राजस्थान के प्रजामण्डल

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राजस्थान के प्रजामण्डल

  • 1927 ई. में अखिल भारतीय देशी राज्य लोक परिषद् की स्थापना के साथ ही सक्रिय राजनीति का काल आरम्भ हुआ।
  • कांग्रेस का समर्थन मिल जाने के बाद इसकी शाखायें स्थापित की जाने लगी।
  • 1931 ई. में रामनारायण चौधरी ने अजमेर में देशी राज्य लोक परिषद् का प्रथम प्रान्तीय अधिवेशन आयोजित किया।
  • 1938 ई. में कांग्रेस के हरिपुरा अधिवेशन में कांग्रेस ने एक प्रस्ताव पारित कर देशी रियासतों के लोगों द्वारा चलाये जाने वाले स्वतंत्रता संग्राम को नैतिक समर्थन दिया।
  • कांग्रेस के इस प्रस्ताव से देशी रियासतों में चल रहे स्वतंत्रता संग्राम को नैतिक समर्थन मिला। इन राज्यों में चल रहें आन्दोलन प्रत्यक्ष रूप से कांग्रेस से जुड़ गये और राजनीतिक चेतना का विस्तार हुआ। प्रजामंण्डल की स्थापना हुई, जिसने देशी शासकों के अधीन उत्तरदायी प्रशासन की मांग की।

जोधपुर में प्रजामण्डल

  • राजनीतिक गतिविधियाँ 1918 ई. में ही आरंभ हो गई थी जब चाँदमल सुराणा ने मारवाड़ हितकारिणी सभा की स्थापना की।
  • 1920 ई. में जय नारायण व्यास ने मारवाड़ सेवा संघ स्थापित किया।
  • 1923 ई. में मारवाड़ हितकारिणी सभा को पुनर्जीवित करने का प्रयास किया।
  • अक्टूबर, 1929 ई. में व्यासजी ने मारवाड़ राज्य लोक परिषद् की स्थापना की।
  • मारवाड़ नरेश उम्मेदसिंह के प्रधानमंत्री सुखदेव प्रसाद काक ने अवसरवादी लोगों को उकसा कर ‘राजभक्त देश हितकारिणी सभा‘ गठित की।
  • 1931 में मारवाड़ यूथ लीग स्थापित।
  • 1934 ई. में जोधपुर में प्रजामण्डल की स्थापना हुई जिसके अध्यक्ष भंवरलाल सर्राफ थे। इसका उद्देश्य उत्तरदायी शासन स्थापित करना व नागरिक अधिकारों की रक्षा करना था।
  • 1936 ई. में इस संस्था को असंवैधानिक घोषित कर दिया गया।
  • 1938 में मारवाड़ लोक परिषद् का गठन। रणछोड़दास गट्टानी इसके अध्यक्ष व अभयमल जैन महासचिव थे।
  • जनवरी 1938 में सुभाष चन्द्र बोस ने जोधपुर के लोगों को स्वतंत्रता प्राप्ति व त्याग व समर्पण के लिए प्रेरित किया।
  • जोधपुर प्रजामंण्डल को असंवैधानिक घोषित किये जाने के बाद से लोक परिषद् में संवैधानिक अधिकारों व उत्तरदायी शासन के लिये संघर्ष जारी रखा।
  • मार्च, 1940 ई. में परिषद् को गैर कानूनी संस्था घोषित कर दिये जाने के बाद सदस्यों ने शांतिपूर्ण प्रदर्शनों पर ध्यान केन्द्रित किया। इसके मुख्य नेता जैसे रणछोड़ दास गट्टानी, मथुरादास माथुर, कन्हैया लाल, इन्द्रमल जैन आनंदराज सुराणा, भंवरलाल सर्राफ आदि ने अपना सारा ध्यान परिषद् की विचारधारा लोकप्रिय बनाने में लगाया।
  • 28 मार्च 1942 ई. में लोक परिषद् ने अत्याचारों के विरूद्ध व राज्य में उत्तरदायी शासन के लिये आन्दोलन आरम्भ किया। व्यास जी ने परिषद् का विधान स्थगित करके स्वयं को प्रथम डिक्टेटर नियुक्त किया और जोधपुर में भारत छोड़ो आन्दोलन संचालित किया। 28 मार्च, 1942 को लोक परिषद् द्वारा मारवाड़ में उत्तरदायी दिवस मनाने की घोषणा।
  • 19 जुन 1942 में प्रमुख नेताओं की गिरफ्तारियाँ व भूख हड़ताल हुई जिसमें बाल मुकुन्द बिस्सा की मृत्यु हो गई।
  • 1946 ई. के नौवें अधिवेशन में परिषद् ने में महाराजा को संवैधानिक अध्यक्ष के रूप में कार्य करने को कहा व पूर्ण उत्तरदायी सरकार की स्थापना की मांग की। महाराजा ने अपने जागीरदारों को इस आन्दोलन को रोकने की सलाह दी जिसकी परिणति 13 मार्च, 1947 ई. को डाबरा कांड में हुई, जिसमें डीडवाना के जागीरदारों ने कार्यकर्त्ताओं पर अमानवीय अत्याचार किये।
  • नये महाराजा हनुवंत सिंह द्वारा सत्ता ग्रहण के बाद भी पूर्व निर्धारित नीति जारी रही।
  • अक्टूबर, 1947 ई. में नवनिर्मित मंत्रिमण्डल जागीरदार व महाराजा के रिश्तेदारों से भरा था।
  • 14 नवम्बर, 1947 ई. को परिषद् ने हनवन्त सिंह के विरोध में विधानसभा विरोध दिवस मनाया।
  • 1948 ई. में विलय पत्र पर हस्ताक्षर के बाद ही उत्तरदायी सरकार का गठन हो पाया।

