जोधपुर के राठौड़ वंश

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राठौड़ वंश

  • राजस्थान के उत्तरी व पश्चिमी भागों मे राठौड़ वंशीय राजपूतों का साम्राज्य स्थापित हुआ, जिसे मारवाड़ कहते है।
  • राठौड़ का शाब्दिक अर्थ राष्ट्रकूट होता है।
  • जोधपुर के राठौड़ों का मूल स्थान कन्नौज था। उनको बंदायूँ वंश से उत्पन्न माना जाता है।
  • जोधपुर के राठौड़ वंश का संस्थापक राव सीहा था, जो कन्नौज के जयचंद गहड़वाल का प्रपौत्र था।
  • राव सीहा कुंवर सेतराम का पुत्र था व उसकी रानी सोलंकी वंश की पार्वती थी।

    राव चूड़ा

    • राव चूड़ा किसका पुत्र था प्रमुख शासक राव चूड़ा राठौड़ राव वीरमदेव का पुत्र, मारवाड़ का प्रथम बड़ा शासक था।
    • राव चूड़ा का इतिहास उसने मंडोर को मारवाड़ की राजधानी बनाया।
    • मारवाड़ राज्य में ‘सामन्त प्रथा‘ का प्रारम्भ राव चूड़ा द्वारा किया गया था।
    • राव चूड़ा की रानी चाँदकंवर ने चांद बावड़ी बनवाई।
    • राव चूड़ा ने नागौर के सूबेदार ‘जल्लाल खां‘ को हराकर नागौर के पास ‘चूड़ासर‘ बसाया था।
    • राव चूड़ा ने अपनी ‘मोहिलाणी‘ रानी के पुत्र ‘कान्हा‘ को राज्य का उत्तराधिकारी नियुक्त किया और अपने ज्येष्ठ पुत्र ‘रणमल‘ को अधिकार से वंचित कर दिया।
    • राठौड़ रणमल ने मेवाड़ के राणा लाखा, मोकल तथा महाराणा कुम्भा को अपनी सेवायें प्रदान की।
    • 1438 ई. में मेवाड़ के सामन्तों ने षड़यंत्र रचकर रणमल की हत्या कर दी थी।
    • चूड़ा की पुत्री हंसाबाई का विवाह मेवाड़ के राणा लाखा के साथ हुआ।
    • चूड़ा के पुत्र रणमल की हत्या चित्तौड़ में हुई थी। (कुम्भा के कहने पर)

    राव जोधा (1438-89 ई.)

    • रणमल का पुत्र। जोधा ने 12 मई 1459 ई. में जोधपुर नगर की स्थापना की तथा चिड़ियाटूंक पहाड़ी पर दुर्ग (मेहरानगढ़/मयूरध्वज/गढ़चिन्तामणि) बनवाया।
    • राव जोधा ने अपनी पुत्री का विवाह कुम्भा के पुत्र रायमल के साथ किया था।
    • मेहरानगढ़ की नींव करणी माता के हाथों रखी गई थी।
    • किपलिंग ने मेहरानगढ़ किले के लिए कहा, “यह किला परियों व अप्सराओं द्वारा निर्मित किला है।
    • ”मेहरानगढ़ दुर्ग में मेहरसिंहभूरे खां की मजार है।
    • मेहरानगढ़ दुर्ग में शम्भू बाण, किलकिला व गज़नी खां नामक तोपे हैं।
    • राव जोधा ने मेहरानगढ़ किले में चामुण्डा देवी का मन्दिर बनवाया जिसमें 30 सितम्बर 2008 को देवी के मन्दिर में दुर्घटना हुई जिसकी जाँच के लिए जशराज चौपड़ा कमेटी गठित की गयी।
    • राव जोधा के दो प्रमुख उत्तराधिकारी थे- राव सातल तथा राव सूजा।

    राव गांगा (1515-32)

    • राव सूजा की मृत्यु के बाद उसका पौत्र गांगा मारवाड़ का शासक बना।
    • राव गांगा बाघा जी के पुत्र थे।
    • खानवा के युद्ध में गांगा ने अपने पुत्र मालदेव के नेतृत्व में सेना भेजकर राणा सांगा की मदद की थी।
    • राव गांगा ने गांगलोव तालाब, गांगा की बावड़ीगंगश्याम जी के मंदिर का निर्माण करवाया।

    राव मालदेव (1532-62 ई.)

