संविधान के प्रमुख संशोधन

प्रथम संशोधन, 1951 में समानता, स्वतंत्रता तथा सम्पत्ति के मौलिक अधिकार से संबंधित अड़चनों से निपटने के लिए किया गया। इस संशोधन द्वारा शिक्षा व सामाजिक क्षेत्र में पिछड़ी जातियों से विशेष व्यवहार का प्रावधान किया गया तथा संविधान में नवीं अनुसूची जोड़ दी गई।

5वें संशोधन, 1955 में राज्यों के क्षेत्रों व सीमाओं को प्रभावित करने वाले किसी भी केन्द्रीय कानून के बारे में मत व्यक्त करने की समय सीमा निश्चित करने का अधिकार राष्ट्रपति को प्रदान किया।

7वें संशोधन, 1956 में राज्य पुनर्गठन आयोग (States Reorganisation Commission) का गठन भाषा के आधार पर राज्यों के पुनर्गठन संबंधी सिफारिशों को लागू करने के उद्देश्य से किया गया। इस संशोधन द्वारा संविधान की प्रथम व चौथी अनुसूची में भी कुछ परिवर्तन किए गए। (प्रथम राज्य आंध्रप्रदेश)

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भारत के संविधान का संशोधन

10वें संशोधन द्वारा जो कि 1961 में हुआ, दादर तथा नगर हवेली के क्षेत्रों को भारत के संघ में सम्मिलित किया गया।

12वें संशोधन, 1962 द्वारा गोवा, दमन तथा दीव के क्षेत्रों को भारत के संघ में सम्मिलित किया गया।

13वें संशोधन, 1962 द्वारा नागालैण्ड के लिए विशेष प्रावधान जोड़े गए तथा उसे राज्य का रुतबा प्रदान किया गया।

14वें संशोधन, 1963 द्वारा भूतपूर्व फ्रांसीसी क्षेत्र पांडिचेरी को भारत के संघ में सम्मिलित किया गया। इस संशोधन द्वारा संघीय क्षेत्र हिमाचल प्रदेश, मणिपुर, त्रिपुरा, गोवा, दमन और दीव तथा पांडिचेरी में विधानमंडल तथा मंत्री परिषद प्रदान किए गए।

15वें संशोधन, 1963 द्वारा उच्च न्यायालय के न्यायाधीशों की अवकाश प्राप्ति की आयु को 60 से बढ़ाकर 62 वर्ष कर दिया तथा अवकाश प्राप्त न्यायाधीशों की उच्च न्यायालय में नियुक्ति का प्रावधान किया गया।

16वें संशोधन, 1963 द्वारा देश की प्रभुता तथा अखंडता के हित में नागरिकों के मौलिक अधिकारों पर कुछ प्रतिबंध लगाए गए। इस संशोधन द्वारा संविधान की तीसरी अनुसूची में दिए गए शपथ के फार्म में परिवर्तन किया गया तथा इसमें यह शब्द जोड़ दिए गए “मैं भारत की प्रभुता तथा अखंडता अक्षुण्ण रखूंगा।“

18वें संशोधन, 1966 द्वारा पंजाब का पुनर्गठन किया गया तथा इसे भाषा के आधार पर दो राज्यों-पंजाब तथा हरियाणा में विभक्त किया गया। इस संशोधन द्वारा कुछ क्षेत्र हिमाचल प्रदेश को भी स्थानांतरित किए गए तथा संघीय राज्य चंडीगढ़ की स्थापना की गई।

19वें संशोधन, 1966 द्वारा चुनाव आयोग की शक्तियों में परिवर्तन किया गया तथा उच्च न्यायालय को चुनाव संबंधी याचिकाएं सुनने का अधिकार प्रदान किया गया।

20वें संशोधन, 1966 द्वारा उन सभी जिला न्यायाधीशों की नियुक्ति, पदोन्नति और उनके द्वारा दिए गए निर्णयों को वैध घोषित कर दिया भले ही वह संविधान के अनुच्छेद 233 अथवा 235 के विपरीत रहे हों। यह प्रावधान उच्च न्यायालय द्वारा निम्न अदालतों पर नियंत्रण इत्यादि से संबंधित है।

