हिमालय – भारत का हिमालय

दो भूखण्डों का मिलन : भारतीय उप-महाद्वीप का वर्तमान भौगोलिक स्वरूप गोंडवाना भूमि और अंगारा भूमि के मिलन की कहानी से संबंध रखता है। दक्षिणी भूखंड गोंडवाना भूमि पुराजीव महाकल्प समाप्त होने पर खंडित हो गया और उत्तरी भूखंड अंगारा भूमि की ओर धीरे-धीरे बढ़ने लगा।

इस दोनों भूखंडों के बीच विस्तृत सागर के रूप में टेथिस सागर था। महाद्वीपों का अपने स्थान से हटते रहना, दो प्लेटों का बड़े पैमाने पर झटका लगने का परिणाम है।

भारत का प्राकृतिक स्वरूप – भारत का हिमालय

कोई 20 करोड़ वर्ष पूर्व गोंडवाना भूमि के खंडित होकर उत्तर की ओर सरकने के फलस्वरूप भारत वर्तमान रूप में विकसित हुआ है। हिमालय पर्वतमाला और उत्तर के विशाल मैदान विस्तृत सागर (जिसे ‘टेथिस सागर’ नाम दिया गया है) की कोख से जन्में और विकसित हुए हैं।,इस प्रकार भारत का निर्माण टेथिस सागर और गौण्डवाना भूमि से हुआ।

भूगर्भीय संरचना का इतिहास

भूगर्भीय संरचना की दृष्टि से भारत के तीन स्पष्ट विभाग हैं और वे हैं –

प्रायद्वीपीय भारत

यह भूखंड प्राचीनतम चट्टानों का बना है। जो गोंडवाना लैंड का भाग है। हिमालय पर्वत व उससे संबंधित नवीन मोड़दार पर्वत श्रेणियां जिनमें दक्षिणी प्रायद्वीपीय भारत की अपेक्षा नयी चट्टानें हैं। थार का मरुस्थल टेथिस सागर में नदियों के तलछट के जमाव के परिणामस्वरूप बना।

सिंधु-गंगा का मैदान

इसका निर्माण हिमालय पर्वत से निकलने वाली नदियों द्वारा बहाकर लाये गये निक्षेप से हुआ है।

  • इससे स्पष्ट होता है कि भारत के तीनों भौतिक प्रदेशों का निर्माण क्रमशः एक के बाद दूसरे से हुआ है।
  • भारतीय चट्टानों के कई उपसमूह पाये जाते हैं और कुछ उपसमूहों को मिलाकर समूह का निर्माण होता है।

भारत के प्राकृतिक विभाग

प्राकृतिक या धरातलीय स्वरूप और संरचना के आधार पर भारत के चार प्रमुख प्राकृतिक विभाग हैं और वे इस प्रकार हैं –

  • उत्तरी पर्वतीय प्रदेश (हिमालय पर्वतीय प्रदेश)
  • उत्तरी मैदान व थार का मरूस्थल
  • प्रायद्वीपीय पठार
  • तटीय मैदान व द्वीप समूह
  • उत्तरी पर्वतीय प्रदेश (हिमालय पर्वतीय प्रदेश)
  • यह नवीन मोडदार पर्वतमाला है।
  • इनको बनाने में दबाव की शक्तियों अथवा समानान्तर भू-गतियों का अधिक हाथ रहा है।
  • इनको बनाने वाली परतदार चट्टानें बहुत अधिक मुड़ एवं टूट गई हैं।
  • उनमें अनेक प्रकार के मोड़, शायी मोड़, ग्रीवाखण्डीय मोड़ तथा उल्टी भ्रंशें पाई जाती है।
  • यह पर्वत अभी भी निर्माणावस्था में हैं।
  • यहां पर अनेक काल के समुद्रों में निक्षिप्त परतदार चट्टानें मिलती हैं।
  • इस श्रेणी की ढाल तिब्बत की ओर नतोदार (Concave) प्रकार की है तथा भारत की ओर उन्नत्तोदर (Convex) प्रकार की है।
  • यह विश्व की नवीनतम मोड़दार या वलित पर्वतमाला है।
  • वास्तव में, इसके पर्वत उस एक ही पर्वत समूह के अंग हैं जो यूरोप में पिरेनीज और आल्प्स से आरम्भ होकर भारत की सारी उत्तरी सीमा से होते हुए पूर्वी सीमा और उससे आगे तक फैले हुए हैं।
  • पूर्व से पश्चिम दिशा में इसकी लम्बाई 2400 किमी. है और इसकी चौड़ाई 160 से 400 किमी. के बीच पाई जाती है।
  • यह पर्वतमाला भारत के 5 लाख वर्ग किमी. क्षेत्र में विस्तृत है।
  • एशिया महाद्वीप में 6500 मी. से अधिक ऊंची 94 चोटियां हैं जिनमें से 92 चोटियां इसी पर्वतीय प्रदेश में स्थित हैं।
  • पश्चिम से पूर्व की ओर पर्वतीय भाग की चौड़ाई घटती जाती है, किन्तु ऊंचाई बढ़ती जाती है और साथ ही ढाल भी तीव्र होती जाती है।

