राजस्थान की लोक गायन शैलियाँ

माण्ड गायिकी

जैसलमेर क्षेत्र में 10वीं सदी में लोक संगीत में विकसित एक परम्परागत गायन शैली है। यह राजस्थान की एक शृंगार रसात्मक राग है। इस गायिकी में घराना परम्परा का अभाव है।

प्रसिद्ध मांड गायिकाएँ

मांगणियार गायिकी

राजस्थान के सीमावर्ती जिलों बाड़मेर, जैसलमेर, जोधपुर में मांगणियार जाति के लोगों द्वारा अपने यजमानों के यहाँ मांगलिक अवसरों पर गायी जाने वाली लोक गायन शैली है। इस गायिकी में 6 राग एवं 36 रागनियाँ होती हैं। मांगणियार मुस्लिम मूलत: सिंध प्रांत के हैं। गायन-वादन ही इनका प्रमुख पेशा है। इनके प्रमुख वाद्य कमायचा, खड़ताल आदि हैं।

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प्रसिद्ध मांगणियार कलाकार

  • साफर खाँ मांगणियार,
  • गफूर खाँ मांगणियार,
  • रमजान खाँ (ढोलक वादक),
  • सद्दीक खाँ (खड़ताल वादक),
  • साकर खाँ मांगणियार (कमायचा वादक)।

लंगा गायिकी

बीकानेर, बाड़मेर, जोधपुर एवं जैसलमेर जिले के पश्चिमी क्षेत्रों में मांगलिक अवसरों एवं उत्सवों पर लंगा जाति के गायकों द्वारा गायी जाने वाली गायन शैली है। सारंगी एवं कमायचा इनके प्रमुख वाद्य हैं।

 प्रमुख लंगा कलाकार

  • फूसे खाँ,
  • महरदीन लंगा,
  • करीम खाँ लंगा।

तालबंदी गायिकी

यह राजस्थान के पूर्वी अंचल (धौलपुर, भरतपुर, करौली एवं सवाईमाधोपुर) में लोक गायन की शास्त्रीय परम्परा है, जिसमें राग-रागनियों से निबद्ध प्राचीन कवियों की पदावलियाँ सामूहिक रूप से गायी जाती है। इसमें प्रमुख वाद्य सारंगी, हारमोनियम, ढोलक, तबला व झांझ हैं।

राजस्थान की संगीतजीवी जातियाँ

दमामी :- यह प्राचीन काल में युद्ध के समय उद्घोष करने के लिए नगाड़ा बजाने का कार्य करते थे, इस वजह से इनको नक्कारची या रणधवल कहा जाता है, दमामी जाति राजपूतों को अपना यजमान मानती हैं। देधड़ा, डांगी, ब्यावट, जन्डा, दमामी की प्रमुख खापें हैं।

मांगणियार :- अर्थ :- मांगने वाला। ये जाति जैसलमेर, बाड़मेर, बीकानेर में निवास करने वाली गायक वादक जाति है। लंगा एवं मांगणियार विशिष्ट प्रकार के गीत गाते हैं जो ‘जागड़ा’ कहलाते हैं। ये मुसलमान है और इनकी खापें बेद, बारणी, कालुंभा, जारया, सोनलिया, गुणसार, पौड़िया हैं।

ढाढ़ी :- पश्चिमी राजस्थान की गायक – वादक जाति। सारंगी व रबाब इनका प्रमुख वाद्य हैं। ये ‘चिंकारा’ नामक वाद्य भी बजाते हैं।

कलावन्त :- अबुल फजल के अनुसार कलावन्त ध्रुपद के पारंगत गायक है। मारवाड़ के कलावन्त सुन्नी मुसलमान है। ये गायक होते हैं जो वाद्य यंत्र नहीं बजाते हैं तथा नृत्य से परहेज करते हैं। जयपुर का डागर घराना इसी जाति का है। तानसेन के वंशज माने जाते हैं।

कव्वाल :- सूफी परम्परा के गायक। कव्वाली इनकी गायन शैली है, जिसका आविष्कार अमीर खुसरो ने किया।

मिरासी :- मुस्लिम गायक जाति जो लोककाव्य को पीढ़ी दर पीढ़ी जीवित रखती है। यह जाति मुख्यत: मारवाड़, जयपुर एवं अलवर क्षेत्र में विस्तृत है। प्रमुख वाद्य :- कामयचा, खड़ताल

भाट :- भाट अपने यजमानों की वंशावलियाँ लिखते हैं और उनका बखान करते हैं। उत्तर पश्चिम राजस्थान में भाट अधिक संख्या में पाए जाते हैं।

डोम :- ये भाटों का ही उपवंश है जो हिन्दू धर्म को मानते हैं।

ढोली :- मांगलिक अवसरों पर ढोल बजाने वाली जाति। जड़िया, गीता, देसार, बगार, तेखा, आदि ढोली की प्रमुख खापें हैं।

लंगा :- पश्चिमी राजस्थान में निवास करने वाली गायक व वादक जाति लंगा मुस्लिम होते हुए भी हिन्दू त्यौहार मनाते हैं व जोगमाया को मानते हैं। माँड गायन में इनको महारत हासिल हैं। बड़वना (बाड़मेर) गाँव इस जाति का मुख्य स्थान है। प्रमुख वाद्य :- सारंगी

भवाई :- नाचने-गाने वाली इस जाति की उत्पत्ति केकड़ी (अजमेर) से नागाजी जाट से मानी जाती है। मेवाड़ क्षेत्र में रहने वाली इस जाति का ‘भवाई’ नृत्य संसारभर में प्रसिद्ध है।

रावल :- मारवाड़ के सोजत-जैतारण क्षेत्र, बीकानेर तथा मेवाड़ के कुछ क्षेत्रों में पाई जाने वाली संगीत जीवी जाति जिसकी रम्मतें विख्यात हैं। रावल जाति चारणों को अपना यजमान मानती हैं।

कामड़ :- रामदेवजी के परमभक्त। कामड़ जाति की स्त्रियाँ तेरहताली नृत्य में प्रवीण होती हैं।

भोपा :- कथावाचक, जो पड़ का श्रोताओं के सम्मुख ओजपूर्ण रूप से वर्णन करता है। देवरे का मुख्य भोपा पाटवी कहलाता है। कुछ देवी-देवताओं के भोपे भाव आने पर रूई की जलती बाती को जीभ पर रखकर मुँह बंद कर लेते हैं, इसे ‘केकड़ा खाना’ कहते है।

 भोपे  सम्बन्धित वाद्य

सरगड़ा :- ढोल वादक जाति। कच्छी घोड़ी नृत्य में कुशल। बर्गू वाद्य यंत्र का प्रयोग सरगड़ा जाति द्वारा किया जाता है। बर्गू सुषिर वाद्य है।

कानगूजरी :- मारवाड़ की गायक जाति जो राधा-कृष्ण के भक्ति गीतों का गायन रावणहत्था के साथ करती है।

जोगी :- नाथ पंथ के अनुयायी, जो गाने बजाने का काम करते हैं। इनका मुख्य वाद्य यंत्र सारंगी व इकतारा है। बैरागी, कालबेलिया, कठपुतली, अड़ भोपा, फंदाली, चारण, राव, मोतीसर आदि प्रमुख अन्य संगीतजीवी जातियाँ हैं।

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