बीकानेर में प्रजामण्डल

  • बीकानेर के महाराजा गंगासिंह प्रतिक्रियावादी व निरंकुश शासक थे।
  • गंगासिह (1880-1943) प्रथम भरतपुर के बाद शांति समझौते पर हस्ताक्षर करने वाले एकमात्र भारतीय प्रतिनिधि व 1921 में स्थापित नरेन्द्र मण्डल के संस्थापकों में से एक थे।
  • बीकानेर क्षेत्र के प्रारंभिक नेता कन्हैयालाल ढूँढ़स्वामी गोपालदास थे, इन्होंने 1907 में चूरू में सर्वहितकारिणी सभा स्थापित की।
  • सर्वहितकारिणी सभा ने चूरू में लड़कियों की शिक्षा हेतु ‘पुत्री पाठशाला‘अनुसूचित जातियों की शिक्षा के लिए ‘कबीर पाठशाला‘ स्थापित की गई। महाराजा इस रचनात्मक कार्य के प्रति भी आशंकित हो उठे और षड्यंत्र बताकर उन्हें प्रतिबंधित कर दिया।
  • 26 जनवरी 1930 को स्वामी गोपालदास चन्दनमल ब्राह्मण ने सहयोगियों के साथ चूरू के सर्वोच्च शिखर धर्मस्तुप पर तिरंगा फहराया।
  • अप्रेल, 1932 ई. में जब लंदन में महाराजा गोल मेज सम्मेलन में भाग लेने गये तो ‘बीकानेर एक दिग्दर्शन‘ नामक पेम्पलेट बांटे गये। जिसमें बीकानेर की वास्तविक दमनकारी नीतियों का खुलासा किया गया। लौटकर महाराजा ने सार्वजनिक सुरक्षा कानून लागू किया।
  • स्वामी गोपालदास, चंदनमल बहड़, सत्यनारायण सर्राफ, खूबचन्द सर्राफ आदि को बीकानेर षड्यंत्र केस के नाम पर गिरफ्तार कर लिया गया।
  • अक्टूबर, 1936 में मघाराम वैध ने कलकत्ता में बीकानेर प्रजामण्डल की स्थापना की।
  • 4 अक्टूबर, 1936 ई. को प्रमुख नेता शीघ्र ही निर्वासित कर दिये गये, जिनमें वकील मुक्ताप्रसाद, मघाराम वैध व लक्ष्मीदास शामिल थे। रघुबरदयाल ने 22 जुलाई, 1942 ई. को बीकानेर प्रजा परिषद् की स्थापना की, जिसका उद्देश्य महाराजा के नेतृत्व में उत्तरदायी शासन की स्थापना करना था।
  • 1943 ई. में गंगासिंह जी की मृत्यु के बाद शार्दुल सिंह गद्दी पर बैठे। वे भी दमन में विश्वास रखते थे।
  • द्वारका प्रसाद नामक छठी कक्षा के बालक को संस्था से निकाला गया क्योंकि उसने उपस्थिति गणना के समय जयहिन्द बोल दिया था।
  • 26 अक्टूबर, 1944 ई. को बीकानेर दमन विरोधी दिवस मनाया गया जो राज्य में प्रथम सार्वजनिक प्रदर्शन था। इसी बीच भारत में राजनीतिक गतिविधियां तेज हो गई और महाराजा ने उत्तरदायी शासन की घोषणा की।
  • 30 जून, 1946 ई. में रायसिंह नगर में हो रहे प्रजा परिषद् के सम्मेलन में पुलिस ने गोलीबारी की। बदली हुई परिस्थितियों को देखते हुए सत्ता हस्तान्तरण के लक्षण जब दिखने लगे तो प्रजा परिषद् का कार्यालय पुनः स्थापित किया गया।
  • 1946 ई. में ही दो समितियों, संवैधानिक समिति व मताधिकार समिति की स्थापना की गई। रिपोर्ट को लागू करने का आश्वासन तो दिया गया पर कोई ठोस कार्यवाही नहीं हो पाई व उत्तरदायी शासन की मांग अधूरी ही रही।
  • 16 मार्च, 1948 ई. में जसवंत सिंह दाउदसर के नेतृत्व में मंत्रिमण्डल बना जिसे प्रजा परिषद ने अस्वीकृत कर दिया और उसके मंत्रियों ने इस्तीफा दिया।
  • 30 मार्च, 1949 ई. को वृहत्तर राज्य के निर्माण के साथ रघुवर दयाल, हीरालाल शास्त्री के मंत्रिमण्डल में सम्मिलित हुए।

