राजस्थान की प्रमुख छतरियाँ

राजस्थान की प्रमुख छतरियाँ

  • एक खम्भे की छतरी :- रणथम्भौर (सवाईमाधोपुर) में
  • शृंगार चंवरी की छतरी :- चित्तौड़ दुर्ग में राणा कुंभा द्वारा निर्मित चार खम्भों की छतरी।
  • गोराधाय की छतरी :- जोधपुर में महाराजा अजीतसिंह द्वारा अपनी धायमाता गोराधाय की स्मृति में निर्मित चार खम्भों की छतरी।
  • बजारों की छतरी :- लालसोट (दौसा) में स्थित 6 खम्भों की छतरी। छठी सदी में निर्मित।
  • राणा सांगा की छतरी :- माण्डल (भीलवाड़ा) अशोक परमार द्वारा 8 खम्भों पर निर्मित है।
  • राणा प्रताप की छतरी / 8 खम्भों की छतरी :- बाण्डोली (उदयपुर) में महाराणा अमरसिंह द्वारा निर्मित।
  • रैदास की छतरी :- मीराबाई के आध्यात्मिक गुरु संत रैदास की 8 खम्भों पर स्थित छतरी चित्तौड़गढ़ दुर्ग में स्थित है।

नैड़ा की छतरियाँ

अलवर के सरिस्का वन क्षेत्र के समीप नैड़ा अंचल में स्थित छतरियाँ। इसमें दशावतार का चित्रण किया गया है जिसमें काले और कत्थई वानस्पतिक रंग प्रयुक्त किये गये हैं। इनमें ‘मिश्रजी की छतरी / 8 खम्भों की छतरी’ विशेष प्रसिद्ध है जिसे 1432 ई. के आसपास बनाया गया है।

उड़ना पृथ्वीराज की छतरी (12 खम्भों की छतरी) :- कुम्भलगढ़ दुर्ग में निर्मित मेवाड़ के पृथ्वीराज सिसोदिया की छतरी। इस छतरी के खम्भों पर विभिन्न प्रकार से नारियों के चित्र अंकित हैं।

20 खम्भों की छतरी/सिंघवियों की छतरियाँ :- जोधपुर नरेश भीमसिंह के सेनापति सिंघवी अखैराज की छतरी प्रमुख है। 20 खम्भों की बनी यहाँ की छतरियाँ नक्काशी के लिए प्रसिद्ध हैं। अहाड़ा हिगोला की छतरी तथा जैसलमेर रानी की छतरी भी जोधपुर में स्थित है।

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  • अमरसिंह की छतरी (16 खम्भों की छतरी) :- वीर अमरसिंह राठौड़ की 16 खम्भों की छतरी नागौर दुर्ग में स्थित है।
  • मामा-भान्जा की छतरी :- जोधपुर दुर्ग में महाराजा अजीतसिंह द्वारा 10 खम्भों पर निर्मित छतरी। इसे ‘धन्ना-भियां की छतरी’ भी कहा जाता है।
  • नोट:- मामा-भांजा की मजार :- पल्लू (हनुमानगढ़)।
  • मामा-भांजा का मंदिर :- अटरु (बारां)।
  • 18 खम्भों की छतरी (राजसिंह चम्पावत की छतरी) :- जोधपुर में।

32 खम्भों की छतरी (रणथम्भौर की छतरी)

रणथम्भौर की छतरी का निर्माण हम्मीरदेव ने अपने पिता जैत्रसिंह की स्मृति में करवाया था। यह छतरी धौलपुर के लाल पत्थर से निर्मित तथा 32 खम्भों पर टिकी है। अन्य नाम :- न्याय की छतरी।

