पर्यावरणीय एवं पारिस्थितिकीय मुद्दें

पर्यावरणीय एवं पारिस्थितिकीय मुद्दें

Table of Contents

  • पर्यावरण अंग्रेजी भाषा के शब्द Environment का हिन्दी अर्थ है। जो फ्रेंच शब्द Environ से बना है।
  • Environ का अर्थ होता है- आसपास का आवरण।
  • हिन्दी शब्द पर्यावरण (परि+आवरण) का अर्थ ओता है। परि= चारों तरफ, आवरण= घेरा, अर्थात् प्रकृति में जो भी चारों तरफ परिलक्षित है जैसे वायु, जल, मिट्टी, पेड़-पौधे, जीव-जन्तु सभी पर्यावरण के अंग है।
  • प्रकृति में पाए जाने वाले-

Environment in rajasthan

  • निर्जीव भौतिक घटकों – वायु, जल, मृदा आदि।
  • जैविक घटकों – पेड़-पौधे, जीव-जंतु, सूक्ष्म जीवाणु आदि के आधार पर पर्यावरण को मुख्यतः दो भागों में विभाजित किया गया है-
  • भौतिक पर्यावरण (अजैविक पर्यावरण)
  • जैविक पर्यावरण

पर्यावरण के प्रकार

  • पर्यावरण की प्रकृति गतिशील है। भौतिक तथा जैविक पर्यावरण के तत्त्वों में सदैव कुछ न कुछ परिवर्तन होता रहता है। पर्यावरण के परिवर्तन का प्रभाव पेड़-पौधों और जीव जन्तुओं पर होता है।
  • आज से 10 लाख वर्ष पूर्व पर्यावरण में आए परिवर्तन के कारण मनुष्य का विकास हुआ था।

पर्यावरणीय समस्याऐं

  • स्थलीय वातावरण से संबंधित समस्याएं
  • वायुमण्डलीय वातावरण से संबंधित समस्याएं
  • जैविक वातावरण से संबंधित समस्याएं

स्थलीय वातावरण से संबंधित समस्याएं

  • मृदा प्रदूषण
  • जल प्रदूषण
  • वनों का विनाश

मृदा प्रदूषण

  • जब भूमि में प्रदूषित जल, रसायनयुक्त कीचड़, कूड़ा, कीटनाशक दवा और उर्वरक अत्यधिक मात्रा में प्रवेश कर जाते हैं तो उससे भूमि की गुणवत्ता घट जाती है। इसे मृदा-प्रदूषण कहा जाता है। मृदा-प्रदूषण की घटना भी आधुनिकता की देन है।

मृदा-प्रदूषण के कारण

कीटनाशक व उर्वरक- कीटनाशक व उर्वरक मृदा-प्रदूषण के प्रमुख कारण हैं। इनके प्रयोग से फसलों की प्राप्ति तो हो जाती है, लेकिन जब वे तत्त्व भूमि में एकत्रित हो जाते हैं तो मिट्टी के सूक्ष्म जीवों का विनाश कर देते हैं। इससे मिट्टी का तापमान प्रभावित होता है और उसके पोषक तत्त्वों के गुण समाप्त हो जाते हैं।

घरेलू अवशिष्ट-कूड़ा-कचरा, गीली जूठन, रद्दी, कागज, पत्तियां, गन्ना-अवशिष्ट, लकड़ी, कांच व चीनी मिट्टी के टूटे हुए बर्तन, चूल्हे की राख, कपड़े, टीन के डिब्बे, सडे-गले फल व सब्जियाँ, अंडों के छिलके आदि अनेक प्रकार के व्यर्थ पदार्थ मिट्टी में मिलकर मृदा-प्रदूषण को बढ़ावा देते हैं।

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औद्योगिक अवशिष्ट- उद्योगों से निकल व्यर्थ पदार्थ किसी न किसी रूप में मृदा-प्रदूषण का कारण बनते हैं।

नगरीय अवशिष्ट- इसके अन्तर्गत मुख्यतः कूड़ा-करकट, मानव मल, सब्जी बाजार के सड़े-गले फल व सब्जियों का कचरा, बाग-बगीचों का कचरा, उद्योगों, सड़कों, नालियों व गटरों का कचरा, मांस व मछली बाजार का कचरा, मरे हुए जानवर व चर्मशोधन का कचरा, आदि को सम्मिलित किया जाता है। इन सबसे मृदा-प्रदूषण होता है।

मृदा-प्रदूषण नियंत्रण के उपाय

  • व्यर्थ पदार्थों व अवशिष्टों का समुचित निक्षेपण किया जाना चाहिए।
  • कृषि कार्यों में डी.डी.टी., लिण्डेन, एल्ड्रिन तथा डीलिड्रन आदि के प्रयोग पर प्रतिबंध लगा देना चाहिए।
  • नागरिकों को चाहिए कि वे कूड़ा-कचरा सड़क पर न फैंके।
  • अस्वच्छ शौचालयों के स्थान पर स्वच्छ शौचालयों का निर्माण करना चाहिए।
  • अपशिष्टों के निक्षेपण को प्राथमिकता दी जानी चाहिए।
  • नागरिकों में सफाई के प्रति चेतना जागृत करनी चाहिए।
  • मृदा-क्षरण को रोकने के उपाय करने चाहिए।

जल प्रदूषण

जल में किसी ऐसे बाहरी पदार्थ की उपस्थिति, जो जल के स्वाभाविक गुणों को इस प्रकार परिवर्तित कर दे कि जल स्वास्थ्य के लिए नुकसानदेह हो जाय या उसकी उपयोगिता कम हो जाय, जल प्रदूषण कहलाता है।

जल प्रदूषण निवारण तथा नियन्त्रण अधिनियम, 1974 की धारा 2 (ड) के अनुसार जल प्रदूषण का अर्थ है- जल का इस प्रकार का संक्रमण या जल के भौतिक, रासायनिक या जैविक गुणों में इस प्रकार का परिवर्तन या किसी (व्यापारिक) औद्योगिक बहिःस्राव का या किसी तरल वायु (गैसीय) या ठोस वस्तु का जल में विसर्जन जिससे उच्चताप हो रहा हो या होने की सम्भावना हो।

या ऐसे जल को नुकसानदेह तथा लोक स्वास्थ्य को या लोक सुरक्षा को या घरेलू, व्यापारिक, औद्योगिक, कृषीय या अन्य वैधपूर्ण उपयोग को या पशु या पौधों के स्वास्थ्य तथा जीव-जन्तु को या जलीय जीवन को क्षतिग्रस्त करें।