    • राव मालदेव राव गांगा का बड़ा पुत्र था।
    • मालदेव ने उदयसिंह को मेवाड़ का शासक बनाने में मदद की।
    • मालदेव की पत्नी उमादे (जो जैसलमेर के राव लूणकर्ण की पुत्री थी) को रूठीरानी के नाम से जाना जाता है।
    • अबुल फज़ल ने मालदेव को ‘हशमत वाला’ शासक कहा था।
    • शेरशाह सूरीमालदेव के दो सेनापतियों जैता व कुम्पा के बीच जनवरी, 1544 ई. मे गिरी सुमेल का युद्ध (जैतारण का युद्ध) हुआ जिसमें शेरशाह बड़ी मुश्किल से जीत सका।
    • गिरी सूमेल के युद्ध के समय ही शेरशाह के मुख से निकला कि “मैं मुट्ठी भर बाजरे के लिए हिन्दुस्तान की बादशाहत खो देता।
    • राव मालदेव के समय सिवाणा पर राणा डूँगरसी का अधिकार था।
    • राव मालदेव के समय बीकानेर का शासक राव जैतसी था।
    • मालदेव की रानी उमादे (रूठी रानी) को अजमेर से मनाकर ईश्वरदास जी जोधपुर लाये लेकिन आसा बारहठ ने रानी को एक दोहा सुनाया जिससे वह वापस नाराज हो गई।

    राव चन्द्रसेन (1562-1581 ई.)

    • राव चन्द्रसेन मालदेव का तीसरा पुत्र था।
    • चन्द्रसेन के भाई राम के कहने पर अकबर ने सेना भेजकर जोधपुर पर कब्जा कर लिया था।
    • सन् 1570 ई. के नागौर दरबार में वह अकबर से मिला था लेकिन शीघ्र ही उसने नागौर छोड़ दिया।
    • चन्द्रसेन मारवाड़ का पहला राजपूत शासक था जिसने अकबर की अधीनता स्वीकार नहीं की और मरते दम तक संघर्ष किया। ‘मारवाड़ का भूला बिसरा नायक’ नाम से प्रसिद्ध।
    • चन्द्रसेन को ‘मारवाड़ का प्रताप’ कहा जाता है।

    राव उदयसिंह (1583-95 ई.)

    • राव चन्द्रसेन का भाई
    • राव उदयसिंह को मोटा राजा के नाम से भी जाना जाता है।
    • राव उदयसिंह ने 1570 ई. में अकबर की अधीनता स्वीकार की।
    • उसने अपनी पुत्री जोधाबाई (जगत गुंसाई/भानमती) का विवाह 1587 ई. में शहजादे सलीम (जहाँगीर) के साथ किया।
    • शहजादा खुर्रम इसी जोधाबाई का पुत्र था।

    सवाई राजा सूरसिंह (1595-1619 ई.)

    • मोटाराजा उदयसिंह की मृत्यु के पश्चात मुगल सम्राट अकबर ने सूरसिंह को उत्तराधिकारी घोषित किया।
    • इन्हें टीका देने की रस्म लाहौर में सम्पन्न की गई।
    • 1604 ई. में अकबर ने इन्हें ‘सवाई राजा’ की उपाधि प्रदान की।
    • अकबर ने इन्हें दक्षिण में नियुक्त किया तब जोधपुर का शासन-प्रबंध इनके पुत्र गजसिंह तथा भाटी गोविंददास ने संभाला था।
    • सूरसिंह ने जहाँगीर को रणरावत तथा फौज शृंगार नामक हाथी भेंट किए थे।
    • 1613 ई. में खुर्रम के  मेवाड़ अभियान में भी सूरसिंह शामिल थे।
    • जहाँगीर ने इनका मनसब 5000 जात व 3000 सवार कर दिया था।
    • 1619 ई. में दक्षिण में रहते हुए सूरसिंह का देहांत हो गया।
    • सूरसिंह ने जोधपुर में सूरसागर तालाब तथा जोधपुर दुर्ग में मोती महल का निर्माण करवाया।

    महाराजा गजसिंह (1619-1638 ई.)

