हैं।

नीमराणा किला

  • पचमहल’ के नाम से विख्यात दुर्ग।
  • अलवर में 1464 ई. में चौहान शासकों के द्वारा निर्मित।
  • 2008 में ‘नीमराणा फोर्ट पैलेस’ में तब्दील।

राजोरगढ़ दुर्ग

  • टहला कस्बा (अलवर) में स्थित दुर्ग।
  • यहाँ 12वीं सदी तक बड़गूजर शासकों का अधिकार रहा।
  • 10वीं सदी में मंथन देव ने भव्य नीलकण्ठ महादेव मंदिर बनवाया।

नौगजा मंदिर :- जैन धर्म के 23वें तीर्थकर पार्श्वनाथ का मंदिर। अन्य नाम :- नीलकण्ठ दुर्ग। इस दुर्ग का उपयोग मुख्य रूप से सैनिक कार्यों व युद्ध अभियानों हेतु होता था।

कांकवाड़ी का दुर्ग

  • गिरि व वन दुर्ग।
  • अलवर के सरिस्का वन्य जीव अभयारण्य के मध्य
  • सघन और बीहड़ वन में स्थित।
  • निर्माता :- महाराजा सवाई जयसिंह द्वारा।

मुगल बादशाह औरंगजेब ने अपने पराजित भाई दाराशिकोह को इसी दुर्ग में कैद रखा था। कांकवाड़ी दुर्ग दूर से तो दिखाई देता है परन्तु पास जाने पर वृक्षों के झुरमुट में छिप जाता है।

सोजत दुर्ग

  • गिरि दुर्ग।
  • राव जोधा के पुत्र नीम्बा द्वारा 15वीं सदी में निर्मित। मेवाड़-मारवाड़ सीमा पर स्थित दुर्ग।
  • जोधपुर शासक राव मालदेव ने इस दुर्ग के चारों ओर विशाल एवं सुदृढ़ परकोटे का निर्माण करवाया।
  • इस दुर्ग में राव मालदेव के पुत्र राम ने रामेलाव तालाब बनवाया।

माधोराजपुरा का किला

  • स्थल दुर्ग। जयपुर में अवस्थित।
  • निर्माता :- सवाई माधोसिंह प्रथम (मराठा विजय के उपलक्ष्य में निर्माण)।
  • इस किले के साथ अमीर खां पिण्डारी की बेगमों को बंधक बनाने तथा लदाणा के ठाकुर भरतसिंह नारुका की वीरता की रोमांचक दास्तान जुड़ी हुई है।

चौमू का किला

  • जयपुर के चौमू कस्बे में अवस्थित भूमि दुर्ग।
  • निर्माण :- ठाकुर कर्णसिंह द्वारा (बेणीदास नामक साधु के आशीर्वाद से)
  • अन्य नाम :- रघुनाथगढ़, धाराधारगढ़।
  • प्रवेश द्वार :- रावण दरवाजा, होली दरवाजा, बावड़ी दरवाजा, पीहाला दरवाजा।

कोटा दुर्ग

  • चम्बल नदी के किनारे स्थित जल दुर्ग।
  • निर्माता :- माधोसिंह द्वारा।
  • प्रवेश द्वार :- पाटन पोल, कैथूनी पोल, सूरज पोल, हाथी पोल एवं किशोरपुरा दरवाजा।
  • महल :- जैतसिंह महल, कँवरपदा महल, केसर महल, अर्जुन महल, चन्द्र महल, हवा महल आदि।

दुर्ग के भीतर ‘महाराजा माधवसिंह म्यूजियम’ रियासतकालीन कला एवं संस्कृति का अद्‌भूत खजाना है।

