उत्तरी भारत का विशाल मैदान – Plains of India

उत्तरी भारत का विशाल मैदान Plains of India – लगभग 3200 कि.मी. की लम्बाई में विस्तृत यह मैदानी भाग औसतन 150-300 कि.मी. की चौड़ाई रखता है जिसका अधितम उच्चावच 291 मी. है। चूंकि यह मैदानी भाग सिंधु गंगा व ब्रह्मपुत्र नदियों के अपवाह तंत्र के द्वारा लाये गये अवसादों से निर्मित है इसीलिए सिंधु, गंगा, ब्रह्मपुत्र मैदान भी कहते हैं।

उत्तरी भारत का विशाल मैदानPlains of India

इस मैदान के पूर्वी भाग जहां आर्द्र प्रदेश है वहीं पश्चिमी भाग शुष्क रेगिस्तानों के रूप में निर्मित हो गया है। यहां तक कि थार मरुस्थल भी इसी मैदान का पश्चिमी शुष्क प्रदेश है जो इस प्रदेश में जलवायुविक परिवर्तन के कारण निर्मित हुआ है। यहां बालू के टीलों की अधिकता है। भूगर्भिक संरचना के अनुसार उत्तर के विशाल मैदानी भाग को पांच भागों में बांटकर देखा जा सकता है-

भाबर

  • यह हिमालय के पर्वतीय क्षेत्र में जलोढ़ शंकुओं व जलोढ़ पंखुओं से निर्मित मैदानी भाग हैं।
  • यहां कंकड़, पत्थर, रेत की अधिकता के कारण अत्यधिक पारगम्यता मिलती है।
  • यही कारण है नदियां यहां अंतः प्रवाही या विलुप्त हो जाती है।
  • लगभग 8-16 किमी. चौड़ाई में यह क्षेत्रीय सिंधु से तिस्ता नदी तक प्रायः अविछिन्न रूप में फैली है।

तराई

  • भाबर प्रदेश के दक्षिणी भाग व उसके समान्तर में अत्यधिक आर्द्रता मैदानी भाग व कुछ दलदली क्षेत्र है।
  • भाबर प्रदेश की विलुप्त नदियां यहां पुनः सतही प्रवाह रखती परंतु इनकी गति धीमी रहती है।
  • तराई प्रदेश अत्यधिक जैव विविधता का केन्द्र है।

बांगर

  • ये सामान्यतः उच्च मैदानी भागों में मिलते हैं जहां बाढ़ का पानी नहीं पहुंचता।
  • ये पुराने जलोढ़ों से निर्मित है तथा इसमें सामान्यतः रेत व कंकड़ की अधिकता रहती है।
  • बांगर मिट्टियों के प्रायः असमतल तथा कंकड़ वाले अधिकता वाले क्षेत्र को भूड़ कहा जाता है।
  • ये निचले भागों की तुलना में औसतन 30 मीटर की ऊंचाई रखती है।
  • निचले खादर मैदानों की तुलना में अपेक्षाकृत कम उर्वर होती है।
  • बांगर व खादर के ढांचे युक्त क्षेत्र को खोल कहा जाता है।

खादर

  • ये निम्न मैदानी भाग है जहां नदियां प्रत्येक वर्ष नवीन जलोढ़कों का जमाव करती है।
  • इनके कण अपेक्षाकृत बारीक होते हैं।
  • बांगर की तुलना में अधिक उपजाऊ मिट्टियों तथा सामान्यतः बाढ़ के मैदानों डेल्टाई क्षेत्रों में ये अपना विस्तार रखती है।
  • खादर मिट्टियां होलोसीन काल की उत्पत्ति है।

डेल्टा

जब नदियां समुद्र में जाकर गिरती हैं तो गिरते समय कई धाराओं में बंट जाती है। वह प्रदेश डेल्टा कहलाता है।

क्षेत्रीय आधार पर उत्तरी भारत का विशाल मैदान को निम्न भागों में बांटा जा सकता है-

सिंधु सतलज का मैदान

  • इनमें बांगर मिट्टियों के प्रधानता है क्योंकि यहां बाढ़ की घटनाएं नहीं होती तथा नवीन जलोढ़ों की आपूर्ति नहीं हो पाती।
  • यह मैदान अनेक दोआब में विभाजित है।
  • इनमें सिंधु सागर दोआब, सिंधु व झेलम के मध्य में है।
  • झेलम व चिनाव के मध्य छाज दोआब कहलाता है।
  • चिनाव व रावी के बीच का दोआब रेचना दोआब।
  • रावी व्यास के बीच मैदानी बारी दोआब कहलाता है।
  • व्यास व सतलज के बीच बिस्त दोआब का क्षेत्र आता है।
  • सतलज के दक्षिण में राजस्थान क्षेत्र में कभी सरस्वती नदी प्रवाहित होती थी।
  • सतलज एवं सरस्वती के बीच भी दोआब क्षेत्र थे परंतु सरस्वती के विलुप्त के बाद यह दिखाई नहीं पड़ता।
  • घग्घर-हाकरा पाट इस दोआब के अवशेष के रूप में बचे हैं।
  • पश्चिमी शुष्क प्रदेशों के भी सिंधु नदी तंत्र से जोड़कर देखा जाता है।

गंगा नदी तंत्र के मैदान

  • यह भी कई भागों में विभक्त है इनमें सबसे पश्चिमी में गंगा यमुना दोआब क्षेत्र आते हैं जिसे ट्रान्स गंगा मैदान कहा जाता है।
  • इसमें बांगर मिट्टियों की प्रधानता है ऊपरी गंगा मैदान में भी बांगर मिट्टियों की प्रधानता है मध्य गंगा मैदान में बागर के साथ खादर मिट्टियां भी मिलती है।
  • निम्न गंगा मैदान व डेल्टाई भाग पूर्णता खादर मिट्टियों से निर्मित है।
  • प्रायद्वीपीय भारत से आने वाली चम्बल, सोन, जैसी नदियां गंगा नदी तंत्र के मैदान के निर्माण में सहायक है।
  • सिंधु सतलज मैदानों से गंगा नदी तंत्र के मैदान अम्बाला के आस-पास के भूमि के द्वारा अलग होते हैं।

ब्रह्मपुत्र नदी तंत्र का मैदान

  • मुख्यतः असम व बांग्लादेश में है।
  • असम के रैम्प घाटी क्षेत्र में अवसादों के जमाव से इस मैदानी भाग का निर्माण हुआ बांग्लादेश में गंगा नदी तंत्र से मिल जाती है तथा गंगा ब्रह्मपुत्र का डेल्टा बनाती है।
  • इनके द्वारा निर्मित मैदान में खादर मिट्टियों की प्रधानता है उत्तर के विशाल मैदान भारत में अपनी उर्वर मिट्टियां के लिये विख्यात है।
  • मैदानी क्षेत्र होने के करण यहां भूमिगत जल के भंडार हैं साथ ही यहां नदियां की बहुलता है इसीलिए यहां सिंचाई का बेहतर विकास सम्भव हुआ है एवं यह कृषि के दृष्टिकोण से और अधिक उपयोगी बन सका है।
  • इस प्रकार उत्तर का विशाल मैदान व्यापक आर्थिक महत्व रखता है।
Spread the love

Leave a Comment

Your email address will not be published.

error: Content is protected !!