    • महाराजा सूरसिंह की मृत्यु के बाद गजसिंह जोधपुर के शासक बने तथा बुरहानपुर में इनका राज्याभिषेक किया गया।
    • गजसिंह की सेवाओं से प्रसन्न होकर मुगल सम्राट जहाँगीर ने इन्हें ‘दलथंभन’ की उपाधि प्रदान की।
    • 1630 ई. में जहाँगीर ने गजसिंह को ‘महाराजा’ की उपाधि भी प्रदान की।
    • गजसिंह का ज्येष्ठ पुत्र अमरसिंह था लेकिन उन्हाेंने अपनी प्रेमिका अनारां के कहने पर अपना उत्तराधिकारी छोटे पुत्र जसवंत सिंह को घोषित किया।
    • गजसिंह ने मुगल शासक जहाँगीर तथा शाहजहाँ को अपनी सेवाएं प्रदान की।
    • गजसिंह के समय हेम कवि ने ‘गुणभाषा चित्र’ केशवदास गाडण ने ‘राजगुणरूपक’ नामक ग्रंथों की रचना की।

    राव अमरसिंह

    • अमरसिंह गजसिंह का ज्येष्ठ पुत्र था लेकिन इनकी विद्रोही तथा स्वतंत्र प्रवृत्ति के कारण गजसिंह ने इन्हें राज्य से निकाल दिया।
    • इसके बाद अमरसिंह मुगल बादशाह शाहजहाँ के पास चले गए।
    • शाहजहाँ ने इन्हें नागौर परगने का स्वतंत्र शासक बना दिया।
    • 1644 ई. में बीकानेर के सीलवा तथा नागौर के जाखणियां के गाँव में मतीरे की बैल को लेकर मतभेद हुआ।
    • इस मतभेद कारण नागौर के अमरसिंह तथा बीकानेर के कर्णसिंह के मध्य युद्ध हुआ जिसमें अमरसिंह पराजित हुआ।
    • यह लड़ाई ‘मतीरे की राड़’ के नाम से प्रसिद्ध हुई।
    • सलावत खाँ ने अमरसिंह को द्वेषवश अपशब्द बोले थे जिससे नाराज अमरसिंह ने इसकी हत्या कर दी तथा उसके अन्य मनसबदारों से लड़ते हुए अमरसिंह वीरगति को प्राप्त हुए।

    महाराजा जसवंतसिंह (प्रथम) (1638-78 ई.)

    • महाराजा जसवंत सिंह प्रथम का जन्म 26 दिसम्बर, 1626 ई. में बुहरानपुर में हुआ था।
    • गजसिंह के पुत्र जसवन्तसिंह की गिनती मारवाड़ के सर्वाधिक प्रतापी राजाओं में होती है।
    • शाहजहाँ ने उसे ‘महाराजा’ की उपाधि प्रदान की थी।
    • वह जोधपुर का प्रथम महाराजा उपाधि प्राप्त शासक था। शाहजहाँ की बीमारी के बाद हुए उत्तराधिकारी युद्ध में वह शहजादा दाराशिकोह की ओर से धरमत (उज्जैन) के युद्ध (1657 ई.) में औरंगजेबमुराद के विरुद्ध लड़कर हारा था।
    • वीर दुर्गादास इन्हीं का दरबारीसेनापति था।
    • मुहता (मुहणोत) नैणसी इन्हीं के दरबार में रहता था। नेणसी ने ‘मारवाड़ री परगना री विगत’ तथा ‘नैणसी री ख्यात’ नामक प्रसिद्ध ग्रंथ लिखे। इसे ‘मारवाड़ का अबुल फजल‘ कहा जाता है।
    • उसने मुगलों की ओर से शिवाजी के विरूद्ध भी युद्ध में भाग लिया था।
    • इनकी मृत्यु सन् 1678 ई. में अफगानिस्तान के जमरूद नामक स्थान पर हुई थी।
    • महाराजा जसवंत सिंह ने ‘भाषा-भूषण’ नामक प्रसिद्ध ग्रंथ की रचना की।
    • जसवंतसिंह द्वारा रचित अन्य ग्रंथ अपरोक्ष सिद्धान्त सार व प्रबोध चन्द्रोदय नाटक हैं।

    अजीतसिंह (1678-1724 ई.)

