नगरीय स्वायत्त शासन

नगरीय स्वशासन क्या है | नगरपालिका

  • 74वें संविधान संशोधन अधिनियम के तहत संविधान में भाग IXA जोड़ा गया।
  • भाग IXA में अनुच्छेद 243P से 243ZG तक नगरीय स्वशासन का उल्लेख है।
  • इस संशोधन के तहत 12वीं अनुसूची जोड़ी गयी जिसमें 18 विषय उल्लेखित है।
  • 74वां संविधान संशोधन 1 जून, 1993 को लागू हुआ। 
  • 74वें संविधान संशोधन अधिनियम के अधीन नगर निकाय।

nagariy swashasan

विवरणनगर पंचायतनगर परिषद्नगर निगम
जनसंख्या20 हजार से एक लाखएक लाख से पाँच लाखपाँच लाख से अधिक
अध्यक्षअध्यक्ष/सभापतिसभापतिमहापौर/मेयर
उपाध्यक्षउपाध्यक्ष /उपसभापतिउपसभापतिउपमहापौर (डिप्टी मेयर)
वार्डपार्षदपार्षदपार्षद
नगर निकाय

नगरीय स्वशासन की विभिन्न संस्थाओं से संबंधित प्रावधान

  • अनुच्छेद 243(Q) में यह उल्लेखित है कि बड़े शहरों में नगर निगम, छोटे शहरों में नगर परिषद् तथा छोटे कस्बों या संक्रमणशील क्षेत्रों में नगर पंचायतों की स्थापना की जायेगी।
  • नगर निगम, नगर परिषद् एवं नगर पंचायतों को सामूहिक रूप से नगरपालिका कहते हैं।
  • किसी भी क्षेत्र में नगरपालिका की स्थापना जनसंख्या, जनसंख्या घनत्व, राजस्व की प्राप्ति, गैर-कृषि कार्य करने वाले लोग तथा उस क्षेत्र के महत्त्व के आधार पर की जाती है।

नोट – पंचायत राज संस्थाओं की स्थापना केवल जनसंख्या के आधार पर की जाती है। ग्राम पंचायतों का बजट पंचायत समिति द्वारा जबकि पंचायत समिति का बजट जिला परिषद् द्वारा पारित किया जाता है।

पंचायत राज की तीनों संस्थाएँ आपस में जुड़ी होती है। इस कारण से वे तीनों संस्थाएँ पंचायत राज के तीन स्तर है। नगरपालिकाओं की  इन तीनों संस्थाओं का आपस में कोई संबंध नहीं है।  

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अध्यक्ष का चुनाव

  • संविधान के अनुसार नगरपालिका के तीनाें संस्थाओं के अध्यक्षों का चुनाव प्रत्यक्ष होगा या अप्रत्यक्ष इसका निर्धारण राज्य विधानमंडल द्वारा किया जायेगा।

सदस्यों का निर्वाचन

  • वयस्क मताधिकार के आधार पर वार्डों से प्रत्यक्ष रूप से निर्वाचन किया जाता है।
  • शहरी स्थानीय निकाय के प्रत्येक वार्ड से एक पार्षद चुना जाता है।

सदस्यों की संख्या

  • नगरपालिका में सदस्याें की न्यूनत्तम संख्या 13 होगी।

योग्यताएँ

  • चुनाव के लिए न्यूनतम आयु 21 वर्ष हो।
  • उसका नाम उस क्षेत्र की मतदाता सूची में पंजीकृत हो।
  • निर्वाचन कानून के तहत निरर्ह घोषित नहीं किया गया हो।

उपाध्यक्ष का चुनाव

  • निर्वाचित पार्षदों द्वारा अपने में से ही बहुमत से पारित कर अप्रत्यक्ष चुनाव द्वारा उपाध्यक्ष का चुनाव करेंगे।

कार्यकाल [अनुच्छेद 243 (U)]

  • प्रत्येक नगरीय स्थानीय निकाय का कार्यकाल 5 वर्ष होगा। इन संस्थाओं की पहली बैठक से 5 वर्ष अवधि प्रारम्भ होती है। 

