ढूँढाड़ स्कूल

ढूँढाड़ स्कूल

जयपुर एवं उसके आस-पास का क्षेत्र ढूँढाड़ के नाम से जाना जाता है एवं यहाँ विकसित चित्र शैली को ढूँढाड़ चित्र शैली कहा जाता है। ढूँढाड़ स्कूल में आमेर शैली, जयपुर शैली, अलवर शैली, शेखावटी शैली तथा उणियारा उपशैली मुख्यत: शामिल की जाती हैं।

आमेर शैली

ढूंढाड़ शैली का प्रारम्भिक रूप जिसका विकास दो चरणों में हुआ। आमेर शैली का प्रारम्भिक चित्रित ग्रंथ ‘आदिपुराण’ है जो 1540 ई. में पुष्पदत्त द्वारा चित्रित किया गया था।

16वीं सदी के उत्तरार्द्ध में ईसरदा ठिकाने में चित्रित ग्रंथ ‘सचित्र भागवतआमेर शैली के प्रारम्भिक स्वरूप का प्रमुख उदाहरण है।

अकबर के समय रचित ग्रंथ ‘रज्मनामा’ में आमेर शैली के 48 चितेरों के नामों का उल्लेख मिलता हैं जिन्होंने इस ग्रंथ को तैयार करने एवं चित्रित करने में सहयोग दिया था। यह ग्रंथ जयपुर के ‘पोथीखाना’ में सुरक्षित है।

आमेर राजा मानसिंह प्रथम के समय 1590 ई. में आमेर में चित्रित ‘यशोधरा चरित्र’ एवं मोजमाबाद में 1606 ई. में चित्रित ‘आदिपुराण’ आमेर शैली का एक महत्वपूर्ण सचित्र ग्रंथ है जो आमेर शैली का तिथियुक्त क्रमिक विकास को स्पष्ट करते हैं।

आमेर शैली में सचित्र ग्रंथों के अलावा भित्ति चित्रण परम्परा का भी विकास पर्याप्त मात्रा में हुआ है। आमेर शैली में भित्ति चित्र के प्रमाण मानसिंह की छतरी, बैराठ राजा प्रासाद, मुगल गार्डन, आमेर के महल, मौजमाबाद महल, भाऊँपुरा की छतरी आदि में प्राप्त होते हैं।

आमेर शैली के विकास का दुसरा चरण मिर्जा राजा जयसिंह के समय प्रारम्भ होता है। इनके समय बिहारी द्वारा लिखित बिहारी सतसई ने अनेक चित्रकारों व रसिकजनों को प्रभावित किया हैं। मिर्जा राजा जयसिंह ने 1639 ई. में अपनी रानी चन्द्रावती के लिए ‘रसिकप्रिया’ एवं ‘कृष्ण रुक्मणि री वेलि’ आदि ग्रंथों का चित्रांकन करवाया जिसमें कृष्ण एवं गोपियों के युगल स्वरूप का चित्रण लोक शैली में हुआ है।

इस शैली में प्राकृतिक रंगों जैसे गेरु, सफेदा, हिरमच, पेवड़ी, कालूस आदि का प्रयोग अधिक हुआ है।

जयपुर शैली

सन् 1727 ई. में सवाई जयसिंह द्वारा जयपुर शहर बसाने के बाद आमेर शैली के नवीन रूप में विकसित चित्रकला शैली ‘जयपुर शैली’ के रूप में जानी गई।

सवाई जयसिंह ने अपने राजचिन्हों, कोषों, कला का खजाना, साज-सामान आदि को सुव्यवस्थित ढंग से संचालित करने के लिए 36 कारखानों की स्थापना की जिनमें ‘सूरतखाना’ भी एक है। सूरतखाने में जयपुर के चित्रकार चित्रों का निर्माण करते थे।

सवाई जयसिंह के समय ही रसिकप्रिया, कविप्रिया, गीतगोविन्द, रागमाला, बारहमासा एवं नवरस चित्रों का निर्माण हुआ। सवाई जयसिंह के दरबार में मोहम्मद शाह, साहिबराम, शिवदास राय जैसे चित्रकार प्रमुख थे। शिवदास राय ने ब्रजभाषा में ‘सरस रस ग्रंथ’ नामक सचित्र पांडुलिपी को तैयार किया जिसमें कृष्ण विषयक चित्र 39 पृष्ठों पर अंकित हैं।

