गहडवाल वंश व चन्देल वंश

गहड़वाल वंश

चन्द्रदेव ने 1080 से 1085 ई.  के मध्य गहड़वाल राजवंश की नींव रखी। इसकी राजधानी भी कन्नौज थी। यह चन्द्रवंशी थे।

चन्दद्रेव का पौत्र गोविन्द चन्द्र (1114 से 1155ई.) इस वंश का सर्वाधिक महत्वपूर्ण शासक था उसने पालों से मगध जीता।

लक्ष्मीधर प्रकाण्ड विद्वान था उसने कृत्यकल्पतरू नामक ग्रन्थ की रचना की। विजय चन्द्र (1155 से 1170ई.) के समय दिल्ली के क्षेत्र पर चौहानों ने अधिकार कर लिया।

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जयचन्द (1170 से 1194ई.) इस वंश का अंति शक्तिशाली शासक था। इसकी पुत्री संयोगिता का अपहरण दिल्ली व अजमेर के चौहान शासक पृथ्वीराज तृतीय ने किया था।

1194 ई.  में चन्दावर के युद्ध में मुहम्मद गौरी द्वारा पराजित हुआ व मारा गया। जयचन्द ने संस्कृत के प्रख्यात कवि श्री हर्ष को संरक्षण प्रदान किया। उन्होंने नेषधचरित एवं खण्डनखण्डखाद्य की रचना की।

चन्देल वंश

इस वंश के संस्थापक नन्नुक थे। जयशक्ति अथवा जेजा के नाम से यह क्षेत्र जेजाकभुक्ति भी कहलाया तथा इनकी राजधानी खजुराहो थी।

यशोवर्मन (925 से 950ई.) इस वंश का प्रथम शक्तिशाली शासक था। यशोवर्मन का पुत्र धंग (950 से 1002ई.) था इसने ही प्रतिहारों से पूर्ण स्वतंत्रता की घोषणा की।

चंदेल पूर्व मध्यकाल में हिन्दी की देवनागरी लिपि का अपने अभिलेखों में प्रयोग करने वाले प्रथम शासक थे। धंग ने खजुराहों में वैद्यानाथ एवं जिननाथ के प्रसिद्ध मंदिर बनवाए।

विद्याधर (1017 से 1029ई.) सर्वाधिक शक्तिशाली चन्देल शासक था। विद्याधर ने गुर्जर शासक राज्यपाल का सिर्फ इसलिए वध कर दिया कि उसने गजनवी का मुकाबला नहीं किया।

अंतिम चन्देल शासक परमर्दि देव परमल (1163 से 1202 ई.) था। 1202ई. कुतुबुद्दीन ऐबक ने कलिंजर पर आक्रमण कर चन्देल शक्ति को पूर्णत: समाप्त कर दिया।

चन्देल कला का केन्द्र खजुराहो था। कन्दरिया महादेव मंदिर (धंग द्वारा निर्मित),जगदम्बिका मंदिर, विष्णु का चतुर्भुज प्रसिद्ध है।

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