चित्तौड़गढ़ के मंदिर | Chittorgarh Mandir GK

Chittorgarh Mandir GK

श्री सांवलिया जी का मंदिर

चित्तौड़गढ़ से लगभग 40 किमी. दूर मडफिया नामक ग्राम में स्थित इस मंदिर में जल झूलनी एकादशी मेला भरता है। इस मंदिर को ‘अफीम मंदिर’ के नाम से जाना जाता है। इस मंदिर में श्रीकृष्ण भगवान की काले पत्थर की मूर्ति स्थापित है।

सतबीस देवरी

11वीं शताब्दी में निर्मित भव्य जैन मंदिर जिसमें 27 देवरियाँ स्थित होने के कारण यह सतबीस देवरी कहलाता है।

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भदेसर 

यहाँ असावरा माता का प्रसिद्ध मंदिर है जहाँ लकवा के मरीजों को उपचार हेतु लाया जाता है।

कुम्भ-श्याम मंदिर (वैष्णव मंदिर) तथा मीरा बाई का मंदिर

1449 ई. में महाराणा कुम्भा द्वारा निर्मित कुम्भ-श्याम मंदिर इण्डो-आर्यन स्थापत्य कला का एक उत्कृष्ट नमूना है। कुम्भ-श्याम मंदिर के अहाते में मीराबाई का मंदिर है। इस मंदिर में मुरली बजाते हुए श्रीकृष्ण एवं भक्ति में लीन भजन गाती हुई मीरा का चित्र लगा है। मीरा मंदिर के सामने मीरा के गुरु रैदास की स्मारक छतरी बनी हुई है।

कालिका माता का मंदिर

इसका निर्माण मेवाड़ के गुहिल वंशीय राजाओं ने 8वीं-9वीं शताब्दी में करवाया था। प्रारम्भ में यह सूर्य मंदिर था मुगलों के आक्रमण क समय सूर्य की मूर्ति तोड़ दी गई। तदुपरान्त कालान्तर में उसकी जगह कालिका माता की मन्दिर स्थापित की गई। महाराणा सज्जन सिंह ने इस मंदिर का जीर्णोद्धार करवाया। यह मंदिर भगवान सूर्य को समर्पित है। राज्य में विष्णु के कुर्मावतार का सर्वाधिक प्राचीन अंकन इसी माता के मंदिर से प्राप्त होता है।

सांवरिया जी का मंदिर

चित्तौड़गढ़ से 40 किमी. दूर मण्डफिया गाँव में सांवरिया जी (श्रीकृष्ण जी) का प्रसिद्ध मंदिर स्थित है। शीघ्र ही यहाँ करोड़ों की लागत से सांवरिया जी का नया मंदिर बनने जा रहा है।

मातृकुण्डिया मंदिर

चन्द्रभागा नदी के तट पर राशमी नामक तहसील मुख्यालय में स्थित भगवान शिव का मंदिर जो मेवाड़ के हरिद्वार के रूप में जाना जाता है। यहाँ प्रसिद्ध लक्ष्मण झूला भी है।

समिद्धेश्वर महादेव ( मोकलजी का मंदिर )

नागर शैली में बने इस शिव मंदिर का निर्माण मालवा के परमार राजा भोज ने करवाया तथा महाराणा मोकल ने 1428 में इसका जीर्णोद्धार करवाया। नागर शैली में बना यह मंदिर वास्तुकला के नियमों के आधार पर बनाया गया है।

बाड़ोली के शिव मंदिर

उत्तर गुप्त कालीन यह मंदिर परमार राजा हुण द्वारा निर्मित है। यह बामनी एवं चम्बल नदी के संगम क्षेत्र में चित्तौड़गढ़ के भैंसरोड़गढ़ में स्थित है। यह गुर्जर प्रतिहार कला का उत्कृष्ट उदाहरण है। यह नौ मंदिरों का समूह हैं। इन मंदिरों को सर्वप्रथम प्रकाश में लाने का कार्य 1821 ई. में कर्नल जेम्स टॉड ने किया।

मीरा बाई का मंदिर

चित्तौड़ दुर्ग में कुंभश्याम मंदिर के निकट निर्मित मंदिर जिसका निर्माण महाराणा सांगा ने करवाया। इंडो-आर्य शैली में निर्मित इस मंदिर के सामने मीरा के गुरु रैदास की छतरी है।

शृंगार चँवरी मंदिर

चित्तौड़ दुर्ग में स्थित शांतिनाथ जैन मंदिर जिसका निर्माण महाराणा कुम्भा के कोषपाल के पुत्र वेलका ने 1448 ई. में करवाया।

असावरी (आवरी) माता का मंदिर

निकुंभ (चित्तौड़गढ़) में स्थित मंदिर। यहाँ लकवे के मरीजों का इलाज किया जाता है।

तुलजा भवानी मंदिर

चित्तौड़ दुर्ग में बनवीर द्वारा निर्मित मंदिर।

समिद्धेश्वर मंदिर

11वीं सदी में मालवा के परमार राजा भोज द्वारा निर्मित मंदिर। इस मंदिर का जीर्णोद्धार 1428 ई. में महाराजा मोकल ने सूत्रधार जैता के निर्देशन में करवाया था। यह शिव मंदिर नागर शैली में बना हुआ है। इसे मोकल जी का मंदिर भी कहा जाता है।

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