  • जगन्नाथ कच्छवाहा की छतरी (32 खम्भों की छतरी) :- मांडलगढ़ (भीलवाड़ा) में।
  • शाहजहाँ द्वारा निर्मित यह छतरी हिन्दू व मुस्लिम स्थापत्य का अनूठा उदाहरण है।
  • रानी सूर्यकंवरी की छतरी :- 32 खम्भों पर टिकी यह छतरी पंचकुण्ड (जोधपुर) में है।
  • जोधसिंह की छतरी :- 32 खम्भों पर निर्मित जोधसिंह की छतरी बदनौर (भीलवाड़ा) में स्थित है।
  • 80 खम्भों की छतरी / मूसी महारानी की छतरी :- अलवर में। निर्माता :- महाराजा विनयसिंह
  • 2 मंजिला इस छतरी की पहली मंजिल लाल पत्थर व दूसरी मंजिल श्वेत संगमरमर से निर्मित है।
  • यह छतरी इंडो-इस्लामिक शैली में निर्मित है।
  • इस छतरी की ऊपरी मंजिल में मुख्य छतरी के अन्दर बने रामायण और महाभारत के भित्ति चित्र व संगमरमर पर उत्कीर्ण लघुफलक तत्कालीन समय की चित्र परम्परा व मूर्तिकला को प्रदर्शित करते हैं।
  • 84 खम्भों की छतरी :- बूँदी में देवपुरा नामक स्थान पर इस छतरी का निर्माण राव राजा अनिरुद्ध सिंह ने धाबाई देवा गुजर की स्मृति में करवाया। 1683 ई. में निर्मित यह तीन मंजिला छतरी 84 खम्भों पर टिकी हुई हैं।
  • कुत्ते की छतरी :- यह छतरी रणथम्भौर दुर्ग के निकट कुक्कराज की घाटी में स्थित है।
  • कपूरबाबा की छतरी :- यह छतरी उदयपुर शहर के मध्य जगमंदिर के समीप स्थित है। इस छतरी का निर्माण शाहजहाँ ने कपूर बाबा के सम्मान में करवाया था।
  • अकबर की छतरी :- बयाना दुर्ग के समीप (भरतपुर)।
  • गुसाइयों की छतरियाँ :- मेड़ गाँव (विराटनगर – जयपुर) के समीप 16वीं व 18वीं सदी में निर्मित तीन छतरियाँ।
  • आँतेड़ की छतरियाँ :- अजमेर में स्थित दिगम्बर जैन सम्प्रदाय की छतरियाँ।
  • राजा मानसिंह की छतरी :- आमेर में। राजस्थान में पाये गये भित्ति चित्रों में इस छतरी के चित्र प्राचीनतम ( जहाँगीर कालीन ) कहे जाते हैं।
  • सन्तोष बावला की छतरी :- पुष्कर (अजमेर) में।

टहला की छतरियाँ :- अलवर जिले के टहला कस्बे की छतरियाँ मध्यकालीन छतरी निर्माण तथा भित्ति चित्रकला की जीती-जागती प्रतिमाएँ हैं।

मिश्रजी की छतरी :- नैड़ा अंचल (अलवर) में 1489 ई. में निर्मित छतरी की भित्तियों पर दसों अवतारों के साथ सहस्त्रबाहु का परशुराम द्वारा वध, अर्द्धनारीश्वर, समुद्र मंथन, रामलीला के प्रसंग चित्रित किये गये हैं। यहाँ चित्रकारी ‘कड़ा लिपाई’ विधि के तहत की गई है। छतरी का स्थापत्य राजपूत शैली के अनुसार है।

  • थानेदार नाथूसिंह की छतरी :- शाहबाद (बारां) में कोटा महाराव उम्मेदसिंह द्वारा निर्मित छतरी।
  • गंगाबाई की छतरी :- गंगापुर (भीलवाड़ा) में।
  • देवीकुण्ड की छतरियाँ :- बीकानेर राजपरिवार की छतरियाँ। यहाँ राव कल्याणमल से लेकर महाराजा डूंगरसिंह तक की छतरियाँ बनी हुई हैं।

महाराजा रत्नसिंह द्वारा निर्मित महाराजा सूरजसिंह की छतरी की प्रतिष्ठा 26 फरवरी, 1836 को की गई।

क्षारबाग (केसरबाग) की छतरियाँ :- बूँदी राजपरिवार की छतरियाँ। 66 छतरियाँ। इनमें सबसे प्राचीन छतरी राव दूदा की एवं सबसे नवीन छतरी महाराव राजा विष्णुसिंह की है। राव राजा शत्रुशाल की मृत्यु होने पर उनकी 64 रानियों ने यहीं उनकी चिता में आहुति दी थी। यह बाग वीरत्व के दृष्टांतों को उजागर करने के दृष्टिकोण से बेजोड़ है।

गैटोर की छतरियाँ :- नाहरगढ़ दुर्ग (आमेर) की तलहटी में बनी गैटोर की छतरियाँ जयपुर शासकों का शाही श्मशान घाट है। महाराजा सवाई जयसिंह द्वितीय से लेकर महाराजा सवाई माधोसिंह द्वितीय तक के राजाओं और उनके पुत्रों की स्मृति में ये छतरियाँ पचायतन शैली में निर्मित हैं। गैटोर में केवल सवाई ईश्वरीसिंह की छतरी नहीं है।