    • अजीतसिंह जसवन्त सिंह प्रथम का पुत्र था।
    • वीर दुर्गादास राठौड़ ने अजीतसिंह को औरंगजेब के चंगुल से मुक्त कराकर उसे मारवाड़ का शासक बनाया था।
    • अजीतसिंह ने अपनी पुत्री इन्द्रकुंवरी का विवाह मुगल बादशाह फर्रूखशियर से किया था।
    • अजीतसिंह की हत्या उसके पुत्र बख्तसिंह द्वारा की गयी।
    • अजीतसिंह के दाह संस्कार के समय अनेक मोर तथा बन्दरों ने स्वेच्छा से अपने प्राणों की आहुति दी।

    दुर्गादास राठौड़

    • वीर दुर्गादास जसवन्त सिंह के मंत्री आसकरण का पुत्र था।
    • उसने अजीतसिंह को मुगलों के चंगुल से मुक्त कराया।
    • उसने मेवाड़ व मारवाड़ में सन्धि करवायी।
    • अजीतसिंह ने दुर्गादास को देश निकाला दे दिया तब वह उदयपुर के महाराजा अमर सिंह द्वितीय की सेवा मे रहा। 
    • दुर्गादास का निधन उज्जैन में हुआ और वहीं क्षिप्रा नदी के तट पर उनकी छतरी (स्मारक) बनी हुई है।

    महाराजा अभयसिंह (1724-1749 ई.)

    • महाराजा अजीतसिंह की मृत्यु के बाद 1724 ई. में उनका पुत्र अभयसिंह जोधपुर का शासक बना। इनका राज्याभिषेक दिल्ली में हुआ।
    • इन्होंने 1734 ई. में मराठों के विरूद्ध राजपूताना के शासकों को एकजुट करने के लिए आयोजित हुरड़ा सम्मेलन में भाग लिया।
    • इनके समय चारण कवि करणीदान ने ‘सूरजप्रकाश’, भट्‌ट जगजीवन ने ‘अभयोदय’, वीरभाण ने ‘राजरूपक’ तथा सूरतिमिश्र ने ‘अमरचंद्रिका’ ग्रंथ की रचना की।
    • अभयसिंह ने मण्डोर में अजीत सिंह का स्मारक बनवाना प्रारंभ किया लेकिन इनके समय यह निर्माण कार्य पूर्ण नहीं हो सका।
    • इनके समय चारण कवि पृथ्वीराज द्वाराअभयविलास’ काव्य लिखा गया।

    महाराजा रामसिंह (1749-1751 ई.)

    • महाराजा अभयसिंह के निधन के बाद रामसिंह शासक बने।
    • यह एक कमजोर शासक थे तथा सरदारों के प्रति इनका व्यवहार भी अच्छा नहीं था जिसके कारण इन्हें शासक पद से हाथ धाेना पड़ा।

    महाराजा बख्तसिंह (1751-1752 ई.)

    • बख्तसिंह ने महाराजा रामसिंह को पराजित कर जोधपुर पर अधिकार कर लिया।
    • बख्तसिंह महाराजा अजीतसिंह के पुत्र तथा महाराजा अभयसिंह के छोटे भाई थे।   
    • बख्तसिंह वीर, बुद्धिमान तथा कार्यकुशल शासक थे।
    • इन्होंने नागौर के किले में कई महल बनावाए जिनमें से ‘आबहवा महल’ अधिक प्रसिद्ध है।
    • इन्होंने अपने पिता अजीतसिंह की हत्या कर दी थी जिस कारण ये पितृहंता कहलाए।
    • 1752 ई. में सींघोली (जयपुर) नामक स्थान पर इनका देहांत हो गया।

    महाराजा विजयसिंह (1752-1793 ई.)