जैसलमेर में प्रजामण्डल

  • यह क्षेत्र राजस्थान का सर्वाधिक पिछड़ा क्षेत्र था, जो विस्तारित रेगिस्तान, यातायात-संचार के सीमित साधनों व राजनीतिक पृथकता के कारण शेष राजस्थान से कटा ही रहा।
  • यहाँ के महारावल का दमन अत्यन्त तीव्र था। जिसके कारण 1915 ई. में ‘सर्व हितकारी वाचनालय’ मीठालाल व्यास के आशीर्वाद से सागरमल गोपा व उसके साथियों द्वारा स्थापित किया गया।
  • 1930 ई. में जब रघुनाथ सिंह मेहता, आईदान सिंह व सागरमल गोपा ने एक विज्ञप्ति निकाल कर पं. जवाहरलाल नेहरू के जन्मदिन पर उन्हें बधाई दी तो उपर्युक्त नेताओं को गिरफ्तार कर लिया गया।
  • रघुनाथ सिंह मेहता की अध्यक्षता में स्थापित माहेश्वरी युवक मण्डल को गैर कानूनी घोषित कर दिया गया।
  • 1937-38 ई. में शिवशंकर गोपा, मदनलाल पुरोहित, लालचन्द जोशी आदि ने लोक परिषद् की स्थापना का प्रयास किया। जैसलमेर में जन जागृति का श्रेय सर्वप्रथम सागरमल गोपा को जाता है।
  • जैसलमेर में 1938 में देशी राज्य लोक परिषद की शाखा स्थापित।
  • 1940 ई. के आस-पास उन्होंने ‘जैसलमेर में गुण्डाराज’ नामक पुस्तक छपवा कर वितरित की। इस पर दरबार द्वारा निर्वासित होकर वे नागपुर चले गये।
  • 1941 ई. में पिता की मृत्यु पर जब गोपा जी जैसलमेर आये तो उन्हें 1942 ई. में छः वर्ष का कठोर कारावास की सजा दी गई। जेल में उन्होंने अमानवीय व्यवहार के बारे में जय नारायण व्यास को पत्र भेजे।
  • 3 अप्रेल, 1946 ई. में गोपा जी को जेल में ही गुमानसिंह ने केरोसिन डालकर जलाकर मार डाला। इस घटना ने जैसलमेर के जन मानस को झकझोर डाला और निरंकुश शासन का विरोध तीव्र हो गया। इन परिस्थितियों में मीठालाल व्यास द्वारा 1945 ई. में जोधपुर में जैसलमेर प्रजा मंण्डल की स्थापना की गई।
  • 1946 ई. में जयनारायण व्यास अचलेश्वर प्रसाद ने जैसलमेर में एक सार्वजनिक सभा की।
  • 2 अक्टूबर, 1947 ई. को गांधीजी के जन्म दिवस पर जूलुस निकालने पर लाठीचार्ज किया गया। स्वतंत्रता के पश्चात् जैसलमेर की सामरिक स्थिति के कारण भारत सरकार ने अपना एक प्रशासक नियुक्त किया और कालान्तर में जैसलमेर संयुक्त राजस्थान का भाग बन गया।