दुर्ग

  • कुचामन दुर्ग :- जालिम सिंह द्वारा कुचामन (नागौर) में इस दुर्ग की नींव रखी गई। गिरि दुर्ग। उपनाम :- जागीरी किलों का सिरमौर।
  • फतेहपुर दुर्ग :- धान्वन व भूमि दुर्ग। शेखावटियों का सबसे महत्वपूर्ण दुर्ग। निर्माता :- 1453 ई. में फतन खाँ कायमखानी द्वारा। दुर्ग के भीतर ‘तेलिन का महल’ बड़ा प्रसिद्ध है।
  • नाहरगढ़ दुर्ग :- बारां में। लाल पत्थरों से निर्मित। इसकी आकृति दिल्ली के लाल किले के समान है।
  • शाहबाद का किला :- बारां में स्थित गिरि दुर्ग। प्रथम मान्यता के अनुसार इस दुर्ग का निर्माण 9वीं सदी में परमार शासकों द्वारा किया गया था। जबकि दूसरी मान्यता के अनुसार इस दुर्ग का निर्माता चौहान शासक मुकुटमणिदेव था। इस दुर्ग का जिर्णोद्धार अफगान शासक शेरशाह सूरी द्वारा करवाया गया। इस दुर्ग में रखी ‘नवलबाण तोप’ दूर तक मार करने के कारण प्रसिद्ध है।
  • लक्ष्मणगढ़ दुर्ग :- सीकर।
  • भूमगढ़/असीरगढ़ दुर्ग :- टोंक में 17वीं सदी में ब्राह्मण भोला द्वारा निर्मित। उपनाम :- दक्खन की चाबी।
  • किलोणगढ़ दुर्ग :- बाड़मेर में 1552 ई. में राव भीमोजी द्वारा निर्मित गिरि दुर्ग।
  • ऊँटाला का किला :- वल्लभगढ़ (उदयपुर) में स्थित दुर्ग।
  • झाइन दुर्ग :- सवाईमाधोपुर। उपनाम :- रणथम्भौर की कुँजी।
  • मीठडी दुर्ग :- जयपुर।
  • सज्जनगढ़ दुर्ग :- उदयपुर की बांसदरा पहाड़ियों पर निर्मित। निर्माता :- महाराणा सज्जनसिंह द्वारा, गिरि दुर्ग। उपानाम :- उदयपुर का मुकुटमणि। दुर्ग में महाराणा सज्जनसिंह द्वारा 1881 में वाणी विलास पैलेस एवं गुलाबबाड़ी का निर्माण करवाया।
  • टॉडगढ़ दुर्ग :- अजमेर में कर्नल जेम्स टॉड द्वारा निर्मित।
  • करणसर दुर्ग :- जयपुर में चार बुर्जो वाला किला। निर्माता :- बहादुरसिंह राणावत
  • गीजगढ़ दुर्ग :- दौसा में। गीजगढ़ चम्पावतों की जागीर का ठिकाना था। यह किला नाव या जहाज की आकृतिनुमा स्वरूप में निर्मित है।
  • उटगिरी का किला :- कल्याणपुर (करौली) के पास स्थित दुर्ग का मुख्य द्वार :- इमली पोल।निर्माता :- लोधी राजपूत। अन्य नाम :- उदित नगर दुर्ग।
  • वैरगढ़ दुर्ग :- भरतपुर में। निर्माता :- प्रतापसिंह (1726 में)
  • मंडरायल दुर्ग :- करौली में चम्बल नदी के तट पर एक ऊँची पहाड़ी पर लाल पत्थरों से निर्मित दुर्ग। उपनाम :- ग्वालियर दुर्ग की चाबी।
  • मालकोट का दुर्ग :- मेड़ता (नागौर) में। राजा मालदेव द्वारा निर्मित।
  • तिजारा का दुर्ग :- अलवर में। तिजारा में हजरत गद्दनशाह पीर की मजार है।
  • बनेड़ा का किला :- भीलवाड़ा में। यह राजस्थान का एकमात्र दुर्ग है जो निर्माण से लेकर अभी तक अपने मूल स्वरूप में यथावत स्थित है।
  • कोटकास्ता का किला :- जालौर में। इसे ‘नाथों का दुर्ग’ भी कहा जाता है।
  • गुमट का दुर्ग :- बाड़ी (धौलपुर) में।
  • राजगढ़ दुर्ग :- अलवर में।
  • मनोहरथाना दुर्ग :- झालावाड़ में। जल दुर्ग।
  • निर्माता :- महाराव भीमसिंह (कोटा)।
  • सोढ़लगढ़ दुर्ग :- सूरतगढ़ (श्रीगंगानगर) में स्थित धान्वन दुर्ग। बीकानेर नरेश सूरतसिंह द्वारा 1799 में निर्मित।
  • पाशीब :- किले की प्राचीर से हमला करने के लिए रेत एवं अन्य वस्तुओं से निर्मित एक ऊँचा चबूतरा। शुक्रनीति के अनुसार सैन्य दुर्ग सर्वश्रेष्ठ दुर्ग है।
  • तोहन दुर्ग :- कांकरोली (राजसमन्द) में।
  • टांई का किला :- टांई (झुंझुनूं) में।
  • केहरीगढ़ दुर्ग :- अजमेर में।
  • पचेवर का किला :- टोंक में।
  • राजस्थान में सर्वाधिक दुर्गों का निर्माण मेवाड़ महाराणा कुम्भा द्वारा किया गया था। कुम्भा ने 84 दुर्गों में से 32 दुर्गों का निर्माण किया।
  • जो दुर्ग दुश्मन द्वारा जीते नहीं गये हो, उन्हें बाला किला कहा जाता है।
  • रणथम्भौर की विजय के बाद अलाउद्दीन खिलजी ने रणथम्भौर दुर्ग उलुग खान को सौंपा।

हम्मीरदैव ने सुल्तान अलाउद्दीन खिलजी के विद्रोही सेनापति मीर मुहम्मदशाह को रणथम्भौर दुर्ग में शरण दी थी। कुम्भलगढ़ दुर्ग की दीवार की लम्बाई 36 किमी. है।

  • घूंघट, गूगड़ी, बांदरा, इमली :- तारागढ़ (अजमेर) की प्राचीर की विशाल बुर्जे।
  • नवल खाँ दुर्ग :- झालावाड़ में। निर्माता :- झाला पृथ्वीसिंह। 
  • काकोड़ दुर्ग :- टोंक में।
  • बोराज का दुर्ग :- जयपुर में। मर्दानशाह की मस्जिद मंडरायल दुर्ग (करौली) में है।
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