वे वस्तुएं एवं पदार्थ जो जल की शुद्धता एवं गुणों को नष्ट करते हों, प्रदूषक कहलाते हैं।

जल प्रदूषण के स्रोत अथवा कारण

जल प्रदूषण के सेतों अथवा कारणों को दो वर्ग़ों में बांटा जा सकता है-

  1. प्राकृतिक स्रोत
  2. मानवीय स्रोत।

जल प्रदूषण के प्राकृतिक स्रोत

  • कभी-कभी भूस्खलन के दौरान खनिज पदार्थ, पेड़-पौधों की पत्तियां जल में मिल जाती हैं जिससे जल प्रदूषण होता है।
  • इसके अतिरिक्त नदियों, झरनों, कुओं, तालाबों का जल जिन स्थानों से बहकर आता है या इकट्ठा रहता है, वहां की भूमि में यदि खनिजों की मात्रा है तो वह जल में मिल जाता है। वैसे तो इसका कोई गम्भीर प्रभाव नहीं होता है।
  • परन्तु यदि जल में इसकी मात्रा बढ़ जाती है तो नुकसानदेह साबित होते हैं।
  • यही कारण है कि किसी क्षेत्र विशेष में एक ही बीमारी से बहुत से लोग पीड़ित होते हैं क्योंकि उस क्षेत्र विशेष के लोग एक जैसे प्राकृतिक रूप से प्रदूषित जल का उपयोग करते हैं।
  • जल में जिन धातुओं का मिश्रण होता है उन्हें विषैले पदार्थ कहते हैं- जैसे सीसा, पारा, आर्सेनिक तथा कैडमियम।
  • इसके अतिरिक्त जल में बेरियम, कोबाल्ट, निकल एवं वैनेडियम जैसी विषैली धातुएं भी अल्पमात्रा में पायी जाती हैं।

जल प्रदूषण के मानवीय स्रोत

जल प्रदूषण के मानवीय स्रोत अथवा कारण हैं-

  1. घरेलू बहिःस्राव (Domestic effluent)
  2. वाहित मल (Sweage)
  3. कृषि बहिःस्राव (Agricultural effluent)
  4. औद्योगिक बहिःस्राव (Industrial effluent)
  5. तेल प्रदूषण (Oil pollution)
  6. तापीय प्रदूषण (Thermal pollution)
  7. रेडियोधर्मी अपशिष्ट एवं अव्पात (Radioactive wastes and fall outs)
  8. अन्य कारण (Other causes of pollution)

जल प्रदूषण का प्रभाव (Effect of Water Pollution)

  • जल प्रदूषण का प्रभाव बहुत ही खतरनाक होता है। इससे मानव तो बुरी तरह प्रभावित होता ही है, जलीय जीव-जन्तु, जलीय पादप तथा पशु-पक्षी भी प्रभावित होते हैं।
  1. जलीय जीव-जन्तुओं पर प्रभाव
  2. जलीय पादपों पर प्रभाव
  3. पशु-पक्षियों पर प्रभाव
  4. मानव पर प्रभाव
  5. जल प्रदूषण के कुछ अन्य प्रभाव
  • पेयजल का अरुचिकर तथा दुर्गन्धयुक्त होना
  • सागरों की क्षमता में कमी
  • उद्योगों की क्षमता में कमी

जल में विद्यमान रोगकारक तथा उनसे होने वाले रोग

रोगरोगकारक
1. पोलियोविषाणु
2. पीलिया,गेस्ट्रोइंटराइटिसजीवाणु
3. डायरियाइस्केरीचिया
4. हैजाविब्रियो कालेरी
5. मियादी बुखार (टायफायड)सालमोनेरा टायफी
6. लैप्टास्फाइरोसिसलैप्टोस्पाइस स्पीसीज कृमि
7. पेचिससिजैला स्पीसीज कृमि
8. कृमिचर्म,हुकचर्म,चुनचुना तथा इकाइनोकाकसएक कोशीय जीव
9. आम वात, जियोर्डियोसिसअमीबा आदि।
जल में विद्यमान रोगकारक तथा उनसे होने वाले रोग

रासायनिक अवयव तथा स्वास्थ्य पर उनका प्रभाव

अवयवस्रोत/कारणइष्टतम सीमा (मिलीग्राम/लीटर)प्रभाव
1. आर्सेनिकऔद्योगिक प्रदूषण0.05कैंसर का कारण
2. सीसाऔद्योगिक अपशिष्ट0.05ऊतकों में एकत्र होकर सीसा की विषाक्तता
3. सायनाइडविद्युत लेपन अपशिष्ट0.01जैव क्रियाओं पर प्रभाव
4. बेरियमकार्बोनेट के रूप में तथा लवणीय जल में1.0हृदय, नाड़ी तथा रुधिर वाहिका के लिए घातक
5. क्रोमियम औद्योगिक अपशिष्ट0.05कैंसर का कारण
6. चांदीऔद्योगिक प्रदूषण0.05अर्जिया रोग  जिससे आंखों एवं त्वचा का रंग नीला या स्लेटी हो जाता है।
7. सोलोनियमऔद्योगिक प्रदूषण0.01दन्त क्षय एवं कैंसर का कारण
8. कैडमियमविद्युत लेपन अपशिष्ट0.01वृक्क की धमनियों के लिए घातक
रासायनिक अवयव तथा स्वास्थ्य पर उनका प्रभाव

वनों का विनाश

  • वनों के विनाश से जैविक वातावरण प्रभावित होता है।
  • मनुष्य ने अपने तात्कालिक लाभ के लिये वनों का विनाश किया।
  • हर वर्ष जंगलों में खेती के लिये, इऔधन के लिए या इमारती लकड़ी के लिये वनों को काटा।
  • जिससे प्रकृति का असंतुलन बढ़ता जा रहा है।
  • क्योंकि ये कार्बनडाई ऑक्साइड गैस को अवशोषित कर ऑक्सीजन छोड़ते हैं और धरती का तापमान बनाये रखने में सहयोग करते हैं।
  • ये मृदा के अपरदन को भी रोकते हैं।
  • लेकिन वनों के विनाश से वातावरण में CO2 की मात्रा बढ़ती जा रही है तथा वर्षा की मात्रा कम हो रही है।
  • जिससे पर्यावरणीय समस्या उत्पन्न हो रही है।
  • बढ़ता मरूस्थलीकरण भी इसी का एक परिणाम है।