महाराजा ईश्वरीसिंह के समय का प्रसिद्ध चितेरा साहिबराम था जिसने महाराजा ईश्वरीसिंह का एक आदमकद चित्र चंदरस से बनाया। ईश्वरीसिंह के समय एक अन्य प्रसिद्ध चितेरा लाल था जिसने पशु-पक्षियों की लड़ाई के अनेकानेक चित्र बनाए। 

साहिबराम ने बड़े व्यक्ति चित्र (पोट्रेट – आदमकद) बनाकर चित्रकला में नई परम्परा डाली। ईश्वरीसिंह के समय चित्र सृजन का केन्द्र सूरतखाना (आमेर) से हटकर जयपुर आ गया।

सवाई माधोसिंह प्रथम के शासनकाल में रामजीदास एवं गोविन्द अच्छे चितेरे थे। इस काल में अलंकारों के चित्रण के स्थान पर मोती, लाख तथा लकड़ी की मणियों को चिपका कर रीतिकालीन अलंकारिक मणिकुटि्टम प्रवृत्ति को बढ़ावा दिया।

लाल नामक चितेरा महाराजा ईश्वरीसिंह एवं महाराजा माधोसिंह के समय का प्रसिद्ध चित्रकार था। वह बड़े आकार में शिकार व जंगली जानवरों की लड़ाईयों के चित्र बनाने में निपुण था।

सवाई पृथ्वीसिंह के समय मंगल, हीरानंद, त्रिलोका जैसे प्रसिद्ध चित्रकार थे।

सवाई प्रतापसिंह के शासनकाल को जयपुर चित्रकला शैली का स्वर्णकाल कहा जाता है। सवाई प्रतापसिंह ने स्वयं 21 ग्रंथों का चित्रण किया था। महाराजा प्रतापसिंह के सानिध्य में राधा-कृष्ण की लीलाओं, नायिका भेद, राग-रागिनी, रीति-वर्णन आदि विषयों पर चित्रांकन अधिक हुआ है।

सवाई प्रतापसिंह के समय के प्रमुख चित्रकार साहिबराम, सालिगराम, घासी, रामसेवक, चिमना, निरंजन, गोपाल, उदय, लक्ष्मण, सीताराम, फेडूला, हीरा, मंगला, केसू, सांवला, गजा, हरिनारायण, दयाराम आदि थे।

सवाई जगतसिंह के समय तक जयपुर शैली की मौलिकता बनी रही। गोवर्धनधारण एवं रासमण्डल वाले संसार के प्रसिद्ध चित्र इस समय के प्रमुख उदाहरण है। ‘पुण्डरिक जी की हवेली’ के भित्ति चित्र सवाई जगतसिंह के समय बने थे।

महाराजा रामसिंह के समय कम्पनी शैली के प्रभाव से यथार्थवादी चित्रण का विकास हुआ एवं पोट्रेट चित्र बनाए जाने लगे। महाराजा रामसिंह ने कलाकारों को प्रोत्साहित करने हेतु ‘मदरसा ए हुनरी’ (महाराजा स्कूल ऑफ आर्ट‌्स एण्ड क्राॅफ्टस) की स्थापना की। इसी समय में आचार्य की हवेली, दुसाध की हवेली, सामोद की हवेली, पुरोहितजी की हवेली में सुन्दर भित्ति चित्रों का निर्माण हुआ जिनमें अधिकांश चित्रों पर यूरोपीय प्रभाव झलकता है।

दश महाविद्या का ‘जवाहर सैटमहाराजा सवाई माधोसिंह द्वितीय के समय का प्रमुख चित्र है।

ईश्वरीसिंह के काल में 17” X 27” नाम का कागज इतना लोकप्रिय था कि इन कागज के टुकड़ों को ‘ईश्वरीसिंह पाठा’ नाम से पुकारा गया।

