मध्यकालीन राजस्थान का राजस्व प्रशासन

मध्यकाल में कृषि से प्राप्त राजस्व ही राज्य की आर्थिक प्रगति का आधार था। भूमि पर राजा का अधिकार होता था। वह किसी को भूमि देने अथवा जब्त करने के मामले में स्वतंत्र था।

राजस्थान में भूमि के स्वामित्व के आधार

खालसा

  • यह भूमि सीधे राज्य के अधीन होती थी। इस भूमि पर लगान निर्धारित करने, वसूल करने या लगान में छूट देने का कार्य राज्य के अधिकारी करते थे।

जागीर

  • यह भूमि सैनिक सेवाओं या अन्य राजकीय सेवाओं के बदले में सामंतों या अधिकारियों को दी जाती थी। इस भूमि को बेचना या बदलना राज्य की अनुमति से ही संभव था। 

भोम

  • इस भूमि पर लगान नहीं देना पड़ता था। लेकिन आवश्यकता पड़ने पर भोमियों से राजकीय सहायता के लिए सेवाएँ ली जाती थी।

सासन

यह भूमि पुण्य के लिए दी जाती थी।

भूमि का वर्गीकरण

  1. खालसा भूमि
    • यह भूमि सीधे राज्य द्वारा नियंत्रित होती थी।
    • इस भूमि पर लगान निर्धारण तथा वसूल करने का कार्य राज्य के अधिकारियों द्वारा किया जाता था।
  2. जागीर भूमि
    • यह भूमि किसी सामंत या अधिकारी को उनके द्वारा राज्य को दी जाने वाली सेवाओं के बदले में दी जाती थी।
    • इस भूमि को सामंत की मृत्यु हाेने पर खालसा में सम्मिलित कर लिया जाता था। इसे चार भागों में बांटा गया था- सामंत, हुकुमत, भोम तथा सासण
  3. इजारा भूमि
    • इस भूमि पर कर वसूल करने के लिए ‘ठेका’ या ‘आंकबंदी’ प्रथा चलती थी।
    • इसके अन्तर्गत एक निश्चित क्षेत्र से कर वसूल करने का अधिकार उच्चतम राजस्व की बोली लगाने वाले को एक निश्चित अवधि के लिए दिया जाता था।
    • बीकानेर रियासत में इस प्रणाली को मुकाता के नाम से जाना जाता था।
  4. मुश्तरका
    • ऐसी भूमि जिसकी आय राज्य तथा सामंत में विभाजित होती थी।
  5. ग्रासिये
    • वे सामंत जो सैनिक सेवा के बदले में शासक द्वारा दी गई भूमि की उपज का उपयोग करते थे। भूमि की यह उपज ग्रास कहलाती थी।
  6. भौमिये
    • ऐसे राजपूत जिन्होंने राज्य की रक्षा या राजकीय सेवाओं के लिए अपना बलिदान दिया था। उन्हें यह भूमि दी जाती थी तथा इस भूमि से कर भी नाममात्र का देना होता था।
    • इनको भूमि से बेदखल नहीं किया जा सकता था।
  7. तनखा भूमि
    • यह जागीर उन सामंतों को दी जाती थी जो निश्चित सैनिकों के साथ सैनिक सेवा करने का अनुबंध करते थे।
  8. भोम भूमि
    • छोटे भूमि के टुकड़े जो नाममात्र के कर पर दिये जाते थे भोम कहलाते थे।
    • यह भूमि राज्य की सेवा करने या प्राप्तकर्ता के पूर्वजों द्वारा राज्य के लिए दी गई सेवाओं के लिए दी जाती थी।
  9. इनाम भूमि
    • यह भूमि राज्य सेवा के बदले में दी जाती थी तथा यह लगान से मुक्त भूमि होती थी। जिसे यह भूमि प्राप्त होती थी वह इसे बेच नहीं सकता था।
  10. अलूफाती भूमि
    • राजपरिवार की महिलाओं को उनके जीवन काल में खर्च के लिए दी जाती थी।
  11. सासण भूमि
    • ब्राह्मण तथा चारणों को अनुदान के रूप मे दी जाने वाली जागीर।
  12. पसातिया
    • यह भूमि राज्य को सेवाएं प्रदान करने वाले व्यक्ति को दी जाती थी।
    • व्यक्ति की राज्य सेवा समाप्त होने पर इस भूमि को पुन: राज्य के अधिकार में ले लिया जाता था। इस भूमि से कर नहीं लिया जाता था।
  13. डोली
    • यह सामंतों द्वारा पुण्यार्थ दी जाने वाली भूमि थी। यह भूमि कर से मुक्त होती थी।
  14. डूमबा
    • इसके अन्तर्गत गाँव प्रदान कर लोगों को बसाया जाता था तथा भूमि को कृषि योग्य बनाकर कृषि कार्य किया जाता था। इस भूमि के मालिक को निश्चित रूप से कर देना होता था।