वायुमण्डलीय वातावरण से संबंधित समस्याएं

  • वायुमंडलीय वातावरण से संबंधित समस्याएँ – जीवाश्मी ऊर्जा (कोयला, पेट्रोल, डीजल, गैस आदि) के अत्यधिक प्रयोग, वनों के तीव्र विनाश, परिवहन साधनों के उपयोग में भारी वृद्धि आदि के कारण वेश्विक जलवायु परिवर्तन देखने को मिले हैं।

वायुमडलीय वातावरण से संबंधित असंतुलन मुख्यतः तीन प्रकार के हैं –

  • ओजोन छिद्र (Ozone Hole)
  • भूमंडलीय तापन (Global Warming)
  • अम्लीय वर्षा (Acid Rain)
  • ओजोन छिद्र (Ozone Hole)
  • समताप मंडल के ऊपरी भाग में पायी जानेवाली ओजोन परत सूर्य के पेराबैंगनी किरणों को अवशोषित कर लेती है।
  • इन किरणों से चर्म रोग व चर्म कैंसर होने का खतरा रहता है तथा कृषि व जलवायु पर बुरा प्रभाव पड़ सकता है।
  • ओजोन परत से सूर्य की पराबैंगनी किरणों की 70 से 90 प्रतिशत तरंगें छन जाती है।
  • ओजोन परत में छेद सर्वप्रथम फॉरमैन द्वारा 1973 में अंटार्कटिका में देखा गया था।
  • अंटार्कटिका के ऊपर स्थित ओजोन परत के इस छेद में सामान्यतः सितम्बर व अक्टूबर के दौरान ही वृद्धि होती है।
  • ओजोन परत में छेद होने का प्रमुख कारक क्लोरिन है।
  • इसकी उत्पति क्लोराफ्लोरो कार्बन, हैलोजेन्स व इनसे संबंधित कुछ अन्य पदार्थ कार्बन, टेट्राक्लोरीन व मिथाइल क्लोरोफार्म जैसे रसायनों से होती है।
  • वैज्ञानिकों के अनुसार क्लोरीन का एक अणु ओजोन के 1 लाख अणुओं को तोड़ सकता है।
  • रेफ्रिजरेशन, एयर कंडीशनिंग व प्लास्टिक आदि ने ओजोन परत को छेदने में प्रमुख भूमिका निभाई है।
  • इनसे उत्सर्जित होने वाले क्लोरोफ्लोरो कार्बन (HFC), मिथाइल ब्रोमाइड आदि रसायनों के बढ़ते उपयोग से तथा जेट विमानों द्वारा उत्सर्जित नाइट्रोजन ऑक्साइड के कारण ओजोन परत में छिद्र की समस्या उत्पन्न हो गई है।
  • पृथ्वी पर चर्म कैंसर के लिए अंटार्कटिक के ऊपर के ओजोन छिद्र को उत्तरदायी समझा जाता है।
  • चिली के भेड़ो में अंधापन, अंटार्कटिक में प्लैंक्टन घास के खत्म होने की प्रवृति, ऑस्टेलिया के पूर्वी तट पर प्रवाल जीवों के असामयिक विनाश का कारण भी इसी छ्रिद्र को माना जा रहा है।
  • एक नए ओजाने छिद्र का पता आर्कटिक सागर के ऊपर चला है जिसका प्रतिकूल प्रभाव उ. गोलार्द्ध में होने की आशंका है।
  • ओजोन परत में बढ़ते छिद्र को रोकने के लिए 1987 ई. में मांट्रियल (कनाडा) में एक अंतर्राष्ट्रीय सम्मेलन आयोजित किया गया था, जिसमें विभिन्न राष्ट्रों की सहमति ली गई है।

भूमंडलीय तापन (Global waming)

  • औद्योगिक क्रांति के बाद से वायुमंडल में कार्बन-डाई-आक्साइड (CO2), कार्बन-मोनो-ऑक्साइड (CO),मीथेन (CH4), क्लोरो-फलोरो-कार्बन (CFC), हाइड्रो -फ्लोरो कार्बन (HFC) आदि ग्रीन हाउस गैसों की मात्रा में तीव्र वृद्धि हुई है।
  • इनमें भी भूमंडलीय तापन के लिए मुख्यतः CO2  जिम्मेदार है।
  • यह भारी गैसों में आती है एवं वायुमंडल के पार्थिव विकिरण के लिए अपारगम्यता को बढ़ाती है।
  • इस कारण ग्रीन हाउस प्रभाव उत्पन्न होते हैं और तापमान में वृद्धि देखी जाती है।
  • यदि वायुमंडल में CO2 की मात्रा इसी तरह बढ़ती रही तो 1900 ई. की तुलना में 2030 ई. में विश्व के तापमान में 30C की वृद्धि हो जाएगी।
  • भूमंडलीय तापन के कारण हिम क्षेत्र पिघलेंगे जिसके परिणामस्वरूप समुद्री जलस्तर 2.5 से 3 मी. तक बढ़ जाएगा।
  • इससे अनेक द्वीपों और तटीय क्षेत्रों के डूबने की आशंका है।
  • उदाहरण के लिए प्रशांत महासागर का तुवालू और कारटरेट द्वीप डूब गए हैं एवं मालदीव के भी जलमग्न होने की आशंका है।
  • तापमान बढ़ने के कारण अनेक सूक्ष्म जीव व जीव-जन्तु विनष्ट हो सकते है ंएवं जैव-विविधता में कमी आएगी।
  • अमेरिकी अंतरिक्ष एजेंसी ‘नासा’ के गोड्डार्ट इंस्टीट्यूट फॉर स्पेस स्टडीज के आंकलन के अनुसार पिछली एक सदी में सर्वाधिक गर्म पांच वर्ष पिछले एक दशक में ही रहे है।
  • सन् 2012 अब तक का सबसे गर्म वर्ष रहा है।

अम्लीय वर्षा (Acid Rain)