24वें संशोधन, 1971 द्वारा संसद के संविधान में, मौलिक अधिकारों सहित सभी भागों में संशोधन करने के अधिकार को पुनः दोहराया गया। इस संशोधन द्वारा स्पष्ट कर दिया गया कि संशोधन पर राष्ट्रपति की स्वीकृति स्वाभाविक (Automatic) मानी जाएगी। इस प्रकार इस संशोधन द्वारा संसद पर सर्वोच्च न्यायालय द्वारा गोलक नाथ के मामले में दिए गए निर्णय के फलस्वरूप लगाए गए उस प्रतिबंध को समाप्त करने का प्रयास किया गया जिसके अन्तर्गत संसद को संविधान में संशोधन करने के अधिकार से वंचित किया गया था।

26वें संशोधन, 1971 द्वारा भूतपूर्व देशी रियासतों के शासकों की उपाधियों व विशेषाधिकारों को समाप्त कर दिया गया।

28वें संशोधन, 1971 द्वारा आई.सी.एस. अधिकारियों के विशेष अधिकारों तथा सुविधाओं को समाप्त कर दिया गया तथा संसद को उनकी सेवा शर्त़ें निर्धारित करने का अधिकार प्रदान किया गया।

31वें संशोधन, 1973 द्वारा लोकसभा की सीटें 525 से बढ़ा कर 545 कर दी गई तथा संघीय क्षेत्रों के प्रतिनिधियों की संख्या 25 से घटा कर 20 कर दी गई।

33वें संशोधन, 1974 द्वारा संसद व राज्य विधान सदस्यों द्वारा दबाव में आकर अथवा जबरदस्ती में दिए गए त्यागपत्रों को अस्वीकार करने का अधिकार सदन के अध्यक्ष को दिया गया। वह इन त्यागपत्रों को तभी स्वीकार करेंगे यदि वह स्वेच्छा से दिए गए हैं तथा वास्तविक हैं।

36वें संशोधन, 1975 द्वारा सिक्किम को एक पूर्ण राज्य का दर्जा प्रदान किया गया।

38वें संशोधन, 1975 ने प्रावधान किया कि राष्ट्रपति, राज्यपाल तथा संघीय क्षेत्रों के प्रशासन अध्यक्षों द्वारा की गई संकटकाल घोषणा मानी जाएगी तथा उसे किसी कानूनी अदालत में चुनौती नहीं दी जा सकती। इस संशोधन द्वारा राष्ट्रपति को अधिकार प्रदान किया गया कि वह विभिन्न आधारों पर संकटकाल की घोषणा कर सकता है।

41वें संशोधन, 1976 द्वारा राज्य के लोक सेवा आयोग के सदस्यों के अवकाश प्राप्त करने की आयु को 60 वर्ष से बढ़ाकर 62 वर्ष कर दिया गया।

42वें संशोधन, 1976 संविधान का सबसे विस्तृत संशोधन तथा इसके द्वारा बहुत से महत्वपूर्ण परिवर्तन किए गए। इस संशोधन द्वारा किए गए कुछ परिवर्तन इस प्रकार थे-

संविधान के संशोधन

  • इस संशोधन ने संविधान की प्रस्तावना में ‘समाजवादी पंथनिरपेक्ष और अखण्डता’शब्द जोड़े।
  • इसने प्रावधान किया कि नीति-निर्देशक सिद्धान्तों को कार्यांवित करने के लिए बनाए गए कानून को न्यायपालिका इस आधार पर असंवैधानिक घोषित नहीं करेगी कि इससे किसी मौलिक अधिकार का उल्लंघन हुआ है।
  • इसके द्वारा संविधान में 10 मौलिक कर्त्तव्यों की सूची जोड़ी गई।
  • इसने संविधान के संशोधन के मामले में संसद के प्रभुत्व को स्वीकारा।
  • इसने उच्च न्यायालय व सर्वोच्च न्यायालय की परमादेश ;लेखद्ध जारी करने तथा न्यायिक पुनर्विलोकन की शक्तियों को सीमित करने का प्रयास किया।
  • इसने 1971 की जनगणना के आधार पर संसद तथा विधानसभा की सीटों को 2001 तक सीमित कर दिया।
  • संशोधन द्वारा लोकसभा व विधान सभाओं का कार्यकाल पांच वर्ष से बढ़ाकर 6 वर्ष कर दिया गया।
  • इसके द्वारा राष्ट्रपति के लिए मंत्री परिषद के परामर्श पर कार्य करना अनिवार्य बना दिया गया।
  • इस संशोधन के द्वारा वन, शिक्षा, जनसंख्या नियंत्रण इत्यादि विषयों को राज्य सूची से समवर्ती सूची में स्थानांतरित कर दिया गया।
  • गति व मजबूती से न्याय प्रदान करने के उद्देश्य से प्रशासनिक अधिकरणों की स्थापना की गई।
  • कानून व व्यवस्था की गम्भीर स्थिति से निपटने के लिए संघीय सरकार को किसी भी राज्य में सशस्त्र सेनाओं को तैनात करने का अधिकार प्रदान किया गया।
  • संसद को राष्ट्र-विरोधी गतिविधियों से निपटने के लिए कानून बनाने का अधिकार प्रदान किया गया। इस प्रकार संसद द्वारा बनाए गए कानूनों को मौलिक अधिकारों पर प्राथमिकता प्रदान की गई।