मेवाड़ में प्रजामण्डल

  • राजस्थान में सर्वाधिक प्रतिष्ठित राज्य मेवाड़ का था। यहाँ जन जागरण की पृष्ठभूमि किसान आन्दोलन जनजातीय आन्दोलन से बनी।
  • कांग्रेस के हरिपुरा अधिवेशन के पश्चात माणिक्यलाल वर्मा व बलवंत सिंह मेहता ने 24 अप्रेल, 1938 ई. को मेवाड़ प्रजा मण्डल की स्थापना की। इसे 11 मई, 1938 ई. को गैर कानूनी घोषित कर दिया एवं वर्मा जी को निष्कासित कर दिया गया।
  • मेवाड़ प्रजामण्डल का विधान बलवन्त सिंह मेहता व प्रेम नारायण माथुर द्वारा तैयार।
  • अजमेर जाकर वर्मा जी ने अपनी गतिविधियाँ जारी रखी व मेवाड़ का वर्तमान शासन नामक पुस्तक प्रकाशित करके शासन की कटु आलोचना की।
  • फरवरी, 1939 ई. में जब वे उदयपुर आये तो उन्हें बंदी बनाकर पिटाई की गई। इस घटना की गांधी जी ने 18 फरवरी 1939 ई. के हरिजन अंक में कड़ी भर्त्सना की। माणिक्यलाल वर्मा को दो वर्ष के कारावास की सजा सुनाई गई।
  • 1941 ई. में मेवाड़ प्रजामण्डल पर लगी पाबन्दी हटा ली। परिणामस्वरूप राज्य भर में इसकी शाखायें स्थापित कर दी गई।
  • 25-26 नवम्बर, 1941 ई. को इसका पहला अधिवेशन वर्मा जी की अध्यक्षता में किया गया, जिसमें भाग लेने के लिये आचार्य कृपलानी व विजयलक्ष्मी पंडित उदयपुर आये। अधिवेशन में मेवाड़ में उत्तरदायी शासन की मांग की गई।
  • इस अधिवेशन में ‘मेवाड़ हरिजन सेवक संघ‘ भी स्थापित व इसका कार्य मोहनलाल सुखाड़िया को दिया गया। भील, मीणों व आदिवासियों की सेवा का कार्य बलवन्त सिंह मेहता को।
  • वर्मा जी भारत छोड़ो आन्दोलन से पूर्व होने वाली रियासती कार्यकर्ताओं की बैठक में भाग लेकर बम्बई से आये। उदयपुर आकर उन्होंने महाराणा को ब्रिटिश सरकार से संबंध विच्छेद करने के लिये पत्र भेजा। ऐसा न करने पर आन्दोलन की धमकी दी।
  • 21 अगस्त, 1942 ई. में वर्माजी को गिरफ्तार किया गया, जिसके विरोध में उदयपुर में पूर्ण हड़ताल व गिरफ्तारियां हुई। इस आन्दोलन में विद्यार्थी भी कूद पडेन और आन्दोलन नाथद्वारा, भीलवाड़ा और चित्तौड़ तक फैल गया।
  • 1942 ई. का यह आन्दोलन राजस्थान के अन्य भागों में चल रहे आन्दोलनों से भिन्न था। यहाँ के नेता इस आन्दोलन को अखिल भारतीय स्तर पर चल रहे आन्दोलन का भाग मानते थे।
  • भारतीय राजनीति का परिदृश्य बदलने पर प्रजामण्डल नेताओं को छोड़ दिया गया व 1945 ई. में प्रजामंडल पर प्रतिबंध हटा लिया गया। राजनीतिक चेतना को विस्तारित करने के लिये प्रभात फेरियां व राष्ट्रीय नेताओं की जयन्ती मनायी जाने लगी।
  • वर्मा जी ने 31 दिसम्बर से 2 जनवरी, 1946 ई. को अखिल भारतीय देशी राज्य लोक परिषद् का सातवां अधिवेशन उदयपुर में बुलाया। इसकी अध्यक्षता जवाहर लाल नेहरू ने की।
  • 1946 ई. में महाराणा ने संविधान निर्मात्री सभा का गठन किया, जिसमें प्रजामण्डल द्वारा मनोनीत सदस्य भी सम्मिलित हुए। इसकी रिपोर्ट प्रजामण्डल ने अस्वीकार कर दी।
  • 2 मार्च, 1947 ई. को घोषित नये संविधान को भी प्रजा मण्डल ने अस्वीकार कर दिया। श्री के. एम. मुंशी द्वारा तैयार किया गया नये संविधान का प्रारूप मई, 1947 ई. में अस्वीकार कर दिया गया। इस प्रकार महाराणा के अप्रगतिशील सुधारों का विरोध चलता रहा।
  • उदयपुर ने भारतीय संघ में सम्मिलित होना स्वीकार किया और जनतंत्रात्मक प्रक्रिया से जुड़ गया।