  • वायुमंडल में सल्फर डाइऑक्साइड नाइट्रोजन के ऑक्साइड, क्लोरीन व फ्लोरीन जैसे हैलोजन पदार्थों के मिलने से वर्षा में अम्लीयता की मात्रा बढ़ी है।
  • जब वर्षा जल का PH मान 5 से नीचे आ जाता है तो यह अत्यधिक हानिकारक हो जाता है।
  • वर्षा में सल्फ्युरिक अम्ल, नाइट्रिक अम्ल, हाइड्रोक्लोरिक अम्ल आदि के मिश्रण का पर्यावरण पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता हैं।
  • वनस्पति के क्लोरोफिल पर भी इसका विपरीत प्रभाव पड़ता है एवं उनकी प्रकाश संश्लेषण की क्रिया बाधित होती है।
  • इससे उनके पत्ते पीले पड़ने लगते हैं और वनस्पति जल्दी नष्ट हो जाती है।
  • झीलों में अम्लीयता के बढ़ने से नार्वे, अमेरिका व कनाडा जैसे देशों के मत्स्य-उद्योग पर प्रतिकूल असर पड़ा है।
  • संगमरमर की इमारतों पर भी इसका नकारात्मक प्रभाव पड़ता है।
  • ताजमहल के संदर्भ में इसे समझा जा सकता है।

जैविक वातावरण से संबंधित समस्याएँ

  • पारिस्थितिक संतुलन का सर्वाधिक प्रतिकूल प्रभाव जीवमंडल के जैविक संरचना पर पड़ा है।
  • UNEP के एक रिपोर्ट के अनुसार प्रतिदिन 50 जीव-जन्तुओं की प्रजातियाँ विलुप्त होने की श्रेणियों में आ रहे हैं।
  • यह जैविक विनाश वनों के विनाश से भी संबंद्ध है।
  • प्रेयरी भैंस, सफेद हाथी, सफेद बाघ, दरयाई घोड़ा, चिम्पांजी, व्हेल, डॉल्फिन, प्रवाल जीव आदि अत्यधिक संकटग्रस्त स्थिति में हैं।
  • पुनः जैव – तकनीकी से उत्पन्न ट्रांसजेनिक बीजों एवं जीवों के कारण पंरपरागत बीज व जीव क्रमशः विलीन होते जा रहे है।
  • मानव की संख्या में अनियंत्रित वृद्धि व प्रकृति के अनियोजित व अनियंत्रित दोहन से खाद्य – श्रृंखला प्रतिकूल रूप से प्रभावित हुआ है।

पर्यावरण संरक्षण हेतु विभिन्न अंतर्राष्ट्रीय संगठन, प्रयास, कानून एवं संधियाँ

पर्यावरण पर स्टाकहोम सम्मेलन (Stockholm Conference on Environment)

  • संयुक्त राष्ट्र संघ द्वारा जून 1972 में स्वीडन की राजधानी स्टाकहोम में आयोजित पर्यावरण सम्मेलन में वैज्ञानिकों ने नदी जल प्रदूषण, वन विनाश, वायु प्रदूषण, खाद्य अपमिश्रण, परमाणु परीक्षण तथा औद्योगिक बस्तियों के विस्तार पर चिंता व्यक्त की।
  • स्टाकहोम सम्मेलन में जारी मानवीय पर्यावरण संबंधी घोषणा मानव अधिकारों की सार्वभौम घोषणा की तरह महत्वपूर्ण है।
  • स्टाकहोम सम्मेलन में दिए गए सुझाव के अनुसार प्रतिवर्ष 5 जून को विश्व पर्यावरण दिवस मनाया जाता है।
  • पर्यावरण के स्टाकहोम सम्मेलन की सिफारिश के अनुरूप विश्व स्तर पर पर्यावरण कार्यक्रमों का समन्वय करने के लिए 58 सदस्यीय संयुक्त राष्ट्रीय पर्यावरण कार्यक्रम (UNEP – United Nations Environment Programme) की स्थापना की गई। जून 1972 में स्थापित। 
  • संयुक्त राष्ट्रीय पर्यावरण कार्यक्रम का मुख्यालय नैरोबी (केन्या) में स्थापित किया गया।
  • किसी विकासशील देश में स्थापित की गई संयुक्त राष्ट्र संगठन की यह प्रथम एजेंसी है।

रियो पृथ्वी सम्मेलन

  • पर्यावरण एवं विकास पर सं.रा.सं. का प्रथम सम्मेलन 13-14 जून, 1992 के बीच ब्राजील के रियो डि जेनेरियो नगर के आयोजित किया गया।
  • पृथ्वी-1 के नाम से प्रसिद्ध रियो सम्मेलन में आगामी शताब्दी के लिए विकास एवं पर्यावरण संबंधी एजेण्डा-21 को स्वीकार किया गया।
  • रियो पृथ्वी सम्मेलन में हस्ताक्षरित विश्व जैव विविधता संधि 29 दिसम्बर, 1993 को लागू हो गई।
  • अमेरिका ने अभी तक इस जैव विविधता संधि पर हस्ताक्षर नहीं किए।
  • रियो पृथ्वी सम्मेलन में स्वीकार किए गए एजेण्डा 21 नामक दस्तावेज में संतुलित एवं पर्यावरण पोषणीय विकास (Sustainable Development) के उपायों का उल्लेख किया गया है।
  • रियो सम्मेलन की सिफारिश पर संयुक्त राष्ट्र महासभा द्वारा एजेण्डा 21 के क्रियान्वयन की निगरानी हेतु 53 सदस्यीय सतत् विकास आयोग का गठन किया गया।
  • यह आयोग आर्थिक एवं सामाजिक परिषद के अधीन कार्य करता है।

संयुक्त राष्ट्र पृथ्वी शिखर सम्मेलन

  • वर्ष 1992 के रियो पृथ्वी शिखर सम्मेलन में घोषित कार्यक्रमों की प्रगति की समीक्षा करने के लिए जून 1997 में न्यूयार्क में संयुक्त राष्ट्र पृथ्वी शिखर सम्मेलन आयोजित किया गया।
  • 170 देशों के प्रतिनिधियो के इस सम्मेलन में वनों के क्षेत्र में कमी तथा लुप्त हो रही प्रजातियों पर चिंता व्यक्ति की गई।
  • सम्मेलन में वन संरक्षपण, जहरीली गैसों के उत्सर्जन, पर्यावरण के अनुकूल तकनीकी के वित्तपोषण व इसके आसान हस्तान्तरण पर गहन विचार विमर्श हुआ परन्तु कोई समझौता संभव नहीं हो सका।
  • सितम्बर 2002 को दक्षिण अफ्रीका के जोहान्सबर्ग में संपन्न 189 देशों के पृथ्वी सम्मेलन में पर्यावरण को हुई क्षति की भरपाई करने तथा गरीबी दूर करने का संकल्प लिया गया।