हिमालय का वर्गीकरण तीन प्रकार से किया जाता है

भौगोलिक वर्गीकरण – Three Ranges of Himalayas

भौगोलिक आधार पर हिमालय को चार सामानान्तर भागों में बांटा जाता है –

  • बृहत हिमालय
  • मध्य हिमालय
  • उप हिमालय या शिवालिक श्रेणी
  • ट्रांस हिमालय श्रेणी

बृहत हिमालय

सबसे ऊंची व लगातार फैली यह आन्तरिक श्रेणी नंगा पर्वत से लेकर नामचा बरवा पर्वत तक फैली है।

  • इसकी लम्बाई 2400 किमी. औसत चौड़ाई 25 किमी. एवं औसत ऊंचाई 6100 मी. है।
  • इसकी ऊंचाई पश्चिम में नंगा पर्वत के रूप में 8126 मी. तथा पूर्व में नामचा वर्बा पर्वत के रूप में 7756 मी. है।
  • इसका मध्य भाग जो प्रमुखतः नेपाल देश में विस्तृत है, सबसे ऊंचा भाग है।
  • विश्व की सबसे ऊंची चोटी माउंट एवरेस्ट (8848 मी.) इसी पर्वत श्रेणी पर (नेपाल में) स्थित है।
  • हिमालय की सबसे ऊंची-ऊंची चोटियां इसी भाग में पायी जाती हैं। मुख्य चोटियां हैं –
  • माउंट एवरेस्ट (8848 मी.) नेपाल
  • गॉडविन आस्टिन (8,611) J & K (P o K)
  • कंचनजंघा (8,598 मी.) सिक्किम
  • मकालू (8,481 मी.)
  • गोसाईंनाथ (8,014)
  • इस पर्वत श्रेणी में अनेक दर्रें मिलते हैं।

दर्रा या घाटी

बोलन घाटी (पाकिस्तान) खैबर दर्रा (पाकिस्तान)क्वेटा एवं कंधार को शक्कर से जोड़ती है। पेशावर को काबुल से जोड़ता है।
जोजिला दर्रा (J & K) बुर्जिल दर्रा (J & K) बनिहाल (J & K)काराकोरम दर्रा (J & K)श्रीनगर से यारकन्द को जोड़ता है। भारत का सबसे अधिक ऊंचाई पर स्थित दर्रा है।जम्मू को कश्मीर से जोड़ता है।श्रीनगर से गिलगिट को जोड़ता है।श्रीनगर से लेह को जोड़ता है।
शिपकी दर्रा (हिमाचल प्रदेश)बड़ालापचा (हिमाचल प्रदेश)रोहतांग दर्रा (हिमाचल प्रदेश)भारत-तिब्बत मार्ग, शिमला से गार्टोक (तिब्बत) को जोड़ता है। लेह को कुलुमनाली, कैलांग से जोड़ती है।लाहोल स्फीति को लेह लद्दाख से जोड़ता है।
माना और नीति दर्रा (उत्तराखंड)लिपुलेख (उत्तराखंड)इससे मानसरोवर और कैलाश घाटी की ओर मार्ग जाता है। इससे मानसरोवर और कैलाश घाटी की ओर मार्ग जाता है।
नाथूला एवं जैलेप्ला (सिक्किम)भारत तिब्बत मार्ग, (कालिंपोंग से लहासा तक जाती है) चुम्बी घाटी से होकर जाता है।
बोमडिला दर्रा (अरूणाचल प्रदेश)यांग्याप दर्रा (अरूणाचल प्रदेश)दिफू दर्रा (अरूणाचल प्रदेश)पांगसांड दर्रा (अरूणाचल प्रदेश)भारत को चीन से जोड़ता है।भारत को चीन से जोड़ता है।भारत को चीन से जोड़ता है।भारत को म्यांमार से जोड़ता है।
तुजु दर्रा (मणिपुर)भारत को म्यांमार से जोड़ता है।

