मारवाड़ स्कूल

जोधपुर एवं आस-पास के क्षेत्र में राठाेड़ों के आश्रय में पल्लवित चित्रकला शैली को मारवाड़ स्कूल (शैली) के नाम से जाना जाता है।

मारवाड़ स्कूल

यहाँ के चित्रकारों ने अजन्ता शैली परम्परा को आधार बनाकर चित्रांकन किया जिसका प्रथम स्वरूप मण्डोर में दृष्टव्य है।

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तिब्बती इतिहासकार लामा तारानाथ ने सातवीं सदी में मरु प्रदेश में शृंगधर नामक चित्रकार का उल्लेख किया जिसने पश्चिमी भारत में यक्ष शैली को जन्म दिया।

मारवाड़ स्कूल का प्रारम्भिक चित्र प्रतिहार कालीन ‘ओध निर्युक्ति वृत्ति’ है जो 1060 ई. के लगभग चित्रित किए गए थे।

जोधपुर शैली

16वीं सदी के उत्तरार्द्ध में मुगल एवं स्थानीय शैली के प्रभाव से विकसित चित्रकला शैली

इस शैली का सर्वाधिक विकास राव मालदेव के समय हुआ। मालदेव के समय चौखेलाव में, जोधपुर की बल्लियों एवं छतों पर राम-रावण युद्ध एवं शप्तशती के अनेक अवतरणों का चित्रांकन किया गया था। मालदेव को ही मारवाड़ के कलात्मक परिवेश को नया रूप देने का श्रेय दिया जाता है।

जोधपुर शासक मोटा राजा उदयसिंह के समय मारवाड़ शैली पर मुगल शैली का प्रभाव झलकने लगा।

इस शैली में चित्रित 16सीं सदी का ‘उत्तराध्यायन सूत्र’ वर्तमान में बड़ौदा (गुजरात) संग्रहालय में सुरक्षित है।

जोधपुर शैली के पूर्ण विकास का काल 16वीं-17वीं सदी माना जाता है।

जोधपुर महाराजा सूरसिंह के काल में कई सचित्र ग्रंथों का निर्माण हुआ। इनके समय का बिलावल रागिनी वाला चित्र एवं सूरसिंह का व्यक्ति चित्र महत्वपूर्ण है। इसके आश्रय में ‘ढोला-मारू’ भागवत आदि सचित्र ग्रंथ रचे गये। चित्रों के शीर्षक गुजराती भाषा में नागरी लिपी में है।

1623 ई. में वीरजी द्वारा पाली में विट्‌ठलदास चाँपावत के लिए रागमाला का तिथियुक्त चित्र चित्रित किया जो मारवाड़ स्कूल की मौलिकता को प्रदर्शित करने वाला प्राचीनतम चित्र है।

महाराजा जसवन्तसिंह प्रथम के समय जोधपुर में कृष्ण चरित्र को आधार बनाकर चित्रांकन की नई परम्परा शुरू हुई। इनके काल में रसिकप्रिया एवं सूरसागर का चित्रांकन बहुलता से हुआ। इन्हीं के समय नाथों नामक चित्रकार ने व्यक्ति चित्र अधिक बनाये।

महाराजा मानसिंह के समय बने चित्रों में नाथ सम्प्रदाय का प्रभाव अधिक था। इन्हीं के काल में मारवाड़ शैली के सर्वाधिक सुन्दर एवं प्राणवान चित्रों का चित्रांकन किया गया। इन चित्रों में सामन्ती संस्कृति, राजसी ठाट-बाट, शिकार के दृश्यों का सजीव चित्रण किया गया।

महाराजा भीमसिंह के समय व्यक्ति चित्र, दरबार एवं जुलूस से संबंधित चित्र अधिक बने। 1800 ई. में निर्मित चित्र ‘दशहरा दरबार’ जोधपुर शैली का सुन्दर उदाहरण है।

महाराजा मानसिंह के समय अमरदास भाटी, दाना भाटी, शंकरदास, माधोदास, शिवदास, लादूनाथ एवं सरताज सतिदास जैसे प्रमुख चित्रकार थे।