ग्लोबल वार्मिंग पर क्योटो प्रोटोकाल

  • बढ़ते हुए तापमान के दुष्प्रभावों से पृथ्वी की रक्षा करने हेतु जापान के शहर क्योटो मे दिसम्बर, 1997 को ग्लोबल वार्मिंग सम्मेलन आयोजित किया गया।
  • इस सम्मेलन में वैश्विक तापन हेतु उत्तरदायी गैसों के उत्सर्जन को नियंत्रित करने के लिए सभी राष्ट्रों के बीच सहमति हुई।
  • क्योटो सम्मेलन इस सम्मेलन में यह निर्णय लिया गया कि सन् 2008 से 2012 तक अवधि में तीन प्रमुख ग्रीन हाउस गैसों अर्थात कार्बनडाई आक्साइड, मिथेन, नाइट्स ऑक्साइड के 1990 के उत्सर्जन स्तर में औसतन पांच प्रतिशत की कमी लायी जायेगी।
  • इसके अंतर्गत 2008 से 2012 तक –
  1. यूरोपीय संघ के सदस्य देश-8 प्रतिशत,
  2. जापान -6 प्रतिशत
  3. अमेरिका-8 प्रतिशत

     तक ग्रीन हाउस गैसों के उत्सर्जन में कमी करके इसे 1990 के स्तर तक ले जाएंगे।

  • क्योटो प्रोटोकाल के अंतर्गत यूरोपीय संघ के देशों, जापान तथा अमेरिका के अलावा 21 अन्य औद्योगिक राष्ट्र तथा प्रोटोकाल पर हस्ताक्षर करने वाले अन्य देश, 2008 से 2012 तक 6 ग्रीनहाउस गैसों-
  1. कार्बनडाई आक्साइड
  2. मीथेन
  3. नाइट्रस आक्साइड
  4. हाइड्रोफ्लोरो कार्बन्स
  5. परफ्यूरोकार्बन्स
  6. सल्फर हैक्साफ्लोराइड के उत्सर्जन में कमी करेंगे।
  • ‘विश्व पर्यावरण तथा ग्रीन हाउस सम्मेलन’ के नाम से चर्चित इस अंतर्राष्ट्रीय सम्मेलन की अध्यक्षता राउल प्रस्टाडा ने की थी।
  • अद्यतन इस क्योटो प्रोटोकाल को विश्व के 25 देशों ने अनुमोदित कर दिया है।
  • क्योटो प्रोटाकाल को यूरोपीय संघ के देशों तथा रूस ने स्वीकार कर लिया है, परन्तु अमेरिका ने इस संधि को अभी तक स्वीकार नहीं किए।
  • द हेग (नीदरलैण्ड) में नवम्बर 2000 में मौसम परिवर्तन पर छठा संयुक्त राष्ट्र सम्मेलन का आयोजन हुआ।

पर्यावरण पर बैंकाक सम्मेलन

  • 30 अप्रैल, 2007 को थाईलैण्ड की राजधानी बैंकाक में जलवायु परिवर्तन पर एक सम्मेलन प्रारंभ हुआ।
  • जलवायु परिवतन पर संयुक्त राष्ट्र द्वारा गठित अंतरसरकारी पैनल (I.P.C.C. – Intergovernmental Panel on Climate Change) की यह तीसरी बैठक थी।
  • इसका उद्देश्य जलवायु परिवर्तन के संबंध में तकनीकी एवं अर्थव्यवस्था के विभिन्न पहलुओं के बारे में निश्चित दिशा निर्देशों का तय किया जाना है, ताकि 2030 तक पूरी दूनिया में हानिकारक कार्बन गैसों के उत्सर्जन पर रोक लगाया जा सके।
  • इस अंतरसरकारी पैनल (I.P.C.C.) के अध्यक्ष हो सुंग ली (द. कोरिया ) हैं।
  • 4 मई, 2007 को इस सम्मेलन से संबंधीत एक रिपोर्ट प्रस्तुत की गई जिसमें वैज्ञानिकों ने सहमति व्यक्ति की है कि पृथ्वी के बढ़ते तापमान और जलवायु परिवर्तन से मानव समेत सभी जीव-जंतुओं और वनस्पतियों के अस्तित्व पर आये संकट को टालने के लिए अगले 50 वर्षों में ग्रीन हाउस गैसों के उत्सर्जन में 85 प्रतिशत तक की भारी कटौती करनी होगी, जो बहुत थोड़ी कीमत पर हासिल हो सकेगी तथा जिसमें वैश्विक सकल घरेलू उत्पादन में मात्र 0.12 प्रतिशत का घाटा उठाना होगा।
  • 120 देशों के 400 पर्यावरण वैज्ञानिकों और विशेषज्ञों द्वारा तैयार रिपोर्ट में परमाणु ऊर्जा से लेकर उर्वरक उत्पादन तक औद्योगिक और मानवीय गतिविधियों में परम्परागत तरीकों की जगह पर्यावरण के अनुकूल नई प्रौद्योगिकी और वैज्ञानिक तरीके अपनाने की शिफारिश की गई है।

नूसादुआ-बाली सम्मेलन

  • सुयंक्त राष्ट्र के नेतृत्व में 3-15 दिसंबर 2007 तक इंडोनेशिया के बाली द्वीप में स्थित नूसादुआ में विश्व जलवायु सम्मेलन आयोजित किया गया।
  • इस सम्मेलन में 193 देशों के 11000 प्रतिनिधियों ने हिस्सा लिया।
  • बाली सम्मेलन के दौरान ग्लोबल वार्मिग की मौजूदा स्थिति पर चिंता व्यक्त की गई तथा जलवायु परिवर्तन पर क्योटो संधि के स्थान पर नई संधि लागू करने की सहमति दी गई।
  • नई संधि के अंतर्गत ही वर्ष 2009 के अंत में डेनमार्क की राजधानी कोपेनहेगेन में एक दौर की वार्ता का प्रावधान किया गया।
  • आस्टेलिया के प्रधानमंत्री केविन रूड ने इस सम्मेलन को संबोधित किया।
  • बैठक में भारतीय शिष्टमण्डल का प्रतिनिधित्व केन्द्रीय विज्ञान मंत्री कपिल सिब्बल ने किया।
  • इस अवसर पर जारी रिपोर्ट ने कहा गया है कि सभी देशों द्वारा बदली परिस्थितियों का सामना करने के लिए कडे कदम उठाने आवश्यक है।
  • वैज्ञानिक मत के अनुसार वायुण्मण्डल में कार्बन डाईऑक्साइड की मात्रा तेजी से बढ़ती जा रही है।
  • अगर इस विषय पर गंभीरता से ध्यान नहीं दिया गया तो जीव-जंतुओं, वनस्पति एवं मानवीय संसाधन के अस्तित्व पर संकट आ सकता है।
  • अतः यह जरूरी है कि आने वाले तीन-चार वर्ष़ों में कार्बन डाई-ऑक्साइड के स्तर को कम किया जाये।
  • बाली सम्मेलन में I.P.C.C. की रिपोर्ट को भी शामिल किया गया। जिसमें यह कहा गया है कि वायुमण्डल में ग्रीन हाउस गैसों की मात्रा 450 PPM से अधिक नहीं होनी चाहिए।
  • सम्मेलन में प्रमुख औद्योगिक देशों से ग्रीन हाउस गैसों के उत्सर्जन में कमी लाने की अपील की गई।