उपजाऊपन के आधार पर भूमि

  1. बीड़ भूमि – किसी नदी के समीप का भूमि क्षेत्र।
  2. डीमडूकुएं के पास की भूमि।
  3. गोरमोगाँव के पास वाली भूमि।
  4. माल भूमिकाली उपजाऊ भूमि।
  5. पीवल भूमिकुओं तथा तालाबों द्वारा सिंचित।
  6. बारानी भूमित – जिस भूमि पर सिंचाई सुविधा उपलब्ध नहीं हो।
  7. चाही भूमि कुओं, नहरों, नदियों तथा तालाबों से सिंचित भूमि।
  8. तलाई भूमितालाब के पेटे की भूमि जहां बिना सिंचाई फसल पैदा हो।
  9. हकत-बकत जोती जाने वाली भूमि ।
  10. गलत हॉसपानी से भरी भूमि।
  11. चरणोत भूमि – यह भूमि गाँव के सभी पशुओं के लिए सार्वजनिक रूप से चरने के लिए छोड़ी जाती थी। ऐसी भूमि पर ग्राम पंचायत का नियंत्रण होता था।
  12. बंजर भूमि – ऐसी भूमि जिस पर कभी खेती नहीं की जाती थी। इस भूमि का उपयोग नि:शुल्क रूप से गाँव वालों द्वारा किया जाता था।

लगान निर्धारण की प्रणालियाँ

  • बंटाई प्रथा – इस प्रथा के अन्तर्गत राज्य तथा किसान के बीच उपज का एक निश्चित अनुपात में बंटवारा किया जाता था। इसमें उपज का लगभग एक तिहाई भाग पर राज्य का अधिकार होता था। इसे गला बख्शी भी कहा जाता था। इस प्रणाली में राजस्व का निर्धारण तीन प्रकार से होता था।
  • खेत बंटाई – इसमें फसल तैयार होते ही खेत बांट लिया जाता था।
  • लंक बंटाई – फसल काटने के बाद बंटवारा होता था।
  • रास बंटाई – अनाज तैयार होने के बाद बंटवारा होता था।
  • लाटा – इस प्रणाली के अन्तर्गत जब फसल तैयार हो जाती थी तथा खेत में इसे साफ कर लिया जाता था तब राज्य का हिस्सा सुनिश्चित किया जाता था। भू-राजस्व वसूल करने की इस प्रणाली को बंटाई भी कहते थे।
  • कूंता इस प्रणाली के अन्तर्गत खेत में खड़ी फसल या उपज के ढेर से अनुमान लगाकर राज्य का हिस्सा निर्धारित किया जाता था।
  • बीघोड़ी – प्रति बीघा भूमि की उर्वरा एवं पैदावार के आधार पर लगान निश्चित करना।
  • जब्ती – प्रति बीघा की दर से नकदी फसलों के लिए लगान निश्चित करना।
  • मुकाता – राज्य द्वारा प्रत्येक खेत की फसल के लिए एकमुश्त लगान निर्धारित करना।
  • डोरी – डोरी से नापे गए बीघे का हिस्सा निर्धारित कर मालगुजारी वसूल करना।
  • घूघरी – खेत की पैदावार की मात्रा निश्चित कर राजस्व वसूल करना।
  • हल प्रणाली – इस प्रणाली के तहत एक हल से जोती गई भूमि पर कर निर्धारित किया जाता था। एक हल से 15 से 30 बीघा भूमि जोती जा सकती थी। इस प्रणाली के आधार पर अलग-अलग क्षेत्रों में राजस्व की दर अलग-अलग थी।
  • नकदी या भेज – इस प्रणाली के तहत नकद के रूप में राजस्व वसूल किया जाता था। पूर्वी राजस्थान में इस प्रणाली को ‘भेज’ कहा जाता था।
  • भींत की भाछ – इस प्रणाली का उपयोग बीकानेर रियासत में किया जाता था। इसके तहत गाँव में घरों की संख्या के आधार पर कर निर्धारित किया जाता था।

सिंचाई के यंत्र 

  • कुओं तथा तालाबों से पानी प्राप्त करने के लिए रहँट, पावटी, ढीकळी, ईडोणी तथा कुतुम्बा का उपयोग किया जाता था।  
  • कुओं तथा तालाबों आदि से सिंचाई करने के लिए चड़स का प्रयोग किया जाता है। कुएं पर लगे लकड़ी के तुला यंत्र को ढीकळी कहा जाता था।