    • महाराजा बख्तसिंह के देहांत के बाद विजयसिंह मारवाड़ के शासक बने।
    • इस समय रामसिंह ने पुन: जोधपुर राज्य पर अधिकार करने के प्रयास किए तथा इसके लिए उसने आपाजी सिंधिया को आमंत्रित किया।
    • विजयसिंह की सहायता के लिए बीकानेर के महाराजा गजसिंह तथा किशनगढ़ के शासक बहादुरसिंह सेना सहित आये लेकिन विजयसिंह पराजित हुए।
    • अंत में 1756 ई. में मराठों से संधि हुई तथा जोधपुर, नागौर आदि मारवाड़ राज्य विजयसिंह को तथा सोजत, जालौर, मारोठ का क्षेत्र रामसिंह को मिला।
    • विजयसिंह ने वैष्णव धर्म स्वीकार किया तथा राज्य में मद्य-मांस की बिक्री पर रोक लगवा दी।
    • विजयसिंह के समय ढलवाये गए सिक्कों को विजयशाही सिक्के कहा गया।
    • 1787 ई. में तुंगा के युद्ध में विजयसिंह ने जयपुर शासक प्रताप सिंह के साथ मिलकर माधवराव सिंधिया को पराजित किया।
    • पाटण के युद्ध (1790 ई.) में महादजी सिंधिया की सेना ने विजयसिंह की सेना को पराजित किया। यह युद्ध तंवरो की पाठण (जयपुर) नामक स्थान पर हुआ। 
    • 1790 ई. डंगा के युद्ध (मेड़ता) में महादजी सिंधिया के सेनानायक डी. बोइन ने विजयसिंह को पराजित किया।
    • इस युद्ध के परिणामस्वरूप सांभर की संधि हुई जिसके तहत विजयसिंह ने अजमेर शहर तथा 60 लाख रुपये मराठों काे देना स्वीकार किया।
    • विजयसिंह पर अपनी पासवान गुलाबराय का अत्यधिक प्रभाव था तथा समस्त शासनकार्य उसके अनुसार ही चलते थे।
    • इस कारण वीर विनाेद के रचयिता श्यामदास ने विजयसिंह को ‘जहाँगीर का नमूना’ कहा है।
    • गुलाबराय ने गुलाबसागर तालाब, कुजंबिहारी का मंदिर तथा जालौर दुर्ग के महल आदि का निर्माण करवाया।
    • बारहठ विशनसिंह ने ‘विजय विलास’ नामक ग्रंंथ की रचना की।

    महाराजा भीमसिंह (1793-1803 ई.)

    • महाराजा विजयसिंह की मृत्यु के बाद भीमसिंह मारवाड़ के शासक बने।
    • इनका स्वभाव क्रूर तथा उग्र था तथा इन्होंने सिंहासन पर बैठते ही अपने विरोधी भाइयों की हत्या करवा दी।
    • भीमसिंह ने मण्डाेर के अपूर्ण अजीत सिंह के स्मारक को पूर्ण करवाया।
    • इनके समय भट्‌ट हरिवंश ने ‘भीम प्रबंध’ तथा कवि रामकर्ण ने ‘अलंकार समुच्चय’ की रचना की।

    महाराजा मानसिंह (1803-1843 ई.)

    • 1803 में उत्तराधिकार युद्ध के बाद मानसिंह जोधपुर सिंहासन पर बैठे।
    • जब मानसिंह जालौर में मारवाड़ की सेना से घिरे हुए थे,
    • तब गोरखनाथ सम्प्रदाय के गुरु आयस देवनाथ ने भविष्यवाणी की, कि मानसिंह शीघ्र ही जोधपुर के राजा बनेंगे।
    • अतः राजा बनते ही मानसिंह ने आयस देवनाथ को जोधपुर बुलाकर अपना गुरु बनाया तथा वहां नाथ सम्प्रदाय के महामंदिर का निर्माण करवाया।

    गिंगोली का युद्ध

    • मेवाड़ महाराणा भीमसिंह की राजकुमारी कृष्णा कुमारी के विवाह के विवाद में जयपुर राज्य की महाराजा जगतसिंह की सेना,
    • पिंडारियों व अन्य सेनाओं ने संयुक्त रूप से जोधपुर पर मार्च, 1807 में आक्रमण कर दिया तथा अधिकांश हिस्से पर कब्जा कर लिया। परन्तु शीघ्र ही मानसिंह ने पुनः सभी इलाकों पर अपना कब्जा कर लिया।
    • सन् 1817 ई. में मानसिंह को शासन का कार्यभार अपने पुत्र छत्रसिंह को सौंपना पड़ा। परन्तु छत्रसिंह की जल्दी ही मृत्यु हो गई। सन् 1818 में 16, जनवरी को मारवाड़ ने अंग्रेजों से संधि कर मारवाड़ की सुरक्षा का भार ईस्ट इंडिया कम्पनी को सौंप दिया।

    महाराजा तख्तसिंह (1843-1873 ई.)