विघटन

  • किसी निकाय के विघटन की स्थिति में विघटन की तिथि से 6 माह में चुनाव कराने आवश्यक है लेकिन केवल 6 माह की अवधि शेष है तो चुनाव सामान्य चुनाव के साथ होंगे।
  • पुनर्गठित निकाय शेष अवधि के लिए ही कार्य करेगा।

आरक्षण [अनुच्छेद 243 (T)]

  • सभी पदों पर सभी वर्गों में 1/3 स्थान महिलाओं के लिए आरक्षित है जो क्रमिक रूप से रोटेशन द्वारा निर्धारित किये जाते हैं।
  • SC/ST के लिए उनकी जनसंख्या के अनुपात में स्थान आरक्षित होंगे।

नाेट –  राज्य सरकार ने पिछड़े वर्गों के लिए उनकी जनसंख्या के अनुपात में स्थान आरक्षित कर सकते हैं। अनुसूचित जाति का आरक्षण अरूणाचल प्रदेश में लागु नहीं होता है।

निरर्हताएं [अनुच्छेद 243 (V)]

  • अनुच्छेद 243(V) के तहत चुने जाने पर या नगरपालिका के चुने हुए सदस्य निम्न स्थितियों में निरर्ह घोषित किए जा सकते हैं–
  1. संबंधित राज्य के विधानमंडल के निर्वाचन के प्रयोजन हेतु प्रचलित किसी विधि के अंतर्गत।
  2. राज्य विधान द्वारा बनाए गई किसी विधि के अंतर्गत।

कार्य [अनुच्छेद 243 (W)]

  • अनुच्छेद 243 (W) के अन्तर्गत इन संस्थाओं के लिए 18 कार्य निर्धारित किये गये है। इन 18 कार्यों में से कितने कार्य नगरपालिका को देने है। यह राज्य विधानमंडल पर निर्भर है।
    नोट – 11वीं अनुसूची में 29 कार्य उल्लेखित है इनमें से 23 कार्य राजस्थान में पंचायती राज संस्थान को दिये जा चुके हैं।

राज्य निर्वाचन आयेाग [अनुच्छेद 243 (ZA)]

  • अनुच्छेद 243 (ZA) के अन्तर्गत राज्य निर्वाचन आयोग नगरपालिकाओं के चुनाव करवाने तथा मतदाता सूचियों को तैयार करने का कार्य करता है।  

नोट – अनुच्छेद 243 (X) के तहत नगरपालिकाओं को भी कर लगाने का अधिकार है।

वित्त आयोग [अनुच्छेद 243 (Y)]

  • अनुच्छेद 243 (Y) के अधीन गठित वित्त आयोग नगरपालिकाओं की वित्तीय स्थिति का भी पुनरवलोकन करेगा। 

जिला योजना समिति [अनुच्छेद 243 (ZD)]