मध्य हिमालय

  • यह श्रेणी महान हिमालय के दक्षिण में उसी के समानान्तर फैली हुई है।
  • इसकी चौड़ाई 80 से 100 किमी. औसत ऊंचाई 3700 से 4500 मी. है।
  • यहां नदियां 1,000 मी. की गहराई पर बहती हैं।
  • पीरपंजाल श्रेणी इसका पश्चिम विस्तार है, जिसका कश्मीर राज्य में फैलाव मिलता है।
  • यह इसे श्रेणी की सबसे लम्बी व प्रमुख श्रेणी है।
  • झेलम और व्यास नदियों के बीच लगभग 400 किमी. की लम्बाई में लगातार फैलकर आगे यह श्रेणी दक्षिण-पूर्व दिशा में मुड़ जाती है।
  • इस श्रेणी में पीरपंजाल और बनिहाल दो प्रमुख दर्रे हैं।
  • इस श्रेणी के दक्षिण-पूर्व की ओर धौलाधार श्रेणी है, जिस पर शिमला नगर स्थित है।
  • भारत के प्रसिद्ध स्वास्थ्यवर्द्धक स्थान शिमला, मसूरी, नैनीताल, डलहौजी, दार्जिलिग आदि इसी श्रेणी के निचले भाग में स्थित हैं।
  • इस श्रेणी में स्लेट, चूना पत्थर, क्वार्टज और अन्य शिलाओं की अधिकता पायी जाती है।
  • इस भाग में कोणधारी वन मिलते हैं और ढालों पर छोटे-छोटे घास के मैदान पाये जाते हैं, जिन्हें कश्मीर में मर्ग (जैसे गुलमर्ग, सोनमर्ग) और उत्तरांचल में बुग्याल और पयार कहते हैं।
  • मध्य व महान हिमालय के बीच विशाल सीमान्त दरार (Great Boundary Fault) पायी जाती है, जो पंजाब से असम राज्य तक विस्तृत है।
  • इसमें उल्टे भ्रंश व मोड़ पाये जाते हैं।
  • विवर्तनिक दृष्टि से हिमालय प्रायः शान्त रहा हैं।
  • मध्य और महान हिमालय के बीच दो खुली घाटियां पायी जाती हैं।
  • पश्चिम में कश्मीर की घाटी, पीरपंजाल व महान हिमालय के मध्य फैली हैं एवं पूर्व में काठमांडू घाटी है, जो नेपाल में स्थित है।
  • इसके गर्भ भाग में ग्रेनाइट नीस तथा शिष्ट चट्टानें पाई जाती हैं। पार्श्व भागों में अपरदित अवसादीय चट्टानें पाई जाती है।

 उप-हिमालय या शिवालिक श्रेणी

यह उपयुक्त दोनों श्रेणियों के दक्षिण में फैली है।

  • इन्हें बाह्य हिमालय भी कहते हैं।
  • इस श्रेणी की औसत ऊंचाई 900-1500 मी. है।
  • शिवालिक को जम्मू में जम्मू पहाड़ियां तथा अरुणाचल प्रदेश में डफला, मिरी, अबोर और मिशमी पहाड़ियों के नाम से जाना जाता है।
  • यह हिमालय का सबसे नवीन भाग है जिसका निर्माण मध्य मायोसीन से निम्न प्लीस्टोसीन काल तक माना जाता है।
  • यह श्रेणी भी अपने उत्तर में मध्य हिमालय से मुख्य सीमान्त दरार द्वारा अलग होती है।
  • शिवालिक एवं मध्य हिमालय के बीच अनेक घाटियां पायी जाती है।
  • मध्यवर्ती भाग में हरी-भरी घाटियों को पूर्व में ‘द्वार’ (हरिद्वार, कोटद्वार, रामद्वार) एवं पश्चिम में ‘दून’ (देहरादून, पाटलीदून) के नाम से पुकारते हैं।
  • देहरादून, हरिद्वार ऐसे ही मैदान हैं।
  • इन घाटियों में गहन खेती की जाती है तथा ये घनी बसी हैं।

ट्रान्स हिमालय श्रेणी

यह महान हिमालय के उत्तर में या तिब्बत के दक्षिण में स्थित है।

  • कराकोरम श्रेणी को उच्च एशिया की रीढ़ भी कहा जाता है।
  • इसमें अनेक पर्वत श्रेणियां लद्दाख, जास्कर, कैलाश, कराकोरम शामिल हैं।
  • यह श्रेणी बंगाल की खाड़ी में गिरने वाली नदियों तथा उत्तर की ओर भूमि से घिरी हुई झीलों में गिरनेवाली नदियों के लिए जल-विभाजक का कार्य करती हैं।