कोटा में प्रजामण्डल

  • कोटा में जन जागृति का श्रेय पं. नयनूराम शर्मा को जाता है, जो राजस्थान सेवा संघ के सक्रिय सदस्य थे। पं. शर्मा ने बेगार विरोधी आन्दोलन चलाने के साथ 1934 ई. में हाड़ौती पंजामंडल की भी स्थापना की किन्तु कोई विशेष उपलब्धि नहीं मिली।
  • 1939 ई. में उन्होंने पं. अभिन्न हरि के साथ मिलकर कोटा राज्य प्रजामण्डल की स्थापना की। जिसका मुख्य उद्देश्य राज्य में उत्तरदायी प्रशासन की स्थापना करना था।
  • प्रजामण्डल का प्रथम अधिवेशन नयनूराम शर्मा की अध्यक्षता में मांगरोल 1939 में किया गया।
  • 1941 ई. में पं. नयनूराम शर्मा की हत्या के बाद नेतृत्व पं. अभिन्न हरि के पास आ गया। इन्होंने 1 नवम्बर, 1941 ई. में प्रजामण्डल के दूसरे अधिवेशन की अध्यक्षता की। 1942 ई. में वे गिरफ्तार हो गये।
  • 1942 ई. में प्रजामण्डल के नये अध्यक्ष मोतीलाल जैन ने महाराव को पत्र लिखकर ब्रिटिश सरकार से संबंध विच्छेद करने को कहा। प्रजामंडल के कार्यकत्ताओं ने पुलिस को बैरकों में बंद करके शहर कोतवाली पर कब्जा कर तिरंगा फहराया।
  • दो सप्ताह तक कोटा के नगर प्रशासन पर जनता का कब्जा रहा। ऐसा इतिहास में दूसरी बार हुआ जब जनता ने प्रशासन अपने हाथ में लिया (पहली बार 1857 ई. की क्रांति के दौरान ऐसा हुआ था।)।
  • महाराव ने जब आश्वासन दिया कि सरकार दमन का सहारा नहीं लेगी, तब शासन पुनः महाराव को सौंपा गया। गिरफ्तार किये गये कार्यकर्त्ता रिहा कर दिये गये। यद्यपि उत्तरदायी शासन का आश्वासन दिया गया पर कोई व्यावहारिक या वास्तविक कार्य नहीं किया गया।
  • इसी बीच स्वतंत्रता प्राप्त होने व संयुक्त राजस्थान बनने की प्रक्रिया शुरू होने से लोकप्रिय सरकार पद ग्रहण नहीं कर पाई।