भू-राजस्व प्रशासन

  • दीवान :- दीवान का मुख्य रूप से राजस्व संबंधी मामलों पर नियंत्रण रहता था। दीवान का राजस्व संबंधी कार्य राज्य की आय में वृद्धि करना तथा विभिन्न खर्चों की पूर्ति करना था। इसके विभाग में कई उप विभाग होते थे जैसे – दीवान-ए-खालसा, दीवान-ए-जागीर आदि।
  • आमिल :- आमिल परगने का महत्त्वपूर्ण अधिकारी होता था जिसका मुख्य कार्य परगने में राजस्व की वसूली करना था। अमीन, कानूनगो, पटवारी आदि राजस्व वसूली में आमिल की सहायता करते थे। आमिल को राजस्व से संबंधित अनेक कागजात अपने पास रखने होते थे।
  • हाकिम :- यह परगने का अधिकारी होता था जो शांति व्यवस्था तथा न्याय के साथ-साथ भू-राजस्व संबंधी कार्य भी करता था। हाकिम को कोटा में हवालगिर तथा जयपुर में फौजदार कहा जाता था।
  • साहणे :- यह अधिकारी भू-राजस्व में राज्य का भाग निश्चित करता था।    
  • तफेदार :- यह गाँव में राज्य द्वारा वसूल किये जाने वाले राजस्व का हिसाब रखता था।
  • सायर दरोगा :- यह अधिकारी परगने में चुंगीकर वसूल करता था।
  • याददाश्त :- इस पट्टे में राजा द्वारा जागीरदार को जागीर प्रदान करने की स्वीकृति अंकित की जाती थी।
  • सायर :- जयपुर रियासत में आयात-निर्यात, सीमा शुल्क तथा चुंगीकर को सामूहिक रूप से सायर कहा जाता था।
  • छटूंद :- मेवाड़ में जागीरदार अपनी आय का 1/6 भाग शासक को देता था जिसे छटूंद कहा जाता था।
  • अड़सट्टा :- यह जयपुर रियासत का भूमि संबंधी रिकार्ड है। उपज का भाग जो परगने में ही व्यापारियों को बेच दिया जाता था बिचोती कहलाता था।
  • चौधरियों को दी जाने वाली भूमि नानकार, पटवारी को दी गई भूमि विरसा तथा पटेल को दी जाने वाली भूमि विसोद कहलाती थी। यह भूमि इन्हें अलग-अलग भूमि से राजस्व भार निकालने में सहायता करने के लिए दी जाती थी।

मध्यकालीन कृषक वर्ग

  • बापीदार – खालसा क्षेत्र में स्थायी भू-स्वामित्व वाले किसानों को बापीदार कहा जाता था। ऐसे किसान भूमि को जोतने के लिए स्वतंत्र थे। खेत की लकड़ी व घास पर इनका अधिकार माना जाता था। इन्हें पीढ़ी दर पीढ़ी स्थायी भू-स्वामित्व के अधिकार प्राप्त थे।
  • रैयती – ऐसे किसान जिन्हें स्थायी भू-स्वामित्व प्राप्त नहीं था, उन्हें रैयती कहा जाता था। इस व्यवस्था के अन्तर्गत किसानों को फसल वर्ष के प्रारंभ में पट्‌टे दिये जाते थे तथा फसल वर्ष की समाप्ति पर उनका भूमि पर स्वामित्व समाप्त हो जाता था। नये फसल वर्ष में नए पट्‌टे दिये जाते थे तथा नये वर्ष में किसानों को पिछले वर्ष का खेत प्राप्त हो, यह आवश्यक नहीं था।
  • पाहीकाश्त – ऐसे किसान जिनके पास अपने गाँव में भूमि नहीं थी तथा वे किसी दूसरे गाँव में जाकर कृषि भूमि प्राप्त करते थे, ऐसे किसानों को पाहीकाश्तकार कहा जाता था।
  • रियायती – गाँव के ऐसे विशेष किसान जिन्हें विशेषाधिकार प्राप्त होते थे।
  • गेवती – गाँव में स्थायी रूप से निवास करने वाले किसान को गेवती कहा जाता था।

प्रमुख लाग-बाग एवं कर

भू-राजस्व के अलावा लोगों से अन्य कई प्रकार के कर वसूल किये जाते थे जिन्हें लागबाग कहा जाता था। नियमित लाग में कर की राशि निश्चित होती थी तथा यह दो या तीन वर्ष में दिया जाता था। अनियमित लाग में कर की राशि निश्चित नहीं थी। इसके निर्धारण में कोई निश्चित आधार नहीं था।