विशेषताएँ

  • बड़े-बड़े केनवासों पर आदमकद चित्रण की परम्परा।
  • चित्रों के हाशिये पर गहरे लाल रंग का प्रयोग।
  • चित्रों में सफेद, लाल, नीला, पीला एवं हरे रंग की बहुलता।
  • जयपुर शैली में पुरुष व महिलाओं के चित्र आनुपातिक है।
  • इस शैली में ‘हाथियों की लड़ाई’ के अद्‌भुत चित्रों का निर्माण।
  • मुगल शैली से अत्यधिक प्रभावित।
  • उद्यान दृश्यों का अधिक चित्रण।

अलवर शैली

सन् 1775 ई. में राव राजा प्रतापसिंह ने जयपुर से अलग होकर अलवर रियासत की स्थापना की। इन्हीं के काल में अलवर में चित्रकला को नया स्वरूप प्रदान किया। प्रतापसिंह के समय शिवकुमार एवं डालूराम प्रसिद्ध चित्रकार थे।

राजगढ़ किले में राव राजा प्रतापसिंह के समय चित्रकार डालूराम द्वारा किया गया भित्ति चित्रण अलवर शैली के चित्रण के प्रारम्भिक सर्वोत्कृष्ट उदाहरण हैं।

अंगडाई लेती, कांटा निकालती एवं शृंगार करती नायिकाओं एवं दासियों का चित्रण भावपूर्ण एवं मनोहारी है।

राव राजा बख्तावरसिंह ने अलवर शैली को सम्मोहक एवं मौलिक स्वरूप प्रदान किया। राजा बख्तावरसिंह ‘चंद्रसखी’ एवं ‘बख्तेश’ नाम से काव्य रचना करते थे। ‘दानलीला’ बख्तावरसिंह का प्रमुख ग्रंथ है। बख्तावरसिंह के समय बलदेव, डालूराम, सालगा, सालिगराम प्रसिद्ध चितेरे थे।

महाराजा विनयसिंह का काल अलवर चित्रकला शैली का स्वर्णकाल माना जाता है। उन्होंने प्राचीन सचित्र पुस्तकों के शाही एलबम एवं लघु चित्रावलियों का संग्रह करवाकर एक पुस्तक शाला की स्थापना की।

महाराजा विनयसिंह के दरबार में गुलाम अली, बलदेव, आगामिर्जा देहलवी, नत्थासिंह दरबेश जैसे विद्वान एवं चित्रकार विद्यमान थे। गुलिस्तां का सुलेखन एवं चित्रांकन उन्हीं के काल में किया गया। विनयसिंह के समय में निर्मित दीवानजी का रंगमहल भित्ति चित्रण की दृष्टि से प्रसिद्ध है।

राजा बलवन्तसिंह के समय चित्रकारों ने पोथी चित्रों, लघु चित्रों एवं लिपटवाँ पट चित्रों का चित्रांकन किया। उनके समय कामशास्त्र पर बने चित्र, वैश्याओं के व्यक्ति चित्र, नफीरी वादन का चित्र प्रमुख है। इनके दरबार में प्रमुख चित्रकार सालिगराम, जमनादास, छोटेलाल, बकसाराम, नन्दराम आदि थे।

महाराजा मंगलसिंह के समय नानकराम, बुद्धराम, उदयराम, मूलचंद, जगन्नाथ एवं रामगोपाल प्रसिद्ध चित्रकार थे।

  • मूलचंद नामक प्रसिद्ध चित्रकार हाथीदाँत पर चित्र बनाने में प्रवीण था।
  • बुद्धराम पशु-पक्षियों के चित्रांकन में दक्ष था।
  • हाराजा शिवदान सिंह के समय मंगलसेन, नानकराम, बुद्धराम प्रसिद्ध चित्रकार थे।

विशेषताएँ

  • ईरानी, मुगल एवं जयपुर शैली का प्रभाव।
  • सुन्दर बेल-बूंटों वाली वस्लियों का निर्माण।
  • चिकने व उज्जवल रंगों का प्रयोग।
  • लाल, हरे व सुनहरी रंगाें का विशेष प्रयोग।
  • हाथीदाँत पर चित्रण।
  • वैश्याओं का चित्रण।
  • योगासन इस शैली का प्रमुख विषय रहा है।

