राजस्थान में भेड़ की प्रमुख नस्लें

10 नस्ले उपलब्ध हैं- नाली, मगरा, पूगल, चोखला, जैसलमेरी, मारवाड़ी, सोनाड़ी, देशी या खेरी, मालपुरी तथा बागड़ी भारवाठी ‘नाल’ । सर्वाधिक – बाड़मेर, जैसलमेर। न्यूनतम- बांसवाड़ा।

नाली

  • गंगानगर, हनुमानगढ़, बीकानेर, चूरू जिलों में। ऊन- मध्यम श्रेणी की सबसे लम्बी ऊन (12-14 cm) अधिक ऊन के लिए प्रसिद्ध। गलीचे के लिए प्रयोग की जाती है।

पूगल

  • बीकानेर, जैसलमेर व नागौर जिले में। मध्यम मोटी ऊन गलीचे के लिए प्रयुक्त होती है।

मगरा

  • इसे चकरी व बीकानेरी चौकला भी कहते हैं। जिले- बीकानेर, नागौर, चूरू। ऊन- मध्यम मोटी।

जैसलमेरी

  • इसकी नाक को रोमन नाक कहते हैं। प्रति भेड़ सर्वाधिक ऊन यह देती है। 3-4 kg/भेड़। इनका चेहरा गहरा भूरा होता है।

मारवाड़ी

  • जोधपुर संभाग में पाई जाती है। सर्वाधिक संख्या में यही भेड़ पाई जाती है। रोग प्रतिरोधक क्षमता सर्वाधिक अतः लम्बी दूरी तक चल सकती है।
  • घुमक्कड़ रेवड़ों में होती है। राजस्थान में सर्वाधिक ऊन इसी भेड़ से प्राप्त होती है।

चोकला

  • इसे छापर भी कहते हैं। शेखावाटी क्षेत्र में मिलती है। इस नस्ल को भारतीय मेरिनो कहा जाता है। झुंझुनू, सीकर, बीकानेर, चुरु व जयपुर।
  • सर्वोत्तम ऊन यही होती है क्योंकि यह मुलायम है।

बागड़ी

  • अलवर, भरतपुर। मुँह काला व शेष शरीर सफेद होता है। इसका रेशा सबसे छोटा होता है।

देशी/खेरी

  • पाली, अजमेर, नागौर।

मालपुरी

  • टोंक, दौसा, जयपुर, सवाई माधोपुर बूंदी, भीलवाड़ा में। इसे माँस के लिए काम लेते हैं। ऊन छोटी होती है। गलीचों के लिए उपयुक्त ‘देशी नाल’

सोनाड़ी (चनोथर)

  • उदयपुर, कोटा संभाग, डूंगरपुर, चितौड़, बांसवाड़ा, भीलवाड़ा। कान व पूंछ लम्बे। कान चरते समय जमीन को छूते हैं। ऊन साधारण।
  • विदेशी नस्लें : रूसी मेरिनो (रूस), डोसेंट (डेनमार्ग), रेम्बुले (फ्रांस)।
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