  • सवाई ईश्वरीसिंह की छतरी :- सिटी पैलेस (जयपुर) में सवाई माधोसिंह द्वारा निर्मित छतरी।
  • महारानी की छतरी :- रामगढ़ (जयपुर) में स्थित छतरी।
  • बड़ाबाग की छतरियाँ :- जैसलमेर राजपरिवार की छतरियाँ।

यहाँ सर्वप्रथम जैसलमेर शासक रावल जैतसिंह तृतीय की छतरी का निर्माण उनके पुत्र महारावल लूणकरण ने 1528 ई. में करवाया।

  • जोगीदास की छतरी :- उदयपुरवाटी (झुंझुनूं) में। इस छतरी में चित्रकार देवा द्वारा चित्रित भित्ति चित्र शेखावटी के प्राचीनतम भित्ति चित्र है।

जसवंतथड़ा :- महाराजा जसवंतसिंह द्वितीय की स्मृति में उनके पुत्र महाराजा सरदारसिंह द्वारा 1899 में सफेद संगमरमर से निर्मित भव्य स्मारक। यहाँ जोधपुर के शासकों की छतरियाँ भी हैं।उपनाम :- राजस्थान का ताजमहल।

मंडोर की छतरी :- मंडोर में स्थित छतरियों में ब्राह्मण देवता की छतरी, कागा की छतरी, मामा-भांजा की छतरी, गोराधाय की छतरी प्रमुख हैं। कागा की छतरियों के मध्य प्रधानमंत्री की छतरी है। महाराजा जसवंतसिंह की प्राण रक्षा हेतु प्रधानमंत्री राजसिंह कूंपावत द्वारा आत्म बलिदान दिये जाने की स्मृति में प्रधानमंत्री की छतरी का निर्माण किया गया।

पद्‌मापीर की छतरी :- कोटा में।

महाराव बैरिसाल की छतरी :- सिरोही में दूधिया तालाब के किनारे महाराव बैरिसाल की छतरी स्थित है। इस तालाब के किनारे सिरोही के राजाओं तथा राजपरिवार के सदस्यों की छतरियाँ बनी हुई हैं।

महासतियाँ :- आहड़ (उदयपुर) में मेवाड़ महाराणाओं का श्मशान स्थल। महाराणा प्रताप के बाद के राणाओं की अंत्येष्टि इसी स्थान पर हुई। महाराणा अमरसिंह प्रथम की छतरी यहाँ स्थित छतरियों में सबसे पुरानी हैं।

  • दीवान दीपचंद की छतरी :- कागा (जोधपुर) में।
  • ब्राह्मण देवता की छतरी :- पंचकुण्ड (मण्डोर, जोधपुर) में।
  • कीरतसिंह सोढ़ा की छतरी :- मेहरानगढ़ दुर्ग (जोधपुर) में।
  • सेनापति की छतरी :- नागौरी गेट (जोधपुर) में।
  • बख्तावर सिंह की छतरी :- अलवर के राजा बख्तावर सिंह की छतरी मंडोर (जोधपुर) तथा अलवर में है।

जोधपुर के रानियों की छतरियाँ :- पंचकुण्ड (मण्डाेर, जोधपुर) में। 49 छतरियाँ, जिसमें रानी सूर्यकंवरी की छतरी 32 खम्भों पर स्थित सबसे बड़ी छतरी है।

  • राव जैतसी की छतरी :- हनुमानगढ़ में।
  • लाछा गुजरी की छतरी :- नागौर में।
  • राव शेखा की छतरी :- परशुरामपुरा (झुंझुनूं) में।
  • सिंधुपति महाराजा दाहरसेन का स्मारक :- अजमेर में।
  • खाण्डेराव की छतरी :- गागरसौली (भरतपुर) में।
  • बदनौर की छतरियाँ :- जोधपुर में।
  • जयमल व कल्ला राठौड़ की छतरी :- चित्तौड़गढ़ दुर्ग में।
  • चेतक की छतरी :- हल्दीघाटी (राजसमन्द) में।
  • अजीतसिंह का देवल :- जोधपुर में।
  • राणा उदयसिंह की छतरी :- गोगुन्दा में।
  • अप्पाजी सिंधिया की छतरी :- ताउसर (नागौर) में।
  • राव कल्याणमल की छतरी :- बीकानेर।
  • पीपाली की छतरी :- चित्तौड़गढ़ में।
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