मेवाड़ स्कूल

  • राजस्थानी चित्रकला का प्रारम्भिक केन्द्र।
  • अजन्ता परम्परा का निर्वहन केन्द्र।
  • प्रथम उदाहरण – श्रावक प्रतिक्रमण सूत्र चूर्णि (1260 ई. में तेजसिंह के समय चित्रित)।
  • महाराणा मोकल के समय 1423 ई. में चित्रित पुस्तक ‘सुपासनाह चरियम्’ में मेवाड़ शैली का प्रभाव झलकता है।
  • मेवाड़ शैली का उजला रूप सन् 1540 ई. का विल्हण कृत ‘चौरपंचाशिका ग्रंथ’ के चित्रों में देखने को मिलता है।
  • इस शैली के प्रमुख चित्रों में से एक ‘चम्पावती विल्हण’ नामक चित्र प्रतापगढ़ में चित्रित है।
  • डगलस बैरेट एवं बेसिल ग्रे ने ‘चौरपंचाशिका शैली’ का उद्‌गम मेवाड़ में माना है।

Mewar School Chitra Shaili

महाराणा कुम्भा के समय का पण्डित भीकमचन्द द्वारा रचित ग्रंथ ‘रसिकाष्टक’ में विभिन्न ऋतुओं तथा पशु-पक्षियों के उत्तम चित्र उपलब्ध हुए हैं जो कुम्भा कालीन चित्रकला की पुष्टि करते हैं।

चावण्ड शैली

  • चावण्ड को 1585 ई. में महाराणा प्रताप द्वारा अपनी संकटकालीन राजधानी बनाया गया जहाँ पर प्रताप के समय चित्रकला शैली की शुरूआत हुई।
  • महाराणा प्रताप के समय का प्रसिद्ध चित्र कृति ‘ढोला-मारू’ (1592 ई.) है जो मुगल शैली से प्रभावित है। यह कृति वर्तमान में राष्ट्रीय संग्रहालय, नई दिल्ली में सुरक्षित है।
  • महाराणा अमरसिंह के काल में मेवाड़ की राजधानी चावण्ड में 1605 ई. में चित्रकार ‘निसारद्दीन’ ने ‘रागमाला’ का चित्रण किया।
  • महाराणा अमरसिंह के काल को ‘चावण्ड शैली का स्वर्णकाल’ कहा जाता है।

उदयपुर शैली

  • मेवाड़ शैली का प्रमुख केन्द्र।
  • इस शैली का प्राचीनतम चित्र ‘श्रावक प्रतिक्रमण सूत्र चूर्णि’ है जो 1260 ई. में गुहिल शासक तेजसिंह के समय आहड़ में चित्रित हुआ था। इस शैली का दूसरा प्रमुख चित्र ग्रंथ ‘सुपासनाह चरितम्’ है जो महाराणा मोकल के समय 1423 ई. में चित्रित हुआ।
  • उदयपुर शैली का सर्वप्रथम मूल स्वरूप प्रतापगढ़ में चित्रित ‘चौरपंचाशिका’ नामक ग्रंथ के चित्रों में दिखाई देता है।

महाराणा जगतसिंह प्रथम’ का काल उदयपुर शैली का स्वर्णकाल माना जाता है। इस काल में वल्लभ सम्प्रदाय के प्रसार के कारण श्रीकृष्ण के जीवन से सम्बन्धित चित्रों का निर्माण अधिक हुआ।

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इस काल में रागमाला, रसिकप्रिया, गीतगोविन्द, भागवतपुराण एवं रामायण इत्यादि विषयों पर लघु चित्रों का निर्माण हुआ। महाराणा जगतसिंह के समय साहिबदीन एवं मनोहर जैसे चित्रकार थे। साहिबदीन ने 1655 ई. में ‘शूकर क्षेत्र महात्म्य’ एवं ‘भ्रमरगीत’ जैसे चित्र रचे।