  • दस्तूर- भू-राजस्व के कर्मचारियाें द्वारा किसानों से कर के अलावा जो अवैध राशि वसूल की जाती थी उसे दस्तूर कहा जाता था।
  • न्यौता-लाग – सामंतों द्वारा अपने पुत्र-पुित्रयों के विवाह के अवसर पर लिया जाने वाला कर।
  • चंवरीलाग – सामंतों द्वारा किसानों की पुत्री के विवाह के अवसर पर लिया जाने वाला कर।
  • खिचड़ी लाग – जागीरदार द्वारा अपनी जागीर का दौरा करने के समय किसानों से लिया जाने वाला कर।
  • बाईजी लाग – जागीरदार के लड़की पैदा होने पर किसानों से लिया जाने वाला कर।
  • सिगोंटी – पशुओं के विक्रय के समय लिया जाने वाला कर।
  • जाजम लाग – भूमि के विक्रय पर लिया जाने वाला कर।
  • कुंवरजी का घोड़ा – कुंवर के बड़े होने पर उन्हें घोड़े की सवारी सिखाई जाती थी इसलिए घोड़ा खरीदने के लिए प्रत्येक घर से यह कर लिया जाता था।
  • चूड़ालाग – ठकुराइन द्वारा नया चूड़ा पहनने पर लिया जाने वाला कर।
  • लेवी – शासक द्वारा किसानों से की जाने वाली अनाज वसूली।
  • हलमा – हल जोतने वालों से ली जाने वाली बेगार।
  • मलवा – सामंत द्वारा नौकरों आदि पर खर्च करने हेतु वसूल किया जाने वाला कर।
  • कुंवरजी का कलेवा – सामंतों के पुत्रों के जेब खर्च हेतु कर।
  • अखराई – राजकोष में जमा होने वाली रािश पर दी जाने वाली रसीद हेतु कर।
  • कमठा लाग – दुर्ग के निर्माण या मरम्मत हेतु लिया जाने वाला कर।   
  • डाण – सामान के एक राज्य से दूसरे राज्य में ले जाने पर लगने वाला कर।   
  • बंदोली री लाग – जागीरदार के घर पर विवाह होने पर गाँव वालों से लिया जाने वाला कर।
  • लांचौ – खर्च की पूर्ति हेतु लिया जाने वाला कर।   
  • नूता – जागीरदार के यहां विवाह या शोक के समय लिया जाने वाला कर।
  • कारज खर्च – जागीरदार के किसी संबंधी की मृत्यु पर खर्च हेतु लिया जाने वाला कर।
  • कागली या नाता – विधवा के पुनर्विवाह के समय लिया जाने वाला कर।
  • अघोड़ी – चमड़े का कार्य करने वाले से लिया जाने वाला कर।
  • फरोसी – लड़के या लड़की के विक्रय मुल्य का चौथाई भाग।
  • घरेची – किसी स्त्री को विधिवत विवाह के बिना रखने पर।
  • त्योहारी – प्रमुख त्योहार होली-दीपावली पर लिया जाने वाला कर।

कर व्यवस्था

  • भू-राजस्व दर ऐसे किसान जो भूमि को अपनी समझते थे तथा कई वंशों से उस भूमि पर उनका अधिकार था, उनसे वसूल किया जाने वाला राजस्व ‘उद्रंग’ कहलाता था।
  • ऐसी भूमि जिस पर अलग-अलग वर्षों में अलग-अलग किसान खेती करते थे, इस प्रकार की भूमि से राज्य भाग’ के रूप में कर लेता था। यह ‘उद्रंग’ से ज्यादा होता था।
  • उद्रंग तथा भाग उपज के रूप में लिये जाते थे। जब राज्य कर का हिस्सा मुद्रा के रूप में कृषकों से वसूल करता था तो उसे ‘हिरण्यक’ कहा जाता था।
  • राहदारी, बाब, जकात, पेशकश, गमीन बराड़ आदि कर मुगलों से सम्पर्क के बाद राजपूताना में प्रारंभ हुए।
  • राजपूताना में परम्परागत रूप से भू-राजस्व की दर 1/7 या 1/8 थी।
  • इसके अलावा भी किसानों पर अनेक प्रकार के करों का बोझ होने के कारण उनके पास उपज का 2/5 भाग ही रह पाता था।
  • सायरा जिहात कर वस्तुओं को बाजार में बेचने के लिए ले जाने पर चुंगी, वस्तुओं के विक्रय पर कर आदि लिए जाते थे।
  • अलग-अलग व्यवसायों पर फरौही नामक कर लिया जाता था। विभिन्न त्योहारों पर अलग-अलग कर देने होते थे इन सब करों को ‘सायरा जिहात कर’ कहा जाता था।
  • धर्मशास्त्र के विरूद्ध लिये जाने वाले कर आबवाब कहलाते थे।
Spread the love

Leave a Comment

Your email address will not be published.

error: Content is protected !!