44वें संशोधन, 1978 द्वारा 42वें संशोधन द्वारा किए गए कई परिवर्तनों को समाप्त कर दिया गया। इसने संकटकाल प्रावधानों में इस उद्देश्य से परिवर्तन किए कि भविष्य में उनका दुरुपयोग न हो सके। इस संशोधन ने उच्च न्यायालय तथा सर्वोच्च न्यायालय को वह शक्तियां व कार्यक्षेत्र फिर से बहाल कर दिया जो उन्हें 42वें संशोधन से पूर्व प्राप्त थीं। इसने सम्पत्ति के अधिकार को मौलिक अधिकारों की सूची से हटा दिया। इसने केन्द्र सरकार को गम्भीर स्थिति से निपटने के लिए सशस्त्र सेनाएं भेजने के अधिकार से वंचित कर दिया।

52वें संशोधन, 1985 द्वारा जो कि संसद में एक मत से पारित किया गया, राजनैतिक दल-बदल को रोकने का प्रयास किया गया। इस संशोधन के अनुसार किसी भी संसद अथवा राज्य विधान सभा के सदस्य को अयोग्य घोषित किया जा सकता है यदि वह उस दल को जिसके टिकट पर उसने चुनाव लड़ा है, छोड़ देता है। परन्तु इस संशोधन के अन्तर्गत यह व्यवस्था की गई कि सदस्यों का समूह दल छोड़ सकता है तथा दल में विभाजन कर सकता है। इस संशोधन द्वारा संविधान में एक नई अनुसूची (दसवीं) जोड़ी गई जिसमें दल-बदल के आधार पर सदस्यों को अयोग्य घोषित करने का प्रावधान है।

56वें संशोधन, 1987 के द्वारा गोवा को राज्य का दर्जा प्रदान किया गया।

59वें संशोधन, 1988 ने संघीय सरकार और पंजाब में राष्ट्रपति शासन की अवधि को दो वर्ष और बढ़ाने का अधिकार प्रदान किया। इसने केन्द्र सरकार को पंजाब में आन्तरिक गड़बड़ी के आधार पर आपातकाल की घोषणा करने का अधिकार दिया। यहां यह स्पष्ट कर देना आवश्यक है कि 1978 में 44वें संशोधन द्वारा केन्द्र को इस शक्ति से वंचित कर दिया गया था।

61वें संशोधन, 1988 ने लोक सभा व राज्य सभा के चुनाव के लिए मतदान की आयु को 21 वर्ष से घटाकर 18 वर्ष कर दिया।

69वें संशोधन, 1991 द्वारा दिल्ली में एक 70 सदस्यीय विधान सभा तथा 7 सदस्यीय मंत्री परिषद की व्यवस्था की गई तथा इसे राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र घोषित कर दिया गया।

70वें संशोधन, 1992 द्वारा पांडिचेरी की विधान सभा तथा दिल्ली की प्रस्तावित विधान सभा के सदस्यों को राष्ट्रपति के चुनाव में भाग लेने का अधिकार प्रदान किया गया।

73वें संशोधन, 1992 द्वारा ग्राम तथा अन्य स्तरों पर ग्रामीण पंचायते स्थापित करने का संवैधानिक आश्वासन दिया गया। पंचायत की सभी सीटों का निर्वाचन प्रत्यक्ष रूप से कराने की व्यवस्था तथा अनुसूचित जातियों व जनजातियों के लिए स्थान सुरक्षित करने इत्यादि की व्यवस्था की गई।

संशोधन द्वारा पंचायत की अवधि 5 वर्ष निश्चित की गई और अवधि पूरी होने पर इसके अनिवार्य रूप से चुनाव करने की व्यवस्था की गई। इस संशोधन द्वारा संविधान में 11वीं अनुसूची जोड़ी गई जिसमें 29 विषय हैं, जिन पर पंचायत का प्रशासनिक नियंत्रण होगा।