  • चित्रकार :- साहिबदीन, कृपाराम, मनोहर, नसीरुद्दीन, उमरा, श्योबक्स, जीवाराम, भैरूराम आदि।
  • विषय :- कृष्ण की लीलाओं का चित्रण, नायक-नायिका भेद, रागमाला, बारहमासा, रामायण, कादम्बरी, नल-दमयन्ति, गीत-गोविन्द, सूरसागर आदि।
  • महाराणा जगतसिंह के समय ही कृष्ण चरित्र की भाँति रामचरित्र का चित्रांकन हुआ था। इसका चित्रांकन 1649 – 1653 ई. के मध्य साहिबदीन एवं मनोहर ने किया।
  • चितेरों की ओवरी :- महाराणा जगतसिंह द्वारा राजमहल में निर्मित एक चित्रशाला। इसे तस्वीरां रो कारखानों भी कहा जाता है।
  • चमकीले पीले एवं लाख के लाल रंग की प्रधानता।
  • इस शैली में हाशिये पर लाल व पीले रंग का प्रयोग।
  • पुरुष आकृति :- गठिला शरीर, लम्बी मूँछें, विशाल नयन, छोटा कद, छोटी ग्रीवा, कपोल तक जुल्फें आदि।
  • नारी आकृति :- औज, उदात्त व सरल भाव लिए चेहरा, मीनाकृत आँखें, गरुड़ सी लम्बी नाक, ठिंगना कद, चिबुक पर तिल, लम्बी वेणी एवं भौंहे नीम के पत्ते की भाँति।
  • राणा जयसिंह के काल में लघु चित्रों के निर्माण की अधिकता।
  • महाराणा अमरसिंह द्वितीय के काल में रसिकप्रिया के 46 चित्र चित्रित किए गए।
  • महाराणा हम्मीरसिंह के काल में ‘बड़े पन्नों’ पर चित्र बनाने की परम्परा शुरू हो गई।
  • महाराणा भीमसिंह के काल में भित्ति चित्रों का अधिक निर्माण।

विशेषताएँ

  • प्रकृति का आलंकारिक रूप से चित्रण।
  • लाल रंग की प्रधानता।
  • आम्र वृक्ष एवं अशोक वृक्ष का अधिक अंकन।
  • हाशिये पर लाल रंग का प्रयोग।
  • भवन का सफेद रंग से चित्रण।
  • चमकीले रंगों का प्रयोग।
  • हाथी, शेर, हिरण, घोड़े का चित्रण बहुलता से।
  • राजस्थानी चित्रकला की मूल शैली।
  • बादलों से युक्त नीले आकाश का चित्रण।
  • पोथी ग्रंथों का अधिक चित्रण।
  • गुर्जर एवं जैन शैली से प्रभावित।
  • कदम्ब वृक्ष व हाथी का चित्रण प्रधान।

महाराणा संग्रामसिंह द्वितीय के समय का प्रमुख चित्रकार नुरुद्दीन था जिसने ‘पंचतंत्र’ (कलीला-दमना) पर अनेक चित्र बनाए।

कलीला-दमना :- मेवाड़ शैली में चित्रित पंचतंत्र कहानी के दो पात्र। इन चित्रों के माध्यम से एक ब्राह्मण राजा के पुत्रों को कहानी के रूप में दिखाते हुए शिक्षा देता है।

इस कहानी में कलीला-दमना नाम के दो गीदड़ हैं जिनमें एक सरल स्वभाव का एवं दूसरा बुरे स्वभाव का है। इसका सर्वप्रथम पता अलबरूनी ने लगाया। कलीला-दमना के आधार पर सर्वप्रथम सचित्र पुस्तक 1258 ई. में बगदाद में तैयार की गई। यह एक रूपात्मक कहानी है।