शेखावटी शैली

15वीं सदी में कच्छवाहा वंश के शेखाजी द्वारा शेखावटी क्षेत्र में अपनी स्वतंत्र सत्ता स्थापित कर चित्रण परम्परा को प्रारम्भ किया।

शेखावटी क्षेत्र भित्ति चित्रण के लिए प्रसिद्ध है। इस क्षेत्र में भित्ति चित्र शैली का विकास बड़ी-बड़ी हवेलियों में हुआ।

शेखावटी की हवेलियों में चित्रण की यह परम्परा 19वीं सदी में अपने चरमोत्कर्ष पर थी।

शेखावटी भित्ति चित्रण पर लोक कला शैली के साथ-साथ कम्पनी शैली का भी पूर्ण प्रभाव दिखाई देता है।

शेखावटी को भित्ति चित्रों के कारण ओपन आर्ट गैलेरी की संज्ञा दी जाती है।

शेखावटी क्षेत्र में रामगढ़, नवलगढ़, मुकुन्दगढ़, पिलानी आदि कस्बों में उत्कृष्ट हवेलियाँ हैं जो भित्ति चित्रण के लिए विश्व विख्यात है।

शेखावटी के भित्ति चित्र धार्मिक, सामंती एवं शृंगारिक, लोक जीवन आधारित, औद्योगिकरण एवं कम्पनी शैली से प्रभावित है।

विशेषताएँ

  • बड़े-बड़े हाथी और घोड़ों तथा चोबदारों, चँवर-धारणियों का लोक-कलात्मक अंकन।
  • गवाक्षों के दोनों ओर की दीवारों पर चित्रांकन।
  • गवाक्ष एवं मुख्य द्वार पर सुघड़ शैली में देवी-देवताओं का अंकन।
  • हवेलियों की बाह्य दीवारों पर एवं अंदर कथात्मक बड़े-बड़े फलकों का चित्रांकन।
  • भित्ति चित्रण में विविध विषयों का चयन, स्वर्ण एवं प्राकृतिक रंगाें का प्रयोग, फ्रेस्काे-ब्रुनो, फ्रेस्को-सेको व फ्रेस्को-सिम्पल विधियों का प्रयोग किया गया।
  • शेखावटी के भित्ति चित्रण में कत्थई, नीले व गुलाबी रंग की प्रधानता है।
  • शेखावटी के भित्ति चित्रण में ‘बलखाती बालों की लट का एक ओर अंकन’ मुख्य विशेषता है।

शेखावटी के भित्ति चित्रों में तिथि एवं चित्रकारों के नाम मिलते हैं।

शेखावटी की उदयपुरवाटी में जोगीदास की छतरी के भित्ति चित्र चित्रांकन परम्परा का प्राचीनतम उदाहरण है। इसके चित्रकार का नाम ‘देवा’ मिलता है।

फ्रांसीसी ‘नदीन ला प्रेन्स’ ने फतेहपुर की हवेलियों के भित्ति चित्रों के संरक्षण के लिए सराहनीय कार्य किया।

उनियारा शैली

  • जयपुर एवं बूँदी रियासतों की सीमा पर बसा नरुका ठिकाना।
  • राव राजा सरदारसिंह के समय चित्रकला का विकास प्रारम्भ हुआ। इस समय भीमा, मीरबक्श, काशी, रामलखन, भीम प्रसिद्ध चित्रकार थे जिन्होंने नगर एवं उनियारा के रंगमहलाें में भित्ति चित्रण को चित्रित किया। इस शैली पर जयपुर एवं बूँदी शैली का समन्वित प्रभाव है।

उनियारा में कवि केशव की कविप्रिया पर आधारित बारहमासा, राग-रागिनी, राजाओं के भित्ति चित्र एवं धार्मिक चित्रों का चित्रण किया गया है।

मीरबक्श द्वारा चित्रित ‘राम-सीता, लक्ष्मण-हनुमान’ उणियारा शैली का उत्कृष्ट चित्र है।

उनियारा शैली भित्ति चित्रण एवं लघु चित्रण के लिए प्रसिद्ध है।

इस शैली में पशु, पक्षियों एवं वनस्पतियों का अंकन कुशलता से किया गया। ऊँट, शेर, घोड़ा, हाथी आदि के चित्र प्रमखता से चित्रित है।

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