    • महाराजा मानसिंह के बाद तख्तसिंह जोधपुर के शासक बने।
    • तख्तसिंह के समय ही 1857 का विद्रोह हुआ जिसमें तख्तसिंह ने अंग्रेजों का साथ दिया।
    • तख्तसिंह ने ओनाड़सिंह तथा राजमल लोढ़ा के नेतृत्व में आउवा सेना भेजी।
    • आउवा के निकट बिथौड़ा नामक स्थान पर 8 सितम्बर, 1857 को युद्ध हुआ जिसमें जोधपुर की सेना की पराजय हुई।
    • तख्तसिंह ने राजपूत जाति में होने वाले कन्यावध को रोकने के लिए कठोर आज्ञाएं प्रसारित की तथा इनको पत्थरों पर खुदवाकर किलों के द्वारों पर लगवाया।
    • 1870 ई. में अंग्रेजी सरकार ने जोधपुर राज्य के साथ नमक की संधि सम्पन्न की।
    • तख्तसिंह ने अजमेर में मेयो कॉलेज की स्थापना के लिए एक लाख रुपये का चंदा दिया।
    • तख्तसिंह ने जोधपुर दुर्ग में चामुंडा मंदिर का निर्माण करवाया।

    महाराजा जसवंत सिंह द्वितीय (1873-1895 ई.)

    • महाराजा तख्तसिंह के बाद जसवंत सिंह द्वितीय जोधपुर के शासक बने।
    • इन्होंने 1892 ई. में जोधपुर में जसवंत सागर का निर्माण करवाया।
    • जसवंत सिंह द्वितीय पर नन्ही जान नामक महिला का अत्यधिक प्रभाव था।
    • इस समय स्वामी दयानंद सरस्वती जोधपुर आये थे।
    • एक दिन स्वामी जी ने जसवंत सिंह द्वितीय को नन्ही जान की पालकी को अपने कंधे पर उठाये देखा जिससे स्वामीजी नाराज हुए तथा जसवंत सिंह द्वितीय को धिक्कारा।
    • इससे नाराज होकर नन्ही जान ने महाराजा के रसोइये गौड मिश्रा के साथ मिलकर दयानंद सरस्वती को विष दे दिया।
    • इसके बाद स्वामीजी अजमेर आ गए जहाँ 30 अक्टूबर, 1883 को उनकी मृत्यु हो गई।    
    • 1873 ई. में जसवंतसिंह द्वितीय ने राज्य प्रबंध तथा प्रजाहित के लिए ‘महकमा खास’ की स्थापना की।
    • 1882 ई. में इन्होंने ‘काेर्टसरदारन’ नामक न्यायालय की स्थापना की।
    • महारानी विक्टोरिया के शासन के 50 वर्ष पूर्ण होने के उपलक्ष में जसवंत सिंह द्वितीय के प्रधानमंत्री प्रतापसिंह ने जोधपुर में जुबली कोर्ट परिसर का निर्माण करवाया।
    • जसवंत सिंह द्वितीय के समय बारहठ मुरारीदान ने ‘यशवंत यशोभूषण’ नामक ग्रंथ की रचना की।

    महाराजा सरदारसिंह (1895-1911 ई.)