महाराजा तख्तसिंह के समय जोधपुर शैली पर कम्पनी शैली का प्रभाव दृष्टिगोचर होने लगा। इनके समय का प्रसिद्ध चितेरा शंकरदास था। महाराजा तख्तसिंह के समय सुनहरे रंगों का अधिक प्रयोग हुआ तथा चित्रों में अलंकारिता में वृद्धि हुई।

जोधपुर शैली में राजस्थानी प्रेमाख्यान (ढोला मारवण, मूमल-निहालदे, उजली-जेठवा आदि), राजसी ठाट-बाट युक्त दरबारी जीवन, रेगिस्तानी परिवेश, बारहमासा, गीतगोविन्द, रसराज (मतिराम द्वारा चित्रित) आदि विषयों पर चित्रण किया गया।

अन्य प्रमुख चित्रकार :- बिशनदास, नारायणदास, रामू, अकली, मतिराम, छज्जु भाटी, देवदास, बभूत, रामसिंह भाटी आदि।

पीला व लाल रंग की प्रधानता। चित्रों के हाशिये में पीले रंग का प्रयोग।

पुरुष आकृति :- धनुष समान बड़ी आँखें, घनी दाढ़ी-मूँछें, लम्बा कद, गठीला बदन, मोटी ग्रीवा, मुखमण्डल शौर्य से ओतप्रोत।

नारी आकृति :- गठीला बदन, काले घने लम्बे लहराते बाल, लम्बे हाथ, लम्बी अंगुलियाँ, बादाम सी आँखें, पतली कमर, विकसित नासापुट आदि।

विशेषताएँ

  • आम के वृक्ष, ऊँट, घोड़े व कुत्ते को प्रमुखता।
  • खंजन पक्षी का बखूबी चित्रण।
  • विद्युत रेखाओं सहित गोलाकार घने बादल।
  • बादाम-सी आँखें और ऊँची पाग का चित्रण।
  • स्त्रियों के आभूषणों में मोतियों का बाहुल्य।
  • चित्रों के हाशिये में पीले रंग का प्रयोग।

बीकानेर शैली

  • बीकानेर शैली का प्रादुर्भाव 16वीं सदी के अन्त में माना जाता है।
  • इस शैली का प्रारम्भिक चित्र ‘भागवत पुराण’ माना जाता है जो महाराजा रायसिंह के समय चित्रित है।
  • बीकानेर चित्रकला की प्रमुख विशेषता ‘मथेरण कला’ एवं ‘उस्ता कला’ है।
  • महाराजा रायसिंह के समय उस्ता अलीरजा एवं उस्ता हामिद रुकनुद्दीन प्रसिद्ध मुगल चित्रकार थे।
  • बीकानेर शैली में मथेरण चित्र जैन चितेरों द्वारा बनाये गये जो बीकानेर की मौलिक देन है। बीकानेर में प्रमुख मथेरण चितेरों में मुन्नालाल, मुकुन्द, जयकिशन, चन्दूलाल, शिवराम, जोशी मेघराज आदि थे।

बीकानेर चित्र शैली पर राजा कल्याणमल के समय मुगल प्रभाव दृष्टिगोचर होने लगा। बीकानेर चित्रकला शैली का स्वर्णकाल महाराजा अनूपसिंह के काल को माना जाता है। इन्हीं के काल में विशुद्ध बीकानेर शैली का रूप देखने को मिलता है। उस्ता कला :- ऊँट की खाल पर चित्रण।

प्रमुख उस्ता चित्रकार :- हामिद रुकनुद्दीन, मुसव्विर रुकनुद्दीन, साहबदीन, शाह मोहम्मद, अहमद अली, अबू हमीद, अली रजा, आसीर खाँ आदि। उस्ता आसीर खाँ ने महाराजा कर्णसिंह के समय उस्ता चित्रण को चित्रांकन किया। महाराजा अनूपसिंह के समय प्रसिद्ध चित्रकार मुसव्विर रुकनुद्दीन ने रसिकप्रिया एवं बारहमासा पर कई चित्र बनाए।

बीकानेर शैली का सर्वाधिक पुराना व्यक्ति चित्र 1606 ई. में नूर माेहम्मद द्वारा चित्रित व्यक्ति चित्र है।

