पंचायती राज दल एवं समितियाँ

दल एवं समितियाँ

अशोक मेहता समिति (1977)

  • 1978 में अपनी रिपोर्ट दी।
  • द्विस्तरीय पंचायती राज होगा, जिसमें जिला परिषद् एवं मण्डल पंचायत नामक दो स्तर होंगे।
  • 15 से 20 हजार आबादी के लिए एक मण्डल पंचायत का गठन होगा।
  • समिति ने जिला स्तर को सर्वाधिक महत्व दिया तथा इसे जनपद स्तर पर योजनाओं के निर्माण के लिए उत्तरदायी और कार्यकारी निकाय के रूप में माना।
  • पंचायतो के चुनाव में सभी स्तरों पर राजनीतिक दलों की भागीदारी को औपचारिक मंजूरी दे दी जानी चाहिए।
  • समिति ने पंचायती राज संस्थाओं को करारोपण की शक्तियाँ एवं अपने संसाधन प्राप्त की शक्ति देने की भी अनुशंसा की।
  • राज्य सरकारों के द्वारा पंचायती राज संस्थाओं के कार्यकरण में हस्तक्षेप नहीं होना चाहिए।
  • पंचायतों में SC और ST को उनकी जनसंख्या के अनुपात में सीटें आरक्षित करने की सिफारिश की।
  • इस समिति ने “पंचायती राज्य वित्त निगम” की स्थापना का भी सुझाव दिया।
  • पंचायतों के विघटन के बाद चुनाव 6 महीने की अवधि में ही हो जाने चाहिए।
  • राज्य के निर्वाचन आयोग द्वारा पंचायतों के चुनाव आयोजित होने चाहिए।
  • विकास पंचायत से अलग एक न्याय पंचायत की भी स्थापना होना चाहिए, जिसका अध्यक्ष एक न्यायाधीश हो।
  • प्रत्येक राज्य में पंचायत राज विभाग की स्थापना की जानी चाहिए।
  • महिलाओं के लिए एक-तिहाई स्थान आरक्षित होने चाहिए।
  • अशोक मेहता समिति की अनुशंसा पर कर्नाटक एवं पश्चिमी बंगाल में चुनाव करवाये गये थे। 

दाँतेवाला समिति (1978)

  • इस समिति ने खण्ड स्तर पर नियोजन की अनुशंसा की।
  • गाँव, जनपद एवं राष्ट्रीय स्तर पर नियोजन को अंतर्सबंधित करने पर बल दिया।

जी.वी. के. राव समिति (1985)

  • योजना आयोग ने ग्रामीण विकास एवं गरीबी निवारण कार्यक्रम की समीक्षा के लिए सन् 1985 में इस समिति की स्थापना की गयी।
  • पंचायती राज संस्थाओं के संदर्भ में जिला स्तर पर “जिला विकास आयुक्त” जैसा नया पद स्थापित करने की अनुशंसा की।

एल. एम. सिंघवी समिति (1986)

  • राजीव गाँधी सरकार ने लोकतंत्र एवं विकास के लिए पंचायतों के “पुनर्जीवन नामक” समिति की स्थापना की जिसके अध्यक्ष लक्ष्मीमल सिंघवी थे जिसकी सिफारिशे निम्न है-
  1. पंचायती राज संस्थाओं को संवैधानिक रूप से मान्यता दी जानी चाहिए।
  2. गाँवों के समूह के लिए न्याय पंचायतों की स्थापना की जाये।
  3. गाँव की पंचायतों को ज्यादा आर्थिक संसाधन उपलब्ध कराये जाने चाहिये।
  4. ग्राम पंचायतों को ज्यादा व्यावहारिक बनाने के लिए गांवों का पुनर्गठन किया जाना चाहिए एवं ग्राम सभा की महत्ता पर भी जोर दिया जाए।
  5. पंचायती राज संस्थाओं के चुनाव, उनके विघटन एवं उनके कार्यों से संबंधित जो भी विवाद उत्पन्न होते हैं, उनके निस्तारण के लिए न्यायिक अभिकरणों की स्थापना की जानी चाहिये।

थुंगन समिति (1988)

  • थुंगन समिति ने भी पंचायती राज को संवैधानिक आधार देने का समर्थन किया परंतु थुंगन समिति के अनुसार भारत में पंचायतों का संबंध सीधा संघ सरकार से होना चाहिए अत: समिति ने पंचायती को राज्यों का विषय नहीं माना।

नोट :- सरकारिया आयोग ने भी पंचायती राज संस्थाओं को शक्तिशाली बनाने पर बल दिया था।

गाडगिल समिति (1988)

  • पंचायती राज संस्थाओं को संवैधानिक दर्जा दिया जाए तथा इनका कार्यकाल 5 वर्ष सुनिश्चित कर दिये जाने की सिफारिश की।
  • इसके अतिरिक्त SC/ST एवं महिलाओं के लिए आरक्षण देने की सिफारिश की।
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