बाली रोडमैप में यह किए गए लक्ष्य

  • तृतीय पृथ्वी सम्मेलन :- 2002 में (जोहान्सबर्ग, दक्षिण अफ्रीका)
  • बाली सम्मेलन :- 2007 (बाली :- इण्डोनेशिया का शहर)
  • कोपेनहेगन सम्मेलन :- 2009 (कोपेनहेगन :- डेनमार्क की राजधानी)
  • नगोया प्रोटोकॉल :- मई 2011
  • कानकून सम्मेलन :- 2010 (कानकून :- मैक्सिको का शहर)।
  • CDP-23 :- बाॅन (जर्मनी) में नवम्बर 2017 में आयोजित।
  • ग्लोबल वार्मिंग पर नियंत्रण के लिए ग्रीन हाउस उत्सर्जन पर कर लगाने वाला विश्व का प्रथम देश :- न्यूजीलैंड।
  • अम्लीय वर्षा (काली वर्षा की उपमा) वातावरण में सल्फर-डाई-ऑक्साइड तथा नाइट्रोजन-ऑक्साइड की अधिकता के कारण होती है।
  • वर्ष 2009 में कोपेनहेगन में होने वाली बैठक में क्योटो संधि के स्थान पर एक अन्य संधि का प्रावधान किया जाएगा जिस पर हस्ताक्षर करने वाले देशों को इसे मानने के लिए 2-3 वर्ष का समय दिया जायेगा।
  • विकासशील देशों से उत्सर्जन में कमी लाने के साथ-साथ वित्त एवं तकनीक संबंधी सहायता उपलब्ध किए जाने की अपील की गई।
  • बाली रोडमैप पर जारी प्रस्तावों की प्रगति के संदर्भ में वर्ष 2008 में चार बैठकों का आयोजन किया जायेगा।
  • प्राकृतिक संतुलन बनाए रखने की दिशा में जंगलों के क्षय पर विशेष कदम उठाने की योजना है।
  • ग्लोबल वार्मिंग की समस्या को देखते हुए इससे संबंधित सभी दुष्परिणामों एवं उपायो पर ध्यान दिया जायेगा।
  • कार्बन प्रदूषण को खत्म करने के लिये उच्चतम तकनीक के इस्तेमाल को प्राथमिकता दी जायेगी।
  • ग्रीन हाउस गैसों के उत्सर्जन की दर को 2050 तक वर्ष 2000 तक के स्तर पर लाने की बात कही गई है।
  • इस सम्मेलन के अंतर्गत UNFCC के विशेषज्ञों को स्वच्छ वातावरण हेतु विभिन्न योजनाओं पर अपनी रिपोर्ट पेश करने को कहा गया है।
  • अविकसित देशों को जलवायु समस्या से निपटने के लिए सहायता हेतु अनुकूलन फंड की देखरेख पर सहमति हुई है।
  • इसके अंतर्गत स्वच्छ वातावरण क्रियान्वयन वाली परियोजनाओं पर 2% का कर लगाया जाने का प्रावधान है।