सुप्रसिद्ध कला चित्रकार ‘हरमन गोएटज’ ने बीकानेर शैली के चित्रों के संरक्षण में पर्याप्त योगदान दिया।

विशेषताएँ

  • मथेरण एवं उस्ता कला।
  • बीकानेर शैली के चित्रों पर कलाकार का नाम, उसके पिता का नाम एवं संवत् उपलब्ध होता है।
  • मुगल शैली, जैन शैली एवं दक्षिण शैली से प्रभावित है।
  • इस शैली में रेखाओं की गत्यात्मकता, कोमलांकन तथा बारीक रेखांकन विशेष रूप से किया गया।

चटक रंगों के स्थान पर कोमल रंगों का प्रयोग किया गया। लाल, जामुनी, बैंगनी, बादामी आदि रंगों का प्रयोग इस शैली में किया गया। मोतियों के आभूषण का अधिक अंकन।

इस शैली में आकाश को सुनहरे छल्लों से युक्त मेघाच्छादित्त दिखाया गया है। बरसते बादलों में से सारस-मिथुनों की नयनाभिराम आकृतियाँ इस शैली की प्रमुख विशेषता है।

किशनगढ़ शैली

किशनगढ़ रियासत की स्थापना किशनसिंह ने 1609 ई. में की। यहाँ राजा राजसिंह के समय से चित्रकला को प्रोत्साहित किया जाने लगा था। भंवरलाल, सूरध्वज जैसे चित्रकारों ने इस शैली को आगे बढ़ाया।

किशनगढ़ शैली का स्वर्णयुग :- राजा सावंतसिंह का काल (1699-1764 ई.)।

राजा सावंतसिंह ‘नागरीदास’ के नाम से कविताएँ लिखते थे। नागरीदास ने लगभग 75 ग्रंथ लिखे। ‘नागर समुच्चय’ सावंतसिंह का प्रसिद्ध ग्रंथ है।

मोरध्वज निहालचंद राजा सावंतसिंह के दरबार में प्रसिद्ध चित्रकार था। निहालचंद ने राजा सावंतसिंह की पासवान ‘बणी-ठणी’ को राधा का रूप देकर प्रसिद्ध चित्र का चित्रांकन किया। एरिक डिकिन्सन ने बणी-ठणी को ‘भारत की मोनालिसा’ कहा है। भारत सरकार ने 5 मई, 1973 को ‘बणी-ठणी’ पर डाक टिकट जारी किया।

इस शैली को प्रकाश में लाने का श्रेय एरिक डिकिन्सन एवं डॉ. फैयाज अली को दिया जाता है।

प्रसिद्ध चित्रकार :- सूरध्वज, मूलराज, मोरध्वज निहालचंद, सीताराम, अमरु, छोटू, धन्ना, रामनाथ, सवाईराम, लालड़ी दास, तुलसीदास, नानकराम, सूरतराम, अमीरचंद आदि।

विशेषताएँ

  • बणी-ठणी का चित्रण।
  • काव्य में कल्पित रूप एवं मांसल सौन्दर्य का अनूठा चित्रांकन।
  • प्रकृति के विराट रंगमंच का रंगीला चित्रण।
  • कांगड़ा शैली एवं ब्रज साहित्य से प्रभावित शैली।
  • वसली (कागज) पर निर्मित चित्रों का बाहुल्य।
  • वेसरि (नाक में पहना जाने वाला आभूषण) का चित्रांकन।
  • निम्बार्क सम्प्रदाय से प्रभावित शैली।
  • चाँदनी रात में राधा-कृष्ण की केलिक्रीड़ा, बादलों का सिंदूरी चित्रण।

इस शैली में झील, नाँव, कमल का फूल, सारस, बगुला एवं नारी सौंदर्य को प्रमुख रूप से चित्रित किया गया है।