बून्दी में प्रजामण्डल

  • बून्दी में सार्वजनिक चेतना के लक्षण 1922 ई. में परिलक्षित हुए। पथिक जी द्वारा बरड़ आन्दोलन को समर्थन देने से नई राजनीतिक चेतना का संचार हुआ।
  • पथिक जी ने रामनारायण चौधरी के साथ मिलकर, कर वृद्धि व बेगार प्रथा के विरूद्ध आन्दोलन छेड़ा बून्दी प्रजामण्डल की स्थापना का श्रेय कांतिलाल को जाता है। प्रजामण्डल ने प्रशासनिक सुधारों की मांग तेज कर दी।
  • 1937 ई. में प्रजा मंडल के अध्यक्ष ऋषि दत्त मेहता बंदी बनाकर अजमेर भेज दिये गये। उनकी अनुपस्थिति में बृजसुन्दर शर्मा ने नेतृत्व संभाला। प्रजामण्डल गैर कानूनी घोषित कर दिया गया।
  • मेहता जी ने 1944 ई. में अपनी रिहाई के बाद बून्दी राज्य लोक परिषद् की स्थापना की, जिसे कुछ समय बाद मान्यता प्राप्त हो गई। महाराव ने बदलती परिस्थितियों को भांपते हुए संविधान निर्मात्री सभा का गठन किया, जिसमें प्रजा मंडल के सदस्य मनोनीत किये गये। नवनिर्मित संविधान पारित होने से पूर्व ही बून्दी राजस्थान में विलीन हो गया।

हाड़ौती में प्रजामण्डल

  • कोटा और बून्दी राज्यों में स्थापित हाड़ौती मण्डल ने झालावाड़ राज्य में भी जागृति का लक्ष्य रखा। कोटा का नयनू राम अक्सर अपने पत्थर के व्यवसाय के सम्बन्ध में झालावाड़ आता जाता था, जहाँ उसने लोगों में जागृति का बीड़ा उठाया। छावनी में स्थित हरिजन स्कूल के रामचन्द से वह प्रायः मिलता रहा।
  • मांगीलाल भव्य, तनसुखलाल मित्तल, मदन गोपाल जी, राम निवास आदि ने हाड़ौती मण्डल की गतिविधियों का झालावाड़ में कुशलता से संचालन कर सार्वजनिक चेतना का कार्य किया। उनकी गतिविधियों से प्रभावित होकर और राजस्थान में बदलती हुई परिस्थितियों के कारण 1946 में झालावाड़ के नरेश ने अपने राज्य में संवैधानिक सुधारों की घोषणा की।
  • एच. जे. मंगलानी के अनुसार – “झालावाड़ नरेश द्वारा अपने राज्य में सुधारों की घोषणा करना प्रजातंत्रीय व्यवस्था की दिशा में एक महत्वपूर्ण प्रयास था।“

जयपुर में प्रजामण्डल

  • अर्जुनलाल सेठी द्वारा जयपुर में राजनीतिक आन्दोलन का आरम्भ, आगे चलकर सेठ जमनालाल बजाज द्वारा रचनात्मक कार्य़ों में परिवर्तित हो गया।
  • 1921 के असहयोग आन्दोलन से प्रभावित हो जयपुर राज्य में सेवा समितियों की स्थापना हुई।
  • बजाज द्वारा 1927 ई. में चरखा संघ की स्थापना हुई। 1931 ई. में कर्पूरचन्द पाटनी ने जयपुर राज्य प्रजामंडल की स्थापना की, जो राजनीतिक दृष्टि से अधिक प्रभावशाली नहीं रहा।
  • कांग्रेस के हरिपुरा प्रस्ताव के बाद जमनालाल बजाज की प्रेरणा व हीरालाल शास्त्री के सक्रिय सहयोग से जयपुर राज्य प्रजामण्डल का पुनर्गठन हुआ।
  • इसका पहला अधिवेशन 9 मई, 1938 ई. को बजाज जी की अध्यक्षता में सम्पन्न हुआ। प्रजामण्डल का मूल उद्देश्य उत्तरदायित्व शासन की स्थापना करना था।
  • प्रजामंडल को हतोत्साहित करने के लिये जयपुर सरकार ने कानून बनाकर किसी भी अपंजीकृत संस्था का सदस्य बनने पर रोक लगा दी। चूँकि श्री बजाज जयपुर राज्य की सीमा में नहीं रहते थे इसलिये संस्था का पंजीकरण नहीं हो पाया।
  • राज्य द्वारा लगाये प्रतिबंध को तोड़कर जयपुर में प्रवेश करने पर बजाज को बंदी बना लिया गया। उन्हीं के साथ अन्य नेता जैसे हीरालाल शास्त्री, चिरंजीलाल अग्रवाल कर्पूरचन्द पाटनी भी बंदी बनाये गये।
  • जयपुर में सत्याग्रह का संचालन गुलाबचन्द कासलीवाल व दौलतमल भण्डारी के नेतृत्व में शुरू हुआ।
  • अखिल भारतीय स्तर पर इस प्रश्न को गांधीजी ने उठाया व जयपुर के महाराजा को समझौते के लिये चेतावनी दी।
  • औपचारिक बातचीत के बाद 7 अगस्त, 1939 ई. को समझौता हुआ जिसके तहत प्रजामंडल को मान्यता मिली व मार्च 1940 ई. में इसका विधिवत् पंजीकरण हुआ। हीरालाल शास्त्री इसके पहले अध्यक्ष बने।
  • मई, 1940 में आपसी मतभेदों की वजह से कई कार्यकर्ताओं ने प्रजामण्डल छोड़ दिया व चिंरजीलाल अग्रवाल की अध्यक्षता में ‘प्रजामण्डल प्रगतिशील दल‘ नामक संगठन की स्थापना की।
  • 16 सितम्बर, 1942 ई. को शास्त्री जी ने जयपुर के प्रधानमंत्री सर मिर्जा इस्माइल को पत्र लिखकर कुछ शर्त़ें रखी जिनकी पालना न करने पर आन्दोलन की चेतावनी दी। इनमें युद्ध के लिये जन-धन की सहायता न देना व उत्तरदायी शासन के लिये शीघ्र कार्यवाही करना था।
  • 1942 ई. का आन्दोलन संचालित करने के विषय में विवाद उत्पन्न हुआ व बाबा हरिशचन्द्र के नेतृत्व में आजाद मोर्चा प्रजामण्डल से पृथक् हो गया जो 1945 ई. में नेहरू जी के प्रयासों से पुनः प्रजामण्डल में मिल गया। इससे आन्दोलन की गति थोड़ी धीमी पड़ी।
  • मार्च, 1947 ई. में नया मंत्रिमंडल बना किन्तु उत्तरदायी सरकार की स्थापना 30 मार्च, 1949 ई. को ही हो सकी।