कोपेनहेगन सम्मेलन

  • जलवायु परिवर्तन को लेकर अंतर्राष्ट्रीय सम्मेलन 6 से 18 दिसंबर, 2009 को डेनमार्क की राजधानी कोपेनहेगेन में आयोजित किया गया।
  • इस सम्मेलन का अध्यक्ष डेनमार्क था।
  • इस सम्मेलन में कोई बाध्यकारी समझौता नहीं हुआ।
  • इस सम्मेलन का वास्तविक परिणाम अमेरिका और बेसिक देशों- ब्राजील, दक्षिण अफ्रीका और चीन के बीच समझौता के रूप में सामने आया, परंतु जी-77 और गरीब देशों ने इसे स्वीकार नहीं किया।
  • इस सम्मेलन में लगभग 200 देशों के प्रतिनिधि शामिल हुए।
  • यहां उल्लेखनीय है कि डेनमार्क और अन्य कई देशों ने सम्मेलन के पूर्व ही कह दिए थे कि इसमें कोई कानूनी बाध्यता वाला निर्णय नहीं लिया जाएगा क्योंकि उन्हें मालूम था कि वे किसी बाध्यता का पालन नहीं कर सकते।
  • भारत और चीन इसके खिलाफ इसलिए थे क्योंकि विकसित देश कार्बन उत्सर्जन कम करने का बोझ उन्हीं के सर पर डालते।
  • जबकि अफ्रीकी देश तथा अन्य गरीब देश चाहते थे कि कोई कानूनी बाध्यता वाला समझौता हो जाए अन्यथा पर्यावरण में परिवर्तन का सबसे बड़ा दुष्परिणाम उन्हें भुगतना होगा और कार्बन घटाने के किसी समझौते में उन्हें फायदा ही होगा।
  • इस बैठक का लक्ष्य 2012 के बाद क्योटों प्रोटोकाल की अवधि समाप्त हो जायेगी।
  • कोपेनहेगन के बेलासेंटन में 192 देशों के शीर्ष नेताओं ने विश्व भर से आये लगभग 5000 प्रतिनिधियों के समक्ष सर्वसम्मति से पारित समझौते पर एक मत से हस्ताक्षर किए।
  • इस सम्मेलन में भारत चीन अमेरिका और यूरोपीय संघ सहित सभी प्रमुख देशों ने समझौते के मसौदे को सर्वमान्य बनाने का प्रयास किया किन्तु अंतिम क्षणों में विकसित देश एवं विकासशील देशों की गुटबंदी प्रत्यक्ष रूप से उभर कर सामने आ गयी।
  • अंततः सम्मेलन में अफ्रीका, भारत, चीन ब्राजील जैसे प्रमुख देशों के प्रस्तावों को शामिल करते हुए एक गैर-बाध्यकारी समझोते पर हस्ताक्षर संभव हो सका।
  • इस समझौते के बाद प्रतिक्रिया व्यक्त करते हुए भारत के प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने कहा कि जलवायु परिवर्तन के संकट से निपटने के लिए भविष्य में कोई वार्ता समान तौर पर भार वहन करने के समान सिद्धांत पर आधारित होगी जैसा कि क्योटो प्रोटोकाल एवं बाली वार्ता में पहले से तय किया जा चुका है।
  • यद्यपि पर्यावरणवादियों को इस सम्मेलन से निराशा ही हाथ लगी और उन्होंने जलवायु परिवर्तन मुद्दे पर अमेरिका, चीन, भारत, ब्राजील एवं दक्षिण अफ्रीका के बीच हुए अबाध्यकारी समझौता को अस्वीकार कर दिया अतः इस सम्मेलन का अंत एक प्रकार के नाकामी में हुआ, जिसकी आशंका थी।
  • उपरोक्त अबाध्यकारी समझौते का तात्कालिक लक्ष्य है- धरती का औसत तापमान पूर्व औद्योगिक युग की तुलना में 2 डिग्री सेंटीग्रेड से उपर नहीं जाने देना।
  • इसमें यद्यपि उत्सर्जन घटाने की किसी विस्तृत समय-सारणी की व्यवस्था नहीं है, परंतु कुछ तो हासिल हुआ ही।
  • उपरोक्त समझौते में विश्व के तापमान में 2 डिग्री सेंटीग्रेड से अधिक नहीं बढ़ने देने के लिए सभी देशों से कार्बन उत्सर्जन में स्वैच्छिक कटौती करने की बात कही गई है। इसकी अन्य विशेषताएं निम्न हैं-
  • उनकी स्वैच्छिक कटौती पर अंतर्राष्ट्रीय व्यवस्था भी की गई है।
  • समझौता के अंतर्गत गरीब देशों को नियमित आर्थिक सहयता देने पर भी सहमति व्यक्त की गई है ताकि वे अपने यहां पेड़ों की कटाई पर रोक लगा सकें। साथ ही ऐसी तकनीकें अपनाने की ओर भी बढ़े जिनसे कार्बन कटौती को बढ़ावा मिले।
  • विकसित देश विकासशील देशों को आर्थिक एवं तकनीकी संसाधन उपलब्ध करवाएंगे।
  • वर्ष 2015 तक इस समझौते के कार्यान्वयन की समीक्षा की जाएगी।
  • विश्व पर्यावरण दिवस :- 5 जून
  • 2019 का विषय (थीम) :- “वायु प्रदूषण”
  • संयुक्त राष्ट्र जलवायु परिवर्तन सम्मेलन (COP-21) का आयोजन पेरिस, (फ्रांस) में 30 नवम्बर से 12 दिसम्बर, 2015 के मध्य हुआ। COP-21 में सम्पन्न पेरिस समझौते में 21वीं सदी के अंत तक वैश्विक औसत तापमान को औद्योगिकीकरण के पूर्व के समय के तापमान स्तर से 2°C से अधिक नहीं होने देने का लक्ष्य रखा गया है। 02 अक्टूबर, 2016 को भारत ने पेरिस समझौते का अनुसमर्थन किया। अमेरिका हाल ही में पेरिस जलवायु समझौते से बाहर निकल गया है।
  • अन्तर्राष्ट्रीय सौर गठबन्धन :- COP-21 के दौरान भारत एवं फ्रांस की पहल पर ISA के गठन की घोषणा की गई। ISA में कर्क एवं मकर रेखा के मध्य स्थित देश सदस्य हैं। ISA का मुख्यालय गुड़गाँव (हरियाणा) में है। सदस्य देश :- 121
  • भारत ने 2022 तक 175 गीगावाट अक्षय ऊर्जा उत्पादन का लक्ष्य रखा है। 175 गीगावाट में 100 गीगावाट सौर ऊर्जा से तथा 60 गीगावाट पवन ऊर्जा से उत्पादन का लक्ष्य रखा है।
  • ओजोन परत समताप मंडल में स्थित है जो हानिकारक पैराबैंगनी किरणों को धरातल पर आने से रोकती है।
  • ध्वनि का मापन :- डेसीबल में। (वार्तालाप ध्वनि :- 60 डेसीबल
  • वायु प्रदूषण का सर्वाधिक प्रभाव मानव श्वसन तंत्र पर पड़ता हैं।
  • चम्बल नदी सर्वाधिक प्रदूषित कोटा जिले में है।रामसर सम्मेलन :- 1971 में रामसर (ईरान) में आर्द्रभूमि संरक्षण हेतु आयोजित सम्मेलन।
  • भारत की भूमिका : इस सम्मेलन में वन व पर्यावरण मंत्री श्री जयराम रमेश तथा प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह, दोनों ने भाग लिए।
  • भारत ने कार्बन उत्सर्जन के लिए विकसित देशों को जिम्मेवार मानते हुए उन्हें उत्सर्जन में ज्यादा कटौती करने तथा विकासशील देशों को आर्थिक एवं तकनीकी सहायता उपलब्ध कराने की मांग की।
  • इस सम्मेलन में विकसित देशों के जलवायु परिवर्तन पर प्रबल विरोध करते हुए भी भारत और उसके साथ चीन, ब्राजील और दक्षिण अफ्रीका वाले गुट ‘बेसिक’ ले विकसित देशों के प्रस्ताव को नकारते हुए भी अन्ततः स्वीकार कर लिया।
  • इसके पीछे अमेरिकी शक्ति का प्रभाव संभवतः था।
  • इसमें एक महत्वपूर्ण बात यह देखने में आया कि भारत अपनी नई जरूरतों तथा वैश्विक परिवर्तनों के मद्देनजर विकासशील देशों से धीरे-धीरे अलग हो रहा है, साथ ही विकास की दौड़ और बाजार की होड़ में भारत के लक्ष्य भी विकासशील देशों से अलग हटकर कुछ धनी और शक्तिशाली देशों की और केंद्रित हो रहे हैं।
  • परंतु इस संबंध में भारत को अत्यंत सावधानी पूर्वक कदम उठाने की आवश्यकता है क्योंकि अभी तक यही देखने में आया है कि विकसित देश केवल अपना स्वार्थ ही देखते हैं।
  • परंतु वास्तविकता यही है कि जलवायु परिवर्तन के मुद्दे पर भारत और चीन उन जी-77 देशों से छिटक कर अलग हो गए हैं जिनके साथ अपने साझा हितों की लड़ाई वे पिछले कुछ वर्ष़ों से लड़ रहे थे।
  • अफ्रीकी देशों की ओर से इस पर भावुकतापूर्ण एवं कटु प्रतिक्रियाएं आई जो ‘बेसिक देशों’ के नजरिए से आहत महसूस कर रहे हैं।
  • उनका कहना है कि तापमान में दो डिग्री तक की वृद्धि को स्वीकार्य करनकर उनके साथ अन्याय किया गया है, इतनी वृद्धि से उन देशों पर कई तरह की प्राकृतिक आपदाएं टूट पड़ेंगी।
  • इसके अतिरिक्त अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर बाध्यकारी समझौता करने की दिशा में कोई कदम नहीं उठाए गए।
  • विवाद के मुद्दे : वर्तमान में उत्सर्जित कार्बन, वातावरण में बढ़ती कार्बन डाई ऑक्साइड की मात्रा के लिए प्रमुख रूप से जिम्मेवार नहीं है।
  • क्योंकि कार्बन डाई ऑक्साइड एक बार उत्सर्जित होने के बाद वायुमंडल में लगभग 100 वर्ष़ों तक बने रहते हैं।
  • अतः वायुमंडल में विस्तृत 70 प्रतिशत कार्बन डाईऑक्साइड गैसों के लिए भूतकाल में विकसित देशों के उत्सर्जन ही प्रमुख रूप से जिम्मेदार हैं और यही विवाद की मुख्य वजह भी है।
  • विकासशील देशों का कहना है कि विकसित देशों की गलतियों के लिए उन्हें सजा न दी जाए।
  • इसमें द्वितीय विवाद यह है कि कार्बन उत्सर्जन की कुल मात्रा के माप से परिस्थितियों का सही विवरण उपलब्ध नहीं होता है।
  • अतः विकासशील देशों की मांग है कि इनकी जगह प्रति व्यक्ति उत्सर्जन की माप के आधार पर विकसित देश उत्सर्जन के आंकड़ों को प्रस्तुत करें क्योंकि यह माप ज्यादा सटीक है।
  • यदि इस मानकता के आधार पर देखा जाए तो अमेरिका का प्रति व्यक्ति वार्षिक कार्बन उत्सर्जन 20 टन है, जबकि भारत का मात्र 0.8 टन है।
  • अतः इस दृष्टिकोण से अमेरिका को अपने कार्बन उत्सर्जन में भारत जैसे देशों के मुकाबले ज्यादा कटौती करनी होगी। परंतु विकसित देश इसके लिए तैयार नहीं हैं।
  • पाली जिले में जल प्रदूषण के लिए उत्तरदायी उद्योग :- रंगाई-छपाई उद्योग।
  • राजस्थान राज्य पर्यावरणीय नीति :- 2010
  • वर्तमान में राज्य में 249 ब्लॉक में से 198 ब्लॉक डार्क जोन में हैं।
  • जैव विविधता संधि :- 1992 विश्व जैव विविधता दिवस :- 22 मई।
  • राष्ट्रीय हरित न्यायाधिकरण :- 2 जून, 2010 को स्थापित। (मुख्यालय :- भोपाल)
  • राजस्थान जैवविविधता अधिनियम :- 2 मार्च, 2010
  • राजस्थान राज्य जैव विविधता बोर्ड :- 14 सितम्बर, 2010
  • राजस्थान के जैव-विविधता विरासत स्थल :- 1. आकलवुड फॉसिल पार्क (जैसलमेर), 2. केवड़ा की नाल (उदयपुर), 3. रामकुण्डा (उदयपुर), 4. नागपहाड़ (अजमेर), 5. छापोली माता (झुंझुनूं)