  • इसके तहत प्रत्येक राज्य में जिला स्तर पर जिले में पंचायतों और नगरपालिकाओं द्वारा तैयार की गई योजनाओं के समेकन करने और संपूर्ण जिले के लिए एक विकास योजना प्रारूप तैयार करने के लिए एक जिला योजना समिति का गठन किया जाएगा।
  • अनुच्छेद 243 (ZD) के तहत इसकी संरचना का निर्धारण राज्य विधानमंडल द्वारा किया जायेगा।
  • संविधान में जिला योजना समिति के सदस्य संख्या का उल्लेख नहीं है।
  • राजस्थान पंचायत राज अधिनियम 1994 के अनुसार प्रत्येक जिला योजना समिति में 25 सदस्य होंगे।
  • अनुच्छेद 243 (ZD) के अनुसार प्रत्येक जिला योजना समिति के 4/5 सदस्य निर्वाचित होंगे। इनका निर्वाचन जिला स्तर की पंचायत (जिला परिषद्) तथा उस जिले की नगरपालिका के सदस्यों द्वारा किया जायेगा।
  • प्रत्येक जिला योजना समिति में सदस्य संख्या के अनुपात का निर्धारण उस जिले की ग्रामीण एवं शहरी जनसंख्या के अनुपात में किया जाता है।
  • अनुच्छेद 243 (ZD) के अनुसार प्रत्येक जिला योजना समिति में 4/5 सदस्य निर्वाचित होने के कारण राजस्थान के प्रत्येक जिला योजना समिति में 20 सदस्य निर्वाचित होते हैं शेष 5 सदस्य के संदर्भ में व्यवस्था निम्न प्रकार से है-
  1. पदेन सदस्य – 03 (जिला का जिलाधिश, जिला परिषद् के मुख्य कार्यकारी अधिकारी, जिला परिषद् के अतिरिक्त मुख्य कार्यकारी अधिकारी)
  2. मनोनित सदस्य – 02 (राज्य सरकार द्वारा उस जिले सांसद या विधायकों में से 2 सदस्य मनोनित किये जाते हैं। )
  • राजस्थान के प्रत्येक जिला योजना समिति में जिला प्रमुख अध्यक्ष होता है। 2004 से पूर्व जिला प्रमुख जिला योजना समिति का पदेन सदस्य होता था जबकि जिलाधीश इसका अध्यक्ष होता था। 2004 से पूर्व जिला प्रमुख अपना इस्तीफा जिलाधीश को देता था लेकिन 2004 से जिला प्रमुख जिला योजना समिति का अध्यक्ष बनाये जाने के बाद को अपना इस्तीफा संभागीय आयुक्त को देता है।

महानगर योजना समिति [अनुच्छेद 243 (ZE)]

  • अनुच्छेद 243(ZE) के अनुसार महानगर क्षेत्र में सम्पूर्ण महानगर क्षेत्र के लिए विकास योजना प्रारूप तैयार करने के लिए एक महानगर योजना समिति का गठन किया जायेगा।
  • सन् 1959 में राजस्थान नगरपालिका अधिनियम 1959 बनाया गया था।  
  • 1 जून 1993 को 74वां संविधान संशोधन 1992 लागू हुआ जिसके द्वारा स्थानीय शासन की संस्थाओं को संवैधानिक दर्जा दिया गया।
  • राज्य सरकार का स्वायत्त शासन विभाग, समस्त शहरी स्वशासन संस्थाओं के नियंत्रण, निर्देशन एवं समन्वय का कार्य करता है।
  • 74वाँ संविधान संशोधन लागू होने के बावजूद भी 1959 का कानून राजस्थान में लागू रहा। सन् 2009 में 1959 के कानून को समाप्त कर राजस्थान नगरपालिका अधिनियम 2009 बनाया गया।

नगर निगम (Municipal Corparation)

  • 5 लाख से अधिक जनसंख्या वाले नगर, स्थानीय स्वशासन संस्थाओं में नगर निगम कहलाते हैं।
  • इसमें पार्षद, महापौर, उपमहापौर, मनोनीत पार्षद एवं नगर निगम के आयुक्त शामिल होते हैं।
  • अध्यक्ष महापौर/मेयर कहलाता है।
  • राज्य में वर्तमान में 7 नगर निगम है- जयपुर, जोधपुर, कोटा, अजमेर, बीकानेर, भरतपुर, उदयपुर।
  • राजस्थान में SC/ST एवं अन्य पिछड़ा वर्ग का निगम क्षेत्र में उनकी जनसंख्या के अनुपात में आरक्षण का प्रावधान है।
  • महापौर के पद पर भी आरक्षण किया गया है।
  • चुंगीकर वसूली, गृहकर, यूडी टैक्स, भूमि निलामी रोड कंटिग से, विज्ञापन होर्डिग्स आदि से नगर निगम के आय के स्रोत है।

नोट – अक्टूबर 2019 में जयपुर, जोधपुर तथा कोटा नगर निगम को दो-दो भागों में बांट दिया जाने का आदेश सरकार ने दिया है।   

नगर परिषद् (Municipal Council)