74वें संशोधन, 1992 द्वारा संविधान में शहरी स्थानीय संस्थाओं से सम्बन्धित एक नया भाग जोड़ा गया। इस भाग में नगर पालिकाओं (Municipalities) के गठन, चुनावों, अवधि, शक्तियों तथा उत्तरदायित्व का उल्लेख किया गया। प्रत्येक नगरपालिका में अनुसूचित जातियों, जनजातियों, स्त्रियों तथा पिछड़े वर्ग़ों के लिए स्थान सुरक्षित किए गए। इस संशोधन द्वारा संविधान में 12वीं अनुसूची जोड़ी गई जिसमें कुल 18 विषय हैं जिन पर नगरपालिकाओं का पूर्ण प्रशासनिक नियंत्रण है।

75वें संशोधन, 1994 द्वारा संविधान के अनुच्छेद 223-ख में परिवर्तन किया गया। इस संशोधन द्वारा मकान मालिक तथा किराएदारों से सम्बन्धित मुकदमों की सुनवाई के लिए एक न्यायाधिकरण स्थापित करने की व्यवस्था की गई।

77वें संशोधन, 1995 ने सर्वोच्च न्यायालय द्वारा मंडल कमीशन के मामले में दिए गए उस निर्णय के प्रभाव को समाप्त कर दिया जिसमें न्यायालय ने मत व्यक्त किया था कि पदोन्नति के मामले में संरक्षण नहीं किया जा सकता। संशोधन ने अनुच्छेद 16 में धारा 4(क) जोड़ दी जिसके अन्तर्गत राज्य को सरकारी पदों में उन्नति के मामले में अनुसूचित जातियों तथा जनजातियों के लिए स्थान सुरक्षित रखने का अधिकार मिल गया।

78वें संशोधन, 1995 द्वारा विभिन्न राज्यों द्वारा पारित 28 भूमि सुधार अधिनियमों को संविधान की नवीं अनुसूची में जोड़ दिया गया ताकि उन्हें अदालत में चुनौती न दी जा सके। इन अधिनियमों को नवीं सूची में जोड़े जाने के पश्चात् इन अधिनियमों की कुल संख्या 284 हो गई।

82वें संशोधन, 2000 द्वारा अनुसूचित जातियों व अनुसूचित जनजातियों के लिए किए गए पदों में नियुक्ति व उन्नति के लिए प्राप्त अंकों में छूट को बहाल कर दिया गया। इससे पहले 1996 में सर्वोच्च न्यायालय ने एक निर्णय द्वारा इस छूट को इस आधार पर रद्द कर दिया था कि संविधान के अनुच्छेद 335 द्वारा दिए गए आदेश के कारण अनुच्छेद 16(4) के अन्तर्गत संरक्षण सम्भव नहीं है।

83वें संशोधन, 2000 द्वारा अनुच्छेद 243.ड के अन्तर्गत अरुणाचल प्रदेश को छूट दी गई कि वह ग्रामीण पंचायतों में अनुसूचित जातियों के लिए स्थान सुरक्षित करने के लिए बाध्य नहीं है क्योंकि उस राज्य में इस सामाजिक वर्ग का कोई व्यक्ति नहीं है। इसके स्थान पर संशोधन द्वारा इसमेंएक नई धारा (3।) जोड़ दी गई जिसमें व्यवस्था थी कि सीटों के संरक्षण से संबंधित अनुच्छेद 343 अरुणाचल प्रदेश पर लागू नहीं होगा।

84वें संशोधन, 2001 द्वारा लोक सभा व विधान सभाओं के सदस्यों की संख्या को वर्तमान सदस्य संख्या पर आने वाले 25 वर्ष़ों (यानि कि 2026) तक सीमित कर दिया गया।

85वें संशोधन, 2002 द्वारा सरकारी सेवा में रत अनुसूचित जातियों व जनजातियों के कर्मचारियों को 1995 के आरक्षण नियमों के अनुसार पदोन्नति के लाभ प्रदान किए। इस संशोधन ने अनुसूचित जातियों व अनुसूचित जनजातियों के सरकारी, कर्मचारियों को आरक्षण नियमों के अन्तर्गत ‘अनुवर्ती वरिष्ठता’ के आधार पर पदोन्नति देने की व्यवस्था की।