नाथद्वारा शैली

  • मेवाड़ शैली का दूसरा प्रमुख केन्द्र।
  • उदयपुर शैली एवं ब्रज शैली का समन्वित रूप।
  • महाराणा राजसिंह के समय उद्‌भव एवं विकास।
  • श्रीनाथजी के प्राकट्‌य एवं लीलाओं से संबंधित चित्रण।
  • पिछवाई :- श्रीनाथजी के स्वरूप के पीछे सज्जा के लिए बड़े आकार के कपड़े के पर्दे पर बनाए गए चित्र। यह नाथद्वारा शैली की मौलिक देन है।
  • प्रमुख चित्रकार :- नारायण, चतुर्भुज, रामलिंग, चम्पालाल, घांसीराम, तुलसीराम, उदयराम, हरदेव, हीरालाल, विटुल, भगवान आदि।
  • इस शैली की दो प्रमुख महिला चित्रकार कमला एवं ईलायची थी।
  • तिलकायत श्री गोवर्धनजी के समय यहाँ की चित्रकला का विकास चरम सीमा पर था।
  • पुरुष आकृति :- पुरुष में गुसाईयों के पुष्ट कलेवर, नन्द और अन्य बाल-गोपालों का भावपूर्ण चित्रण।
  • नारी आकृति :- प्रौढ़ता, छोटा कद, तिरछी व चकोर के समान आँखें, शारीरिक स्थूलता व भावों में वात्सल्य की झलक।

विशेषताएँ

  • श्रीनाथजी का अधिक चित्रण।
  • हरे व पीले रंग का अधिक प्रयोग।
  • केले के वृक्ष की प्रधानता।
  • पृष्ठभूमि में सघन वनस्पति।
  • समान में देवताओं का अंकन।
  • गायों का मनोरम अंकन।
  • पिछवाई चित्रण।
  • पुष्टिमार्ग सम्प्रदाय का प्रभाव।

देवगढ़ उपशैली

  • महाराणा जयसिंह के राज्यकाल में रावत द्वारिकादास चूण्डावत द्वारा 1680 ई. में स्थापित ठिकाणा।
  • देवगढ़ के सामंत ‘सोलहवें उमराव’कहलाते थे।
  • इस शैली का उद्‌भव द्वारिकादास चूण्डावत के समय हुआ।

चित्रण विषय :- मरुस्थल का प्राकृतिक परिवेश, शिकार के दृश्य, अंत:पुर, राजसी ठाठबाट, शृंगार, सवारी आदि।

  • चित्रण में पीले रंगों का बाहुल्य।
  • मारवाड़ शैली से साम्यता।
  • मारवाड़, जयपुर एवं मेवाड़ की समन्वित शैली।

प्रमुख चित्रकार :- बगता, कँवला प्रथम, कँवला द्वितीय, हरचंद, नंगा, चोखा, बैजनाथ आदि।

  • इस शैली को सर्वप्रथम प्रकाश में लाने का श्रेय ‘डॉ. श्रीधर अंधारे’ को जाता है।
  • यहाँ के भित्ति चित्र ‘अजारा की ओवरी’ एवं ‘मोती महल’ में विद्यमान हैं।

शाहपुरा उपशैली

मुगल शासक शाहजहाँ ने शाहपुरा को स्वतंत्र रियासत बनाया। यहाँ विकसित चित्रकला मेवाड़ शैली से प्रभावित है। शाहपुरा उपशैली में लोक-जीवन के चित्रण का विशेष प्रभाव था। शाहपुरा उपशैली ‘पड़ चित्रण’ के लिए प्रसिद्ध है।

शाहपुरा के श्रीलाल जोशी एवं दुर्गालाल जोशी के परिवारों ने आज भी पड़ चित्रण के माध्यम से पहचान कायम रखी है। शाहपुरा उपशैली के प्रमुख चित्रों में राजा उम्मेदसिंह का 1778 ई. में चित्रित व्यक्ति चित्र, 1772 ई. में चित्रित रागमाला सेट (लंदन में विद्यमान) प्रमुख हैं।

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