अलवर में प्रजामण्डल

  • अलवर में स्वाधीनता संग्राम के अग्रदूत पं. हरिनारायण शर्मा थे जिन्होंने अस्पृश्यता निवारण संघ, वाल्मीकि संघआदिवासी संघ की स्थापना की।
  • 1938 में पण्डित हरिनारायण शर्माकुंजबिहारी लाल मोदी ने अलवर में प्रजामण्डल की स्थापना की। इस संस्था का पंजीकरण नहीं हुआ तो संघर्ष आरंभ हुआ।
  • अप्रेल, 1940 ई. में अलवर में निर्वाचित नगर पालिका परिषद् का गठन हुआ।
  • 1940 ई. में युद्ध कोष के लिये चंदा वसूली का कार्यकत्ताओं ने विरोध किया। इस पर हरिनारायण शर्माभोलानाथ मास्टर को गिरफ्तार कर लिया गया और उन पर मुकदमा चलाया गया।
  • जनवरी, 1944 ई. में भवानीशंकर शर्मा की अध्यक्षता में प्रजामण्डल का प्रथम अधिवेशन हुआ। उत्तरदायी सरकार के गठन की मांग को लेकर प्रजामण्डल निरन्तर प्रयासरत रहा। 1946 ई. में प्रजामण्डल ने किसानों की मांगों का समर्थन करके उन्हें भू-स्वामित्व देने के प्रस्ताव का समर्थन किया।
  • 30 अक्टूबर, 1946 ई. में महाराजा ने संवैधानिक सुधारों के लिये समिति नियुक्त की जिसका आन्दोलनकारियों ने बहिष्कार किया।
  • उत्तरदायी शासन की मांग अलवर के शासक ने दिसम्बर, 1947 ई. को स्वीकार कर ली।
  • मार्च, 1948 ई. में मत्स्य संघ में अलवर के विलय के साथ ही राजस्थान के एकीकरण की प्रक्रिया प्रारम्भ हो गई।