86वें संशोधन, 2002 द्वारा निःशुल्क व अनिवार्य प्राथमिक शिक्षा को एक मौलिक अधिकार घोषित किया गया। इस संशोधन द्वारा प्रावधान किया गया कि सरकार 6 से 14 वर्ष की आयु के बच्चों के लिए निःशुल्क व अनिवार्य शिक्षा की व्यवस्था करेगी। इसके अतिरिक्त माता-पिता को भी बाध्य किया गया कि वह अपने बच्चों को स्कूल भेजें। इस उद्देश्य से इसे संविधान के मौलिक कर्त्तव्यों की सूची में जोड़ दिया गया। इसके अतिरिक्त संशोधन ने राज्य को आदेश दिया कि जब तक शिशु 6 वर्ष के नहीं हो जाते उनकी प्रारम्भिक देखभाल और शिक्षा सुनिश्चित करना उसका उत्तरदायित्व होगा।

87वें संशोधन, 2003 ने लोकसभा तथा राज्यों की विधानसभा के निर्वाचन क्षेत्रों को 2001 की जनगणना के आधार पर सीमांकन करने का निर्णय लिया। इस संशोधन द्वारा चुनाव क्षेत्रों को, जिसमे अनुसूचित जातियों तथा अनुसूचित जनजातियों के सुरक्षित क्षेत्र भी सम्मिलित हैं, 2001 की जनगणना के आधार पर समायोजन करने की व्यवस्था की गई। परन्तु ऐसा करते समय राज्यों की विधायिकाओं में प्रदान की गई सीटों की संख्या में कोई परिवर्तन करने की अनुमति नहीं दी गई।

89वें संशोधन, 2003 द्वारा अनुसूचित जनजातियों के लिए एक राष्ट्रीय आयोग का गठन करने का प्रयोजन किया गया। इस आयोग में एक सभापति, एक उप-सभापति तथा तीन अन्य सदस्य होंगे जिनकी नियुक्ति राष्ट्रपति द्वारा की जाएगी।

91वें संशोधन, 2003 दल-बदल करने वाले सदस्यों द्वारा सार्वजनिक पद जैसे कि मंत्री तथा अन्य वैतनिक राजनीतिक पद पर बने रहने पर विधानसभा की शेष अवधि अथवा नए चुनाव हो जाने तक प्रतिबन्ध लगाता है। इस संशोधन ने केन्द्र तथा राज्य स्तर की मंत्री परिषद की सीमा को संसद अथवा विधानसभा की कुल सदस्य संख्या के 15 प्रतिशत तक रखने का प्रावधान किया। परन्तु छोटे राज्य जैसे सिक्किम, मिजोरम तथा गोवा जिनकी विधान सभाओं की संख्या 32 से 40 तक है, की मंत्री परिषदों की संख्या जिसमें मुख्य मंत्री भी शामिल है, 12 निर्धारित की गई है।

92वें संशोधन, 2004 द्वारा संविधान की आठवीं अनुसूची में चार नई भाषाऐं-बोडो, डोगरी, मैथिली तथा संथाली-सम्मिलित की गई। इसके फलस्वरूप आठवीं अनुसूची में दी गई कुल भाषाओं की संख्या 22 हो गई।

93वें संशोधन, 2005 के द्वारा उच्च शिक्षण संस्थाओं में सामाजिक व शैक्षिक दृष्टि से पिछड़े हुए वर्ग़ों के लिए आरक्षण प्रदान किया गया है।

94वाँ संशोधन – इसके अन्तर्गत झारखण्ड, छत्तीसगढ़, मध्यप्रदेश और औड़िसा राज्य में एक कल्याण मंत्री की अनिवार्य नियुक्ति का प्रावधान किया गया।

95वाँ संशोधन – अनुसूचित जाति-जनजाति के आरक्षण की सीमा बढ़ाकर 70 वर्ष की गई है।

96वाँ संशोधन – उड़ीसा में बोली जाने वाली ‘उड़िया’ भाषा का नाम बदलकर ‘ओड़िया’ किया गया है।

97वाँ संशोधन – सहकारी संस्थाओं का प्रावधान किया गया है।

98वाँ संशोधन – इसके द्वारा अनुच्छेद 371श्र जोड़ा गया। जिसमें कर्नाटक के जिलों व हैदराबाद के लिये विशेष प्रावधान है।

99वाँ संशोधन – राष्ट्रीय न्यायिक नियुक्ति आयोग का प्रावधान।

100वाँ संशोधन – बांग्लादेश के साथ सीमा का पुनः निर्धारण किया गया।

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