अन्य महत्वपूर्ण तथ्य

  • राजस्थान के 2 स्थल (केवलादेव राष्ट्रीय उद्यान (1981) व सांभर झील (1990))
  • रामसर स्थलों में शामिल।
  • विश्व आर्द्रभूमि संरक्षण दिवस :- 2 फरवरी।
  • विश्व वन्यजीव कोष (WWF) :- 1961 में स्थापना। IUCN की जुड़वाँ संस्था। प्राकृतिक संसाधनों के संरक्षण में संलग्न। यह अन्तर्राष्ट्रीय गैर सरकारी संगठन है। प्रतीक :- लाल पाण्डा। यह लिविंग प्लेनेट रिपोर्ट जारी करता है।
  • मैन एंड बायोस्फीयर प्रोग्राम (MAB) :- 1970 में प्रारम्भ। (यूनेस्को द्वारा प्रारम्भ)।
  • राजस्थान का जैव विविधता पार्क :- गमधर क्षेत्र (उदयपुर)
  • राष्ट्रीय बायोफ्यूल नीति 2018 लागू करने वाला पहला राज्य राजस्थान है।
  • राजस्थान के वन एवं पर्यावरण राज्यमंत्री (स्वतंत्र प्रभार) :- सुखराम विश्नोई।
  • दादू पर्यावरण संस्थान :- टोंक।
  • संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण कार्यक्रम :- 1972 में स्थापना।
  • मुख्यालय :- नैरोबी (केन्या)।
  • प्रथम विश्व जलवायु सम्मेलन :- 1979 में जेनेवा में सम्पन्न।
  • मांट्रियल प्रोटोकॉल :- सितम्बर 1987 (ओजोन परत संरक्षण हेतु)।
  • UNFCCC नामक अन्तर्राष्ट्रीय पर्यावरण सन्धि 1992 में की गई।
  • क्योटो प्रोटोकॉल :- 1997 (ग्लोबल वार्मिंग को रोकने हेतु)
  • ओजोन परत (पृथ्वी की छतरी की उपमा) की मोटाई ध्रुवों पर सामान्यत: कम होती है।
  • ओजाेन परत की मोटाई को डॉब्सन इकाई में नापा जाता है।
  • विश्व ओजोन दिवस :- 16 सितम्बर।
  • ब्लू बेबी सिन्ड्रोम :- नाइट्रेट की अधिकता के कारण।
  • मिनीमाता रोग :- पारे की अधिकता के कारण।
  • संयुक्त राष्ट्र मरुस्थली रोकथाम सम्मेलन :- 1994
  • राजस्थान में प्रदूषण नियंत्रण का कार्य राजस्थान प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड द्वारा किया जाता है।
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