    • 1895 ई. में सरदारसिंह जोधपुर के शासक बने।
    • चीन के बाॅक्सर युद्ध में सरदारसिंह ने अपनी सेना चीन भेजी तथा इस कार्य के लिए जोधपुर को अपने झंडे पर ‘चाइना-1900’ लिखने का सम्मान प्रदान किया गया।
    • 1910 ई. में सरदारसिंह ने ‘एडवर्ड-रिलीफ फण्ड’ स्थापित किया जिसमें असमर्थ लोगों के लिए पेंशन का प्रबंध किया गया। इन्होंने देवकुंड के तट पर अपने पिता जसवंत सिंह द्वितीय के स्मारक ‘जसवंत थड़ा’ का निर्माण करवाया।
    • इसी देवकुंड के तट पर जसवंत सिंह II तथा उनके बाद के नरेशों की अत्येष्टि यहाँ की जाने लगी। इनके शासनकाल में सरदार समंद तथा हेमावास बांध के निर्माण का कार्य प्रारंभ हुआ।
    • 1910 में इनके समय डिंगल भाषा की कविताओं आदि का संग्रहण करने हेतु ‘बौद्धिक रिसर्च कमेटी’ की स्थापना की गई।
    • सरदारसिंह घुड़दौड़, शिकार तथा पोलो खेलने के शौकीन थे। इनके शौक के कारण उस समय जोधपुर को ‘पोलो का घर’ कहा जाता था।

    महाराजा सुमेरसिंह (1911-1918 ई.)

    • सरदारसिंह के देहांत के बाद सुमेरसिंह जोधपुर के शासक बने।
    • इनकी आयु कम होने के कारण शासन प्रबंध के लिए रीजेंसी काउंसिल की स्थापना की गई तथा प्रतापसिंह को इसका रीजेंट बनाया गया।
    • 1912 ई. में जोधपुर में ‘चीफ कोर्ट’ की स्थापना हुई। प्रथम विश्वयुद्ध के समय महाराजा सुमेरसिंह तथा प्रतापसिंह अपनी सेना सहित अंग्रेजों की सहायता के लिए लंदन पहुँचे तथा फ्रांस के मोर्चो पर भी युद्ध करने पहुँचे।
    • सुमेरसिंह के समय ‘सुमेर कैमल कोर’ की स्थापना की गई।
    • जोधपुर के अजायबघर का नाम महाराजा सरदारसिंह के नाम पर ‘सरदार म्यूजियम’ रखा गया।

    महाराजा उम्मेद सिंह (1918-1947 ई.)

    • महाराजा सुमेरसिंह के देहांत के पश्चात उनके छोटे भाई उम्मेदसिंह जोधपुर के शासक बने।
    • इस समय उम्मेदसिंह को शासनाधिकार तो दिए गए लेकिन वास्तविक शक्तियां ब्रिटिश सरकार के अधीन थी।
    • मारवाड़ के तत्कालीन चीफ मिनिस्टर सर डोनाल्ड फील्ड को ‘डीफैक्टो रूलर ऑफ जोधपुर स्टेट’ कहा जाता था।
    • 1923 में उम्मेदसिंह के राज्याभिषेक के समय भारत के वायसराय लॉर्ड रीडिंग जोधपुर आये थे।
    • महाराजा उम्मेदसिंह ने ‘उम्मेद भवन पैलेस’ (1929-1942 ई.) का निर्माण करवाया जो ‘छीतर पैलेस’ के नाम से भी जाना जाता है।
    • इस पैलेस के वास्तुविद विद्याधर भट्टाचार्य तथा सैमुअल स्विंटन जैकब थे तथा यह ‘इंडो-कोलोनियल’ कला में निर्मित है।
    • उम्मेदसिंह ने 24 जुलाई, 1945 को जोधपुर में विधानसभा के गठन की घोषणा की।

    महाराजा हनुवंत सिंह (जून, 1947- मार्च, 1949)

    • महाराजा उम्मेदसिंह के देहांत के बाद हनुवंत सिंह शासक बने।
    • हनुवंत सिंह जोधपुर राज्य को पाकिस्तान में शामिल करने के इच्छुक थे तथा ये मुहम्मद अली जिन्ना से मिलने पाकिस्तान भी गये।
    • वी.पी. मेनन तथा वल्लभ भाई पटेल के समझाने पर हनुवंत सिंह भारतीय संघ में शामिल होने के लिए तैयार हुए।
    • 30 मार्च, 1949 को जोधपुर का संयुक्त राजस्थान में विलय कर दिया गया ।

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