  • एक लाख से अधिक तथा 5 लाख तक की आबादी वाले शहरों में स्थानीय स्वशासन संस्था नगर परिषद् कहलाती है।
  • इसमें सभापति, उपसभापति, मनोनित पार्षद् व अधिशाषी अधिकारी शामिल होते हैं।
  • नगर परिषदों में एक निर्वाचित ‘परिषद्’ होती है जो जनता के द्वारा वयस्क मताधिकार के आधार पर चुनी जाती है।
  • यह परिषद् नगरीय क्षेत्र में कानून और नियम बनाने के अधिकृत होती  है और नगर के शासन की नीति का निर्धारण इसी निकाय के द्वारा किया जाता है।
  • परिषद् अपने ही सदस्यों में से एक व्यक्ति को अपना अध्यक्ष चुनती है।

नगर पंचायत (नगरपालिका बोर्ड)  

  • संक्रमणकालीन क्षेत्रों के लिए 74वें संविधान संशोधन में “नगर पंचायत” के गठन का प्रावधान किया गया था किन्तु राजस्थान राज्य में प्रदेश में सबसे छोटे कस्बों अथवा संक्रमणकालीन क्षेत्रों में नगर पंचायत गठित न कर नगरपालिका बोर्ड, श्रेणी द्वितीय, तृतीय और चतुर्थ गठित किए है।
  • इसमें पार्षद, अध्यक्ष, उपाध्यक्ष, मनोनीत पार्षद तथा अधिशाषी अधिकारी शामिल होते हैं।
  • नगर परिषद की भांति ही नगरपालिका बोर्ड में भी जनता द्वारा प्रत्यक्ष रुप से निर्वाचित एक परिषद् बोर्ड होती है जो निर्वाचन के बाद अपने में से ही एक सदस्य का अध्यक्ष के रूप में चुनाव करती है।
  • नगरपालिका बोर्ड ऐसे क्षेत्रों में स्थापित किए जाएंगे जिनमें जनसंख्या 1 लाख से कम हो।
  • इन्हें संख्या के आधार पर तीन श्रेणियों में बांटा गया है-
  1. नगरपालिका बोर्ड द्वितीय श्रेणी – 50 हजार से 1 लाख
  2. नगरपालिका बोर्ड तृतीय श्रेणी – 25 हजार से 50 हजार
  3. नगरपालिका बोर्ड चतुर्थ श्रेणी – 25 हजार से कम जनसंख्या।
  1. तीनों संस्थाओं में कोई पदेन सदस्य नहीं होता है।
  2. राज्य सरकार प्रत्येक नगर निगम में 6, प्रत्येक नगर परिषद् में 5 तथा नगर पंचायत में 4 सदस्यों केा मनोनीत करती है।
  3. मनोनीत पार्षदों को भी मत देने का अधिकार होता है लेकिन अध्यक्ष एवं उपाध्यक्षों के चुनाव तथा उनके विरूद्ध लाये गये अविश्वास प्रस्ताव में उन्हें मत देने का अधिकार नहीं होता है।
  4. मनोनीत पार्षद के लिये यह आवश्यक है कि वह संबंधित नगरपालिका का मतदाता हो।
  5. राजस्थान नगरपालिका अधिनियम 1959 के तहत 1994 से 2009 तक इन तीनों संस्थाओं के अध्यक्षों को चुनाव पार्षदों द्वारा अपने में से होता था (अप्रत्यक्ष रूप से) लेकिन 2009 के नये कानून से इन तीनों संस्थाओं के अध्यक्षों का चुनाव मतदाताओं द्वारा प्रत्यक्ष रूप किये जाने का प्रावधान किया गया।
  6. वर्ष 2015 से यह व्यवस्था समाप्त कर तीनों संस्थाएँ के अध्यक्षों का चुनाव पुन: अप्रत्यक्ष रूप से करना प्रारम्भ किया गया है।
  7. तीन संस्थाओं की बैठक 60 दिनों में एक बार अनिवार्य है।
  8. इन तीन संस्थाओं की गणपूर्ति 1/3 होती है।
  9. अविश्वास प्रस्ताव की प्रक्रिया पंचायती राज संस्थाओं के भाँति ही है।
  10. तीनों संस्थाओं के अध्यक्ष, उपाध्यक्ष तथा पार्षद अपना इस्तीफा जिलाधीश को देते हैं।
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