हिमालय के दीर्घ मोड़ : हिमालय पर्वत श्रेणियों के उत्तर-पश्चिम और उत्तर-पूर्व के अंतिम छोरों के निकट दीर्घ वलन हैं जिन्हें उत्तर-पश्चिम मोड़ और उत्तरी-पूर्वी मोड़ कहा जाता है।

  • पश्चिम की ओर इन श्रेणियों का विस्तार पश्चिम-उत्तर-पश्चिम दिशा में है।
  • यहां हिमालय तेजी से मुड़कर दक्षिण-पश्चिम दिशा में सुलेमान और किरथर श्रेणी कहलाते हैं।
  • पूर्व में हिमालय दक्षिण-पश्चिम दिशा में मुड़ जाता है जहां इनके अनेक नाम हैं-पटकोई, नागा, मणिपुर, लुशाई, अराकान आदि।

हिमालय का प्रादेशिक वर्गीकरण

प्रादेशिक वर्गीकरण के आधार पर हिमालय को चार भागों में विभाजित किया जाता है –

पंजाब हिमालय

यह सिन्धु नदी से लेकर सतलज नदी तक 560 किमी. लम्बाई में फैला है।

  • इसमें जास्कर, लद्दाख, कराकोरम, पीरपंजाल एवं धौलाधार श्रेणियां शामिल हैं।
  • यह कश्मीर व हिमालय प्रदेश राज्यों में फैला है।
  • पंजाब हिमालय के दक्षिणी ढालों पर वनों की प्रधानता है, जबकि उत्तरी ढाल निर्जन, ऊबड़-खाबड़ तथा शुष्क है।
  • शुष्क होने के कारण हिम रेखा अधिक ऊंचाई पर पायी जाती है।
  • पंजाब हिमालय की मुख्य चोटियां टाटाकुटी और ब्रह्मासकल हैं तथा मुख्य दर्रे पीरपंजाल, बनिहाल, जोजीला, बुर्जिल आदि है।

कुमायूं हिमालय

इसका विस्तार सतलज नदी से काली नदी तक 320 किमी. की लम्बाई में है।

  • इस भाग की मुख्य चोटियां बद्रीनाथ, केदारनाथ, त्रिशूल, माना गंगोत्री, नन्दादेवी, कामेत और शिवलिंग हैं।
  • भागीरथी, अलकनन्दा और यमुना नदियों के उद्गम स्थान यहीं है।
  • यह उत्तरांखण्ड में फैला है।
  • नन्दादेवी कुमायूं हिमालय का सर्वोच्च शिखर है।
  • दून घाटियां शिवालिक व मध्य हिमालय के बीच स्थित हैं।
  • नैनीताल के निकट नैनीताल, भीमताल तथा सातताल झीलें स्थित हैं।
  • माना एवं नीति दर्रों द्वारा यह भाग तिब्बत के निकट है।

नेपाल हिमालय

यह 800 किमी. के विस्तार में काली नदी और तिस्ता नदी के बीच में फैले हैं।

  • इसकी औसत ऊंचाई 6,250 मी. है।
  • इस भाग में भारत की सबसे ऊंची चोटियां अन्नपूर्णा प्रथम, धौलागिरि, गोसाईनाथ, कंचनजंघा, मकालू और एवरेस्ट स्थित हैं।
  • ऊंचे भागों में मिट्टी का क्षरण होने से यहां के उच्च भाग का धरातल वनस्पतिविहीन है, किन्तु निचले भागों, ढालों व घाटियों में देवदार, स्प्रूस, फर, चीड़ आदि के कोणधारी वन मिलते हैं।
  • काठमांडू घाटी यहां की प्रमुख घाटी है।

असम हिमालय

तिस्ता नदी से ब्रह्मपुत्र नदी तक यह 750 किमी. की लम्बाई में फैला हैं।

  • इस श्रेणी की ढाल दक्षिणवर्ती मैदान की ओर बड़ा तेज हैं, किन्तु उत्तर-पश्चिम की ओर क्रमशः धीमा होती गयी है।
  • यह श्रेणी नेपाल हिमालय की अपेक्षा नीची है।
  • यह सिक्किम, असम व अरुणाचल राज्यों व भूटान देश में फैली है।
  • इस भाग की मुख्य चोटियां कुलाकांगड़ी, चुमलहारी, काबरु, जांग सांगला और पोहुनी हैं।
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