अजमेर शैली

  • जोधपुर शैली, कम्पनी शैली से प्रभावित चित्रकला शैली।
  • इस शैली में हिन्दू, मुस्लिम एवं ईसाई धर्म को समान प्रश्रय मिला।
  • प्रमुख चित्रकार :- चांद, तैयब, नवला, लालजी, रामसिंह भाटी, नारायण, अल्लाबख्श, भाटी माधोजी, उस्ना आदि।
  • महिला चित्रकार साहिबा अजमेर शैली की प्रसिद्ध चितेरी है।
  • इस शैली के चित्रों में लाल, पीले, हरे एवं नीले रंगों के साथ-साथ बैंगनी रंग का विशेष प्रयोग किया गया है।

इस शैली का प्रमुख चित्र चांद द्वारा अंकित राजा पाबूजी का सन् 1698 ई. में चित्रित है।

बीकानेर शैली की भाँति नारी अंकन में इस शैली के चित्रकारों में लावण्यमय लम्बा इकहरा शरीर अंकित किया है।

अजमेर शैली की सबसे बड़ी विशेषता यह रही है कि वह एक स्थान पर केन्द्रित न रहकर छोटे-छोटे ठिकानों एवं जनसाधारण तक पहुँच स्थापित की है।

जैसलमेर शैली

  • संरक्षक :- महारावल हरराज, अखैसिंह व मूलराज।
  • महारावल मूलराज द्वितीय का शासनकाल जैसलमेर चित्रकला शैली का स्वर्णकाल माना जाता है।
  • यह शैली स्थानीय शैली है जिसमें जोधपुर शैली या मुगल शैली का प्रभाव नहीं झलकता है।
  • चित्रों में रंगों का बाहुल्य है।

मूमल’ इस शैली का प्रमुख चित्र है। मूमल लौद्रवा की राजकुमारी थी।

नागौर शैली

  • 18वीं शताब्दी के प्रारम्भ में विकसित शैली।
  • इस शैली में बूझे हुए रंगों का अधिक प्रयोग।
  • पारदर्शी वेशभूषा नागौर शैली की प्रमुख विशेषता है।
  • इस शैली के चित्रों पर जोधपुर, बीकानेर, अजमेर, मुगल और दक्षिण चित्र शैली का मिलाजुला प्रभाव है।
  • वृद्धावस्था’ के चित्रों को नागौर के चित्रकारों ने अत्यन्त कुशलतापूर्वक चित्रित किया है।
  • सन् 1720 ई. का ‘ठाकुर इन्द्रसिंह’ का चित्र इस शैली का उत्कृष्ट चित्र है।
  • नागौर में मुख्य रूप से शबीहों का चित्रण हुआ है।
  • नागौर के महलों के दरवाजों पर भी लाख का चटकदार अंकन हुआ है।

इस शैली में वृक्ष की छाँव में संगीत सुनते युगल नायिकाएँ, उद्यान के महल में मनोरंजन करती महिलाएँ, घोड़ों का अद्वितीय चित्रण, बेलबूटों के बीच उड़ती हुई परियों का चित्रण अत्यन्त मनोहारी प्रतीत होता है।

सिरोही शैली

  • इस शैली में जैन ग्रंथों के लेखन एवं चित्रण का कार्य सर्वाधिक हुआ है।
  • इस शैली में सोमपुरा एवं गुरोसां जाति के चितेरों ने जैन मुनियों की देखरेख में चित्रांकन की परम्परा को आगे बढ़ाया।

सिरोही शैली में भित्ति चित्रण की परम्परा महाराजा अखैराज के समय प्रारम्भ हुई। सिरोही की प्राचीन राजधानी चन्द्रावती में चित्रण परम्परा का उल्लेख ‘विमल प्रबंध’नामक ग्रंथ में मिलता है।

पुरुष आकृति :- गोल चेहरे, बैठी हुई ठुड्‌डी, नाक – भौहें – आँख आदि कम नुकीली, पतली मूँछें एवं छोटा कद।

नारी आकृति :- ठिगनी, गाेल चेहरा, माँसल शरीर, कम नुकीली नाक, मोटी आँख, पीपल के पात जैसा पेट आदि।

  • इस शैली में प्रकृति परिवेश का वृहद चित्रण नहीं मिलता है।
  • इस शैली में लाल, पीले, हरे एवं काले रंगों का अधिक प्रयोग किया गया है। इस शैली में चटकदार रंगों का प्रयोग भी मिलता है।
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