भरतपुर में प्रजामण्डल

  • भरतपुर में स्वतंत्रता आन्दोलन का श्रीगणेश जगन्नाथ दास अधिकारी व गंगा प्रसाद शास्त्री ने किया। 1912 ई. में हिन्दी साहित्य समिति की स्थापना हुई। सौभाग्य से भरतपुर के महाराजा किशनसिंह अधिक प्रगतिशील शासक थे। इन्होंने हिन्दी को प्रोत्साहित किया व उत्तरदायी शासन की मांग को स्वीकार किया व 15 सितम्बर, 1927 ई. को ऐसी घोषणा भी की।
  • भरतपुर में 1927 में गौरीशंकर हीराचन्द ओझा की अध्यक्षता में हिन्दी साहित्य का 17वाँ अधिवेशन आयोजित हुआ।
  • ब्रिटिश सरकार ने महाराजा की इन गतिविधियों को गम्भीरता से लेते हुए उन्हें गद्दी छोड़ने पर विवश किया। उनके स्थान पर अल्प वयस्क बृजेन्द्र सिंह गद्दी पर बैठे।
  • प्रशासन के लिये एक अंग्रेज अधिकारी की नियुक्ति की गई, जिसमें जगन्नाथ दास अधिकारी को निर्वासित कर दिया व सार्वजनिक सभाओं व प्रकाशनों पर प्रतिबंध लगा दिया।
  • 1928 में भरतपुर राज्य प्रजा संघ की स्थापना।
  • 1938 में गोपीलाल यादव की अध्यक्षता में प्रजामण्डल की स्थापना।
  • हरिपुरा अधिवेशन के पश्चात् भरतपुर के नेताओं ने रेवाड़ी (हरियाणा) में दिसम्बर, 1938 ई. को प्रजामंडल का गठन किया।
  • दिसम्बर, 1940 ई. में प्रजामंडल से समझौता किया जिसके तहत प्रजा परिषद नाम से संस्था का पंजीकरण किया गया व सभी नेता रिहा किये गये।
  • प्रजा परिषद् का मुख्य उद्देश्य सार्वजनिक समस्याओं को प्रस्तुत करना, प्रशासनिक सुधारों पर बल देना व शिक्षा का प्रसार करना था।
  • परिषद् ने  27 अगस्त से 2 सितम्बर, 1940 ई. तक राष्ट्रीय सप्ताह मनाया।
  • परिषद् ने भारत छोड़ो आन्दोलन में सक्रिय रूप से भाग लिया। सरकार ने परिषद् की संतुष्टि के लिये बृज जय प्रतिनिधि सभा का गठन किया किन्तु राजनीतिक उद्देश्यों की पूर्ति नहीं हो सकी। प्रतिनिधि सभा का बहिष्कार किया गया।
  • 1945 ई. में सत्याग्रह की घोषणा की गई किन्तु प्रमुख नेताओं की गिरफ्तारी के कारण वह सफल नहीं हो पाया। दिसम्बर, 1946 ई. के कामां सम्मेलनों में बेगार समाप्त करने व उत्तरदायी शासन की मांग रखी गई। दुर्भाग्यवश राज्य के उपद्रव साम्प्रदायिक झगड़ों में बदल गये।
  • 1947 में प्रजा परिषद ने किसान सभा के साथ मिल राष्ट्रव्यापी आंदोलन छेड़ा।
  • 18 मार्च, 1947 ई. को भरतपुर के मत्स्य संघ में विलीन होने के बाद ही समस्यायें समाप्त हो पाई।

धौलपुर में प्रजामण्डल

  • आर्य समाज के प्रमुख स्वामी श्रद्धानन्द ने 1918 ई. से ही धौलपुर के निरंकुश शासन व्यवस्था के विरूद्ध आवाज उठानी आरंभ की। स्वामी जी की मृत्यु के बाद आन्दोलन शिथिल हो गया।
  • 1936 ई. में धौलपुर राज्य प्रजामंडल की स्थापना कृष्ण दत्त पालीवाल ने की। यहाँ भी प्रजामंडल उत्तरदायी शासन व्यवस्था व नागरिक अधिकारों की मांग को लेकर आन्दोलन चलता रहा। शासक का रवैया सदैव की भांति दमनात्मक ही रहा।
  • मार्च, 1946 ई. में तासीमो गाँव में अधिवेशन में पुलिस द्वारा गोलीबारी की। जनता के दबाव में आकर तासीमो कांड की जाँच के आदेश दिये।
  • नवम्बर, 1947 में प्रजामण्डल ने महाराज की अनुमति नहीं मिलने पर भी अधिवेशन किया व इसका उद्घाटन कांग्रेस महासचिव शंकर राव देव ने किया।
  • 4 मार्च, 1948 ई. में उत्तरदायी शासन स्थापित करना स्वीकार किया। शीघ्र ही धौलपुर मत्स्य